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climate change

G7 देशों की जलवायु वित्त प्रतिज्ञाओं के मामले में वादाखिलाफ़ी बदस्तूर जारी

Hollow Commitments: G7 fact sheet

Rich countries’ latest climate finance plans still fall short of the $100 billion target they committed to in 2009 and contain a woeful lack of detail, predictability or clarity regarding delivery and timeline for future funds, analysis from CARE has found.

नई दिल्ली, 07 जून – हेग, नीदरलैंड में जारी एक ताज़ा विश्लेषण से पता चला है कि अमीर देशों की मौजूदा क्लाइमेट फाइनेंस योजनाएं (Existing Climate Finance Schemes of Rich Countries) अभी भी न सिर्फ 100 बिलियन डॉलर के लक्ष्य से कम हैं, बल्कि इनमें भविष्य के फंड के लिए वितरण और समयरेखा के बारे में विवरण और स्पष्टता की गंभीर कमी है।

CARE संस्था ने जारी की है हौलो कमिटमेंट्स रिपोर्ट

CARE संस्था ने पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों द्वारा पेश किये गए नवीनतम आधिकारिक वित्त योजनाओं का विश्लेषण किया है और पाया कि G7 और अन्य धनी देशों की कमज़ोर देशों के लिए समर्थन की ज़बानी वादों के बावजूद, सभी 24 मूल्यांकन किए गए डोनर्स द्वारा प्रस्तुत की गई वास्तविक जानकारी मांगी गई से बहुत कम है और कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि अमीर देश अपनी जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं को पूरा करेंगे।

Hollow Commitments: An analysis of developed countries’ climate finance plans

हौलो कमिटमेंट्स रिपोर्ट (hollow commitment report) नाम के इस विश्लेष्ण अपनी प्रतिक्रिया देते हुए CARE डेनमार्क के वरिष्ठ जलवायु सलाहकार और रिपोर्ट लेखकों में से एक, जॉन नोर्डबो, ने कहा, “दस साल से भी पहले, अमीर देश अपने द्वारा जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाले एमिशन के लिए किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी लेने के लिए सहमत हुए थे। साथ ही, विकासशील देशों में जलवायु अडॉप्टेशन और मिटिगेशन के लिए, साल 2020 से प्रति वर्ष $100 बिलियन जुटाने के लिए सम्मिलित रूप से प्रतिबद्ध हुए थे। लेकिन इन धनी राष्ट्रों ने दुनिया के सबसे ग़रीब लोगों और राष्ट्रों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बारे में इतनी परवाह नहीं की। अब जब भी G7 के नेता मिलते हैं तब उन्हें निश्चित रूप से किसी ठोस योजना के साथ  आना चाहिए। साथ ही उन्हें एक रोडमैप विकसित करने की भी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए जिससे सुनिश्चित हो कि विकसित देशों के जलवायु वित्त दायित्वों को पूरा किया जाए।”

हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि हम अभी तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित करने और जलवायु संकट के सबसे बुरे प्रभावों से बचने के लिए ट्रैक पर नहीं हैं, प्रभाव जो कम से कम विकसित देशों और छोटे द्वीप विकासशील राज्यों पर विनाशकारी और अनुपातहीन टोल लेंगे। इनमें से कई देश मरुस्थलीकरण, खाद्य असुरक्षा और सूखे से लेकर चरम मौसम की घटनाओं, बाढ़ और कीटों के आक्रमण तक, पहले से ही धीमी और अचानक शुरू होने वाली जलवायु सदमों में वृद्धि का अनुभव कर रहे हैं। इन घटनाओं की आवृत्ति और गंभीरता में वृद्धि देशों के लिए, एडाप्टेशन या अधिक दीर्घकालिक लचीलापन बनाने के लिए तो दूर, एक से दूसरे से उबरने में चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है, जैसा कि पिछले सप्ताह भारत में देखा गया।

पेरिस समझौता यह अनुबंध करता है कि विकसित देशों को जलवायु वित्त प्रदान करना चाहिए और मिटिगेशन और एडाप्टेशन दोनों के लिए समर्थन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिए। वर्तमान में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्लाइमेट फाइनेंस का केवल 25 प्रतिशत एडाप्टेशन पर खर्च किया जाता है और CARE की नई रिपोर्ट से पता चलता है कि 50/50 संतुलन अभी भी पहुंच से बाहर है और केवल दो देशों (आयरलैंड और न्यूजीलैंड) के यह स्वीकार स्वीकृत करते हुए कि एडाप्टेशन के उद्देश्यों को गंभीर रूप से कम वित्त पोषित मिला है और यह कहते हुए कि वे आने वाले वर्षों में एडाप्टेशन को मिटिगेशन से ज़्यादा लक्षित करेंगे।

रिपोर्ट के कुछ और निष्कर्ष इस प्रकार हैं :

·         संयुक्त राष्ट्र विकास सहायता प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के अलावा किसी भी G7 देश ने जलवायु वित्त की पेशकश नहीं की।

·         केवल एक G7 देश (यूके) ने कमजोर देशों को प्राथमिकता देने के लिए स्पष्ट प्रतिबद्धताएं की हैं।

·         एक भी धनी देश ने सबसे कम विकसित देशों  और छोटे द्वीपीय विकासशील राज्यों  को प्रदान की जाने वाली सहायता को रेखांकित करते हुए विस्तृत मात्रात्मक जानकारी नहीं दी।

·         संलग्न G7 जलवायु वित्त सिंहावलोकन तालिका भी देखें।

आगे, CARE मलावी के साथ दक्षिणी अफ्रीका एडवोकेसी लीड, चिकोंडी चबवुता, कहते हैं,

“यह काफी दिल दहलाने  वाली बात है कि पेरिस समझौते में लगभग छह साल से सहभागी देश अभी भी जलवायु कार्रवाई के वित्तपोषण के अपने वादों पर खरे नहीं उतर रहे हैं, जब के ग़रीब देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन   का प्रभाव इतनी गंभीर रूप से महसूस किया जा रहा है। विकासशील राष्ट्र आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और विशालता का अनुभव कर रहे हैं और उनका सामना करने में, संपन्न होना तो दूर की बात, समर्थ तक नहीं हैं। यदि कोई स्पष्ट वित्त रोडमैप नहीं होगा, तो ग़रीब देश जलवायु से प्रेरित आपदाओं से होने वाली मौतों को दर्ज करना जारी रखेंगे और दुनिया असमान बनी रहेगी, क्योंकि यह केवल संख्या के बारे में नहीं है, यह लोगों के जीवन के बारे में भी है। प्रभावों का सबसे ज़्यादा बुरा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। जलवायु वित्त आधिकारिक विकास सहायता के हिस्से के रूप में नहीं आना चाहिए, जिसकी ग़रीबी से लड़ने के लिए तत्काल आवश्यकता है, बल्कि एडाप्टेशन और हानि और क्षति के लिए अतिरिक्त और लक्षित होना चाहिए।”

OECD (ओईसीडी) के अनुसार, विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई के लिए धनी देशों का समर्थन एक दशक से ज़्यादा पहले उनके द्वारा प्रतिबद्ध करे हुए $100 बिलियन प्रति वर्ष से कम से कम $20 बिलियन तक कम है। इसका मतलब है कि निकट भविष्य में उन्हें लिए और अधिक जलवायु वित्त प्रदान करने की तत्काल आवश्यकता है।

CARE की ‘हौलो कमिटमेंट्स रिपोर्ट 24 देशों के सभी सबमिशनों का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करती है और उन्हें पॉइंट सिस्टम पर रैंक करती है। लक्समबर्ग और स्वीडन तालिका में शीर्ष पर हैं, लेकिन उनकी एक्स-ऐंटी रिपोर्टिंग में अभी भी सुधार की गुंजाइश है, दोनों देशों ने केवल संभावित अंकों का लगभग आधा स्कोर किया है। तालिका में सबसे नीचे, पांच देशों को कोई अंक नहीं मिला (ऑस्ट्रिया, ग्रीस, जापान, चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया) जो यह दर्शाता है कि उनकी रिपोर्टें बेहद ख़राब हैं।

इसके आलावा 11 और देशों ने संभावित अंकों का केवल एक चौथाई या उससे कम प्राप्त किया। इस समूह में डेनमार्क, नीदरलैंड और नॉर्वे जैसे देश शामिल हैं, जो आमतौर पर खुद को अंतरराष्ट्रीय विकास में नेताओं के रूप में देखते हैं।

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