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Environment and climate change

जानिए जीवाश्म निर्मित कैसे होते हैं?

A fossil is a remnant of a dead organism that could not be destroyed by rot.

अंग्रेजी में जीवाश्म (fossil in Hindi) को फॉसिल कहा जाता है। जीवाश्म किसी मृत जीव का ऐसा अवशेष (Remains of dead creatures) है जो सड़कर नष्ट नहीं हो सका।

ये अवशेष तलछटी चट्टानों में ही पाए जाते हैं लेकिन कभी-कभी ये दलदल, बालू तथा बर्फ में भी मिलते हैं। भू-सतह के नीचे असंख्य जीवाश्म दबे पड़े हैं। खनिज कोयला जीवाश्मित वनस्पतियों का संगठित रूप है। इसी प्रकार खनिज तेल पुराने मृत सूक्ष्मजीवियों का परिवर्तित रूप है। जीवाश्म जो किसी विशेष काल की चट्टान में ही पाए जाते हैं सूचक जीवाश्म (इंडेक्स फॉसिल) कहे जाते हैं। किसी भी जीव पर उसके पर्यावरण की छाप अवश्य पाई जाती है। अधिकांश जीवाश्मों का निर्माण छिछले पानी के नीचे होता है।

पुराजीव विज्ञान – Archaeological science

जीवाश्म शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘जीव’ तथा ‘अश्म’। अश्म का अर्थ होता है-पत्थर। इस प्रकार जीवाश्म का अर्थ हुआ वह जीव जो पत्थर बन गया। अंग्रेजी में जीवाश्म को फॉसिल कहा जाता है। ‘फॉसिल’ लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है- जमीन खोदकर निकाला गया पदार्थ (‘Fossil’ is a Latin word which means – Material that was dug out of the ground)

शुरुआत में जीवाश्म शब्द उन सभी पदार्थों के लिए उपयोग में लाया जाता था जो भू-सतह को खोदकर निकाले जाते थे। इनमें शामिल थे खनिज, मानव निर्मित पुरातन औजार, पत्थर तथा प्राचीन पौधों एवं जंतुओं के अवशेष। लेकिन धीरे-धीरे जीवाश्म शब्द सिर्फ पौधों एवं जंतुओं के पुरावशेषों के लिए ही सीमित रह गया। ये अवशेष तलछटी चट्टानों में ही पाए जाते हैं लेकिन कभी-कभी ये दलदल, बालू तथा बर्फ में भी मिलते हैं।

Mineral coal is an organized form of fossilized flora.

भू-सतह के नीचे असंख्य जीवाश्म दबे पड़े हैं। कुछ चट्टानें जैसे- चूना पत्थर (लाइम स्टोन) तथा खड़िया (चॉक) प्राय: असंख्य छोटे-छोटे जीवाश्मों से निर्मित रहती हैं। खनिज कोयला जीवाश्मित वनस्पतियों का संगठित रूप है। इसी प्रकार से खनिज तेल पुराने मृत सूक्ष्मजीवियों का परिवर्तित रूप है। इसीलिए इन्हें जीवाश्म ईंधन कहते हैं।

जीवाश्म वैज्ञानिकों के मतानुसार प्रत्येक भूगर्भीय काल के दौरान कुछ विशिष्ट प्रकार के जंतु या पौधे पाए जाते हैं और इनके जीवाश्म एक भूगर्भ स्तंभ में किसी भी शैल स्तर के काल का ज्ञान कराते हैं। इस प्रकार के जीवाश्म जो किसी विशेष काल की चट्टान में ही पाए जाते हैं सूचक जीवाश्म (इंडेक्स फॉसिल) कहे जाते हैं।

Fossils can also provide useful information about the geography of ancient times.

किसी भी जीव पर उसके पर्यावरण की छाप अवश्य पाई जाती है। अत: जीवाश्मों से उस काल के पर्यावरण का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। कुछ जीवाश्मों के वितरण के अध्ययन से अतीत में थल तथा समुद्र के वितरण, धाराओं की दिशा, तथा प्राचीन जीवों के प्रजनन वगैरह का अनुमान लगाया जा सकता है। अत: जीवाश्म प्राचीन काल के भूगोल की उपयोगी जानकारी भी प्रदान कर सकते हैं।

How are fossils made?

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि, जीवाश्म निर्मित कैसे होते हैं? मृत जीव सड़कर प्राय: नष्ट हो जाते हैं। लेकिन जीवाश्म किसी मृत जीव का ऐसा अवशेष है जो सड़कर नष्ट नहीं हो सका। सड़ने की क्रिया कई कारणों से धीमी हो सकती है या बिलकुल रुक भी सकती है। जीवश्म के निर्माण या परिरक्षण की विधि जंतु या वनस्पति की प्रकृति, उसकी जीवन शैली, तथा उसके मरने तथा सड़ने की परिस्थिति पर निर्भर करती है। जीवाश्म-निर्माण के लिए दो बातें आवश्यक हैं-

  1. जीव के शरीर में कड़े अंश की उपस्थिति
  2. मरणोपरांत अविलंब तलछट से ढंक जाना

कड़े कवच वाले जीवों के जीवाश्मित होने की संभावना कवच विहीन या कंकाल विहीन जीवों की अपेक्षा अधिक है। इसी प्रकार जो जीव दलदल में दब जाता है उसके जीवाश्मित होने की संभावना खुले मैदान में मरने वाले जीव से अधिक है। इसका कारण यह है कि खुले मैदान में बैक्टीरिया द्वारा मृत जीव के शरीर का नष्ट होना निश्चित है।

चूंकि जीवाश्म तलछट के अंदर बनते हैं, इसलिए अधिकांश जीवाश्मों का निर्माण छिछले पानी के नीचे होता है, जहां तलछट शीघ्रतापूर्वक तथा लंबे समय तक लगातार जमा होती रहती है।

Where are fossils found?

जीवाश्म प्राय: समुद्र के नीचे जमीन से सटे हुए स्थानों या नदियों के मुहानों पर बनते हैं। यहां जीवों के अवशेष या तो पानी के साथ बहकर आते हैं या फिर उसी स्थान पर जीवों के मरने से प्राप्त होते हैं। थलचर जीवों के अवशेष प्राय: नदियां या झीलों में निर्मित तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।

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अकशेरुकी जीवों के खोल (Shell of invertebrates) ज्ञात जीवाश्मों में सबसे अच्छी स्थिति में मिले हैं। इनके जीवाश्मित होने की विधि एक ही तरह की है। इन जीवों का तलछट में दबा हुआ खोल उस समय कई प्रकार के परिवर्तनों के दौर से गुजरता है जब उसके चारों ओर का सांचा पत्थर के रूप में जमता जाता है। धीरे-धीरे बहता हुआ भूमिगत जल जीवन के खोल को पूरी तरह घोल देता है तथा उसके स्थान पर एक रिक्त स्थान या सांचा बना रह जाता है। यह सांचा मूल खोल के आकार तथा उसकी सतह के चिह्नों को पूर्णत: सुरक्षित रूप से दर्शाता है। यदि कुछ समय के बाद सांचे का यह रिक्त स्थान खनिजों से भर जाता है तो मूल खोल का ढांचा बन जाता है।

अनुकूल परिस्थितियों में कार्बनिक पदार्थ खनिज पदार्थों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है तथा जीवधारी का आकार एवं उसकी संरचना परिरक्षित हो जाती है। इस क्रिया को प्रस्तरीकरण (पेट्रिफिकेशन) कहा जाता है। यह क्रिया जीवों के कड़े भागों (जैसे हड्डी, खोल, दांत इत्यादि) के लिए अधिक प्रभावी है। नाजुक भाग (जैसे मांस, चमड़ा इत्यादि) शायद ही कभी इस विधि द्वारा परिरक्षित होते हैं।

परिरक्षण की एक विशिष्ट विधि और भी है। सिलिकायुक्त पानी जीवों के ऊतकों के भीतर तथा उसके चारों ओर जमा होकर उसे पूर्णत: ढंक लेता है। बंद होने के कारण कार्बनिक पदार्थ का संपर्क बाहरी वातावरण से बिलकुल टूट जाता है। इस परिस्थिति में बैक्टीरिया उसे नष्ट नहीं कर पाते तथा वह पूरी तरह सुरक्षित रहता है। शीघ्रतापूर्वक तलछटी सिलिका से चर्ट नामक खनिज निर्मित होता है। चर्ट के भीतर 20 करोड़ वर्ष पुराने शैवाल के जीवकोश परिरक्षित पाए गए हैं। प्रस्तरीकरण के लिए खनिज का जलीय घोल उपलब्ध होना आवश्यक है। सिलिका के अतिरिक्त भूमिगत जल में विलेय अवस्था में कैल्साइट उपलब्ध रहता है। इन खनिजों से परिरक्षित जीवाश्मों को क्रमश: सिलिकाकृत (सिलिसीफाइड) तथा चूनाकृत (कैल्सिफाइड) कहा जाता है। लेकिन जीवधारियों के खोल तथा कंकाल भी इन्हीं दो खनिजों के बने रहते हैं। इसलिए यह बताना कठिन है कि किसी जीवाश्म का कितना भाग मौलिक है तथा कितना बाद में शामिल हुआ। लेकिन वैज्ञानिकों के मतानुसार कुछ जटिल अमीनो अम्ल सिर्फ जंतुओं में ही पाए जाते हैं जो लाखों वर्षों तक जीवाश्मों में परिरक्षित रहते हैं। अत: इनकी मात्रा निर्धारित कर यह बताया जा सकता है कि किसी जीवाश्म का कितना भाग मौलिक है तथा कितना बाद में शामिल हुआ है।

सिलिका तथा कैल्साइट के अतिरिक्त पाइराइट, डोलोमाइट, बेराइट, गैलेना, फ्लोराइड, जिप्सम, हेमेटाइट तथा गंधक जैसे अन्य खनिज भी प्रस्तरीकरण में अपना योगदान देते हैं।

संयुक्त राज्य अमरीका के कुछ क्षेत्रों में बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) में उपस्थित कुछ वनस्पतियां यूरेनियम खनिजों द्वारा प्रतिस्थापित कर दी गई है। कहीं-कहीं शुद्ध चांदी द्वारा भी प्रतिस्थापन हुआ है। जीवाश्म निर्माण की एक और प्रक्रिया है कार्बनीकरण या स्रवण। इसके द्वारा वनस्पतियों तथा जंतुओं के कोमल भाग परिरक्षित होते हैं। कार्बनीकरण की प्रक्रिया में जीवधारियों में उपस्थित द्रव एवं गैस उच्चदाब के कारण निचुड़कर बाहर निकल जाते हैं तथा चारों स्थित सांचानुमा पदार्थ में मिल जाते हैं। ऐसी स्थिति में जीवधारियों के शरीर का कोमल भाग एक पतली झिल्ली के रूप में बच जाता है जिसके अधिकांश भाग में कार्बन होता है। जीवाश्मीकरण की इस प्रक्रिया में पत्तियों की पतली नाड़ियां तथा कोशिका भित्ति तक परिरक्षित हो जाती हैं। कभी-कभी किसी वनस्पति की पत्तियों या डंठल इत्यादि की सिर्फ छाप परिरक्षित हो पाती है। ऐसे जीवाश्म को ‘छाप’ (इंप्रेशन) कहा जाता है।

बर्फीले क्षेत्र के मृत जीवों के शरीर बर्फ में परिरक्षित पाए जाते हैं। भारत के हिमालय क्षेत्र में स्थित रूपकुंड में बर्फ की काफी मोटी तह के नीचे मानवों के पूर्णत: परिरक्षित मृत शरीर और साथ में उनके बाल तथा कपड़े जैसे सामान भी पाए गए हैं।

पूर्वोत्तर साइबेरिया में 1976 में खुदाई के समय बर्फ से ढंके हाथी के बच्चों का शरीर मिला। ये सारे अवशेष ईसा पूर्व काल के बताए जाते हैं। बर्फ से ढंकने के कारण बैक्टीरिया विघटन नहीं कर पाती। कुछ परिस्थितियों में जीवों के शरीर तो परिरक्षित नहीं रह पाते, लेकिन उनके द्वारा बनाए गए रास्ते, पद-चिन्ह इत्यादि चट्टानों में परिरक्षित देखे जा सकते हैं। कभी-कभी उनके द्वारा बनाए गए बिल इत्यादि भी चट्टानों में परिरक्षित पाए जाते हैं। ऐसे अवशेषों को ‘चिन्ह जीवाश्म (ट्रेस फॉसिल)’ कहा जाता है।

डॉ. विजय कुमार उपाध्याय

(मूलतः देशबन्धु पर प्रकाशित खबर का संपादित अंश )

 

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