फसलों के लिए काल बनते टिड्डी दल

tiddi in Hindi, Grasshopper,Locust (टिड्डी)

How Dangerous Are Locusts to Farmers Crops

            एक ओर जहां भारत कोरोना संकट (Corona crisis) से बुरी तरह जूझ रहा है, वहीं पिछले दिनों अम्फान और निसर्ग जैसे तूफानों ने भी चुनौतियों को बढ़ाया है। उत्तर भारत में बार-बार आ रहे हलके भूकम्प के झटके भी लोगों को डरा रहे हैं। इन मुसीबतों के बीच पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान, पंजाब, सिंध प्रांतों से (Tiddi Dal In India Update) भारत आ रहे टिड्डी दलों के हमले से देश के कई राज्यों में किसान खासे परेशान हैं । राजस्थान से शुरू हुआ टिड्डी दलों का कहर देखते ही देखते अब कई राज्यों में देखा जा रहा है। अनेक स्थानों पर टिड्डियों द्वारा पशुओं के चारागृहों तक को नष्ट करने की खबरें भी आई हैं, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इससे पशुओं के लिए चारे की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।

विशाल टिड्डी दलों द्वारा विभिन्न राज्यों के हजारों गांवों में लाखों हेक्टेयर फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया जा चुका है और टिड्डी दलों का यह कहर अभी कम से कम अगले महीने तक बरकरार रहने की संभावनाएं जताई गई हैं। फसलों पर होने वाले टिड्डियों के इन हमलों से न केवल किसान बल्कि सरकार और वैज्ञानिक भी खासे परेशान हैं क्योंकि ऐसे हमले थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बार-बार हो रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) इस वर्ष व्यापक पैमाने पर टिड्डी दल के प्रकोप की आशंका पहले ही जता चुका था लेकिन एएफओ की चेतावनी को दरकिनार करने का ही नतीजा रहा कि टिड्डी दलों का प्रकोप कई राज्यों तक फैल गया है।

How can locust be controlled? | locust control organization.

टिड्डी नियंत्रण विभाग (Deputy Director (Plant Pathology) – Directorate of Plant Protection Quarantine & Storage) के उपनिदेशक डा. के एल गुर्जर का कहना है कि पाकिस्तान अपने क्षेत्र में टिड्डियों पर नियंत्रण करने में पूरी तरह नाकाम रहा है, जिस कारण टिड्डियों के होपर्स एडल्ट होकर बड़ी संख्या में राजस्थान की सीमा से भारतीय क्षेत्र में आए हैं। उनके मुताबिक अगले कुछ दिनों में इन टिड्डियों की समर ब्रीडिंग के बाद इनकी बढ़ी जनसंख्या बहुत बड़ा खतरा बन सकती है। फिलहाल देशभर में कई टीमें टिड्डी दलों पर नियंत्रण करने की कोशिशों में लगी हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा एयरक्राफ्ट, ड्रोन तथा विशेष प्रकार के दूसरे उपकरणों के जरिये टिड्डियों को नष्ट करने की योजना बनाई जा रही है।

इन विशेष उपकरणों का इस्तेमाल टिड्डियों पर नजर रखने के लिए किया जाएगा जबकि कीटनाशकों का छिड़काव कर फसलों को टिड्डियों से बचाने का प्रयास किया जाएगा। टिड्डियों के हमले को लेकर स्थिति की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि पिछले दिनों जब तीन टिड्डी दलों ने राजस्थान की ओर से मध्य प्रवेश में प्रवेश किया था तो वे दल करीब 8-10 किलोमीटर लंबे थे।

यह पहला मौका नहीं है, जब पाकिस्तान द्वारा अपने इलाके में टिड्डियों पर नियंत्रण करने में नाकाम रहने पर टिड्डी दल वहां से होते हुए भारत में फसलों को बर्बाद करने पहुंचे हैं। वहां पहले भी कई बार टिड्डी दलों के हमले हो चुके हैं और टिड्डियों के विशाल झुंडों ने वहां अनाज तथा सब्जियों की फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है।

इसी वर्ष फरवरी माह में तो टिड्डियों से निपटने के लिए पाकिस्तान सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तक करनी पड़ी थी।

उस दौरान भी पाकिस्तान से भारत आए टिड्डी दलों ने राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात इत्यादि राज्यों में फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। पिछले साल भी देश के कई हिस्सों के अलावा राजस्थान के दर्जन भर जिले टिड्डियों के प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जहां नौ महीनों के दौरान टिड्डी दलों ने सात लाख हैक्टेयर से अधिक इलाके में फसलों का सफाया कर दिया था। वर्ष 2017 में बोलीविया की सरकार को भी एक बड़े कृषि क्षेत्र में टिड्डियों के हमले के कारण आपातकाल घोषित करना पड़ा था। कई देशों में तो टिड्डी दलों के हमलों के बाद खाद्य सुरक्षा को लेकर संकट उत्पन्न हो गया है।

            सोमालिया, इथियोपिया, केन्या, इरिट्रिया, जिबूती, तंजानिया, युगांडा, दक्षिण सूडान इत्यादि कुछ ऐसे ही देश हैं, जो टिड्डियों के हमले से त्रस्त हैं।

केन्या, इथियोपिया तथा सोमालिया में तो प्रायः कई किलोमीटर लंबे इतने घने टिड्डी दल देखे जाते रहे हैं, जिनके पार कुछ दिखाई नहीं देता। इन देशों में टिड्डियों की तेजी से बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के पर्याप्त उपाय न होने के कारण इन देशों में इनका प्रकोप लगातार बढ़ता गया है। वर्षों के सूखे और उसके बाद भारी बारिश तथा बढ़ते तापमान से टिड्डियों के प्रजनन के लिए इन देशों में अनुकूल परिस्थितियां पैदा हुई। अच्छी बारिश के कारण हरियाली बढ़ना भी टिड्डियों के प्रजनन में बढ़ोतरी का एक अहम कारण बना।

टिड्डी दलों द्वारा व्यापक स्तर पर फसलों को नष्ट कर देने से किसी भी देश में खाद्य असुरक्षा की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि किसान पटाखे छोड़कर, थाली बजाकर या अन्य तरीकों से शोर करके टिड्डियों को भगाते रहे हैं क्योंकि टिड्डियां तेज आवाज सुनकर अपनी जगह छोड़ देती हैं लेकिन फिर भी टिड्डी दल किसी भी क्षेत्र से गुजरते हुए वहां की पूरी फसल को चट करता हुआ आगे बढ़ जाता है।

टिड्डी दलों के हमलों से खाद्य असुरक्षा की आशंका इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि जब लाखों टिड्डयों का कोई दल आगे बढ़ता है तो अपने रास्ते में आने वाले सभी तरह के पौधों और फसलों को चट करता हुआ आगे बढ़ जाता है।

Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं
योगेश कुमार गोयल

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मात्र 6-8 सेंटीमीटर आकार का यह कीट प्रतिदिन अपने वजन के बराबर खाना खा सकता है और जब यह समूह में होता है तो खेतों में खड़ी पूरी फसल को खा जाता है। एक साथ चलने वाला टिड्डियों का एक झुंड एक वर्ग किलोमीटर से लेकर कई हजार वर्ग किलोमीटर तक फैला हो सकता है। ये अपने वजन के आधार पर अपने से कहीं भारी आम पशुओं के मुकाबले आठ गुना ज्यादा तेज रफ्तार से हरा चारा खा सकती हैं। एलडब्ल्यूओ के मुताबिक दुनियाभर में टिड्डियों की दस प्रजातियां सक्रिय हैं, जिनमें से चार प्रजातियां रेगिस्तानी टिड्डी, प्रवासी, बॉम्बे तथा ट्री टिड्डी भारत में देखी जाती रही हैं। इनमें रेगिस्तानी टिड्डी सबसे खतरनाक मानी जाती है।

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार जिस भी इलाके में टिड्डी दल का हमला होता है, वहां सारी फसल चौपट हो जाती है। दरअसल टिड्डी दल प्रायः बहुत बड़े समूह में होता है, जो हरी पत्तियों, तने और पौधों में लगे फलों को चट कर जाता है। यही नहीं, यह जिस भी हरे-भरे वृक्ष पर बैठता है, उसे भी पूरा नष्ट कर देता है। यूएन द्वारा टिड्डी मारक कीटनाशकों के छिड़काव के लिए 10 मिलियन डॉलर की मदद दी जा चुकी है लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अभी भी इस कार्य के लिए 70 मिलियन डॉलर अतिरिक्त फंड की आवश्यकता है।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा कई पुस्तकों के लेखक हैं)

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