आरएसएस और मोदी का इतिहास और दिल्ली के दंगे

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

प्रतिक्रांति का एक समग्र राजनीतिक प्रत्युत्तर ही क्रांति का रास्ता तैयार कर सकता है

History of RSS and Modi and Delhi riots

आरएसएस और मोदी के इतिहास से परिचित कोई साधारण आदमी भी दिल्ली के दंगों और आगे इनकी और पुनरावृत्तियों का बहुत सहजता से पूर्वानुमान कर सकता है। फिर भी कथित रूप से दूरगामी लक्ष्यों को सामने रखने वाले राजनीतिक दलों की कार्यनीति में इस बोध की कमी क्यों दिखाई पड़ती है ?

यह एक विस्मय और गहराई से विचार का भी विषय है।

क्रांतिकारियों के पास प्रतिक्रांति के प्रतिकार की एक समग्र सम्यक रणनीति का अभाव साफ़ दिखाई देता है, जो सारी दुनिया में दक्षिणपंथ के उभार का भी बड़ा कारण है। पर सच यह है कि क्रांति का रास्ता इस रणनीति के बिना नहीं बन सकता है।

Popular Front Against Fascism

तीस के दशक में फासीवाद के ख़िलाफ़ पॉपुलर फ़्रंट की एक रणनीति सामयिक रूप से कुछ देशों में सफल हुई थी। लेकिन इतने सालों में भी उसकी आंतरिक कमज़ोरियों की समीक्षा और उसे एक मज़बूत विकल्प के रूप में विकसित करने का कोई सही विमर्श तैयार नहीं हो पाया है। वह क्यों क्रमिक रूप में राष्ट्रों की राजनीति के किसी नए पथ का आधार नहीं बन पाया, कैसे राजनीतिक दलों की सांस्थानिक सीमाओं ने उस समुच्चय के खुलेपन को बुरी तरह से व्याहत किया जो समग्र राजनीति-सामाजिक जीवन को अपने दायरे में ले सकता था ? इन प्रश्नों का गहरा विवेचन ज़रूरी है।

भारत में सभी वामपंथी क्रांतिकारी और जनतांत्रिक दलों के बीच इस प्रकार के खुले विमर्श का प्रारंभ होना चाहिए। उनमें आपस में एक ऐसी उदार समझ बननी चाहिए जो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सभी मुद्दों को समेटते हुए एक सुचिंतित क्रमिक विकास का विकल्प तैयार कर सके। इसमें किसी भी प्रकार के थोथे आग्रह-पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं हो सकती है। मसलन्, परमाणविक संधि की तरह के तमाम ग़ैर-ज़रूरी मुद्दों को राष्ट्रीय विकास की एक समग्र समझ से अधिक तरजीह नहीं दी जा सकती है। और न ही, इसमें चुनावी लाभ-हानि के सवाल महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

Meaning of revolution in Hindi : Revolution does not mean monopoly on power

क्रांति का अर्थ सत्ता पर एकाधिकार नहीं, जनता के जीवन में सुधार, बराबरी और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने वाली एक विकासमान सामाजिक रणनीति है।

-अरुण माहेश्वरी

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