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जस्टिस काटजू ने शेयर की अद्भुत् कहानी, आप भी पढ़ लें मिल जाएगा मोक्ष

जस्टिस काटजू ने शेयर की अद्भुत् कहानी, आप भी पढ़ लें मिल जाएगा मोक्ष

राजा जनक को मोक्ष कैसे मिला? आप भी जानिए मोक्ष कैसे मिलता है? How to get salvation?

नई दिल्ली, 17 दिसंबर 2022. सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं और राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, साहित्य और अध्यात्म पर कुछ न कुछ विचार प्रकट करते ही रहते हैं। अब जस्टिस काटजू ने अपने फेसबुक पेज पर अंग्रेजी में एक कहानी पोस्ट की है, जो है तो एक साधारण कहानी, लेकिन उसमें जीवन का रहस्य छिपा हुआ है।

राजा जनक को हुई मोक्ष प्राप्ति की इच्छा

जस्टिस काटजू लिखते हैं –

“एक दिन मिथिला के महान दार्शनिक राजा (सीताजी के पिता) राजा जनक ने घोषणा की कि वह अपना आधा राज्य उस व्यक्ति को दे देंगे जो उन्हें तुरंत मोक्ष प्राप्त करा सके।

इस प्रस्ताव से आकर्षित होकर कई विद्वान व्यक्ति उनके दरबार में आए।

एक ने कहा कि यदि राजा ऊपर हाथ जोड़कर 10 वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहें तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। राजा ने कहा कि वह 10 साल तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं है, और तुरंत मोक्ष चाहता है।

एक अन्य ने कहा कि अगर वह भगवान शिव के नाम को 10 लाख बार दोहराते हैं तो उन्हें मोक्ष मिल सकता है। राजा जनक ने कहा कि इसमें बहुत अधिक समय लगेगा, और वे तुरंत मोक्ष चाहते थे। दूसरों ने दूसरी सलाह दी, लेकिन राजा ने उन सभी को ठुकरा दिया। इस तरह सभी दावेदार फेल हो गए।

तभी राजा के दरबार में अष्टावक्र नाम का एक 12 वर्ष का बालक आया।

अष्टावक्र नाम क्यों पड़ा?

जस्टिस काटजू आगे लिखते हैं –

उन्हें अष्टावक्र कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ 8 तरीकों से विकृत होता है (संस्कृत में अष्ट का अर्थ 8 होता है, और वक्र का अर्थ मुड़ा हुआ होता है), क्योंकि उनके अंग, गर्दन, धड़ आदि सभी मुड़े हुए थे। और उनके ऐसा होने का कारण यह था : एक बार उनके पिता कहोड़ यज्ञ कर रहे थे जब अष्टावक्र अपनी माता के गर्भ में थे। अष्टावक्र ने मां के पेट से ही पिता को बताया कि यज्ञ करने में गलती हो रही है। कहोड़ इतना क्रोधित हुए कि उसने अपने पुत्र को 8 विकृतियों के साथ जन्म लेने का श्राप दिया, और ऐसे ही उनके साथ अष्टावक्र पैदा हुआ।

बाद में कहोड़ मर गया, और अष्टावक्र सभी ग्रंथों में निपुणता प्राप्त करते हुए एक बेशुमार बच्चा बन गया।

फिर आगे क्या हुआ?

जस्टिस काटजू आगे लिखते हैं –

राजा की घोषणा सुनकर अष्टावक्र उनके दरबार में गए। उसे महल के गेट पर पहरेदारों ने रोक लिया, जिन्होंने पूछा कि वह क्या चाहता है। अष्टावक्र ने कहा कि वे राजा की घोषणा को देखते हुए आए थे। इससे पहरेदारों को हंसी आ गई, उन्होंने कहा कि तुम अभी बच्चे हो, तुम हमारे राजा के लिए क्या कर सकते हो?

अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि एक वयोवृद्ध (शारीरिक रूप से विकसित) और एक मनोवृद्ध (मानसिक रूप से विकसित) के बीच अंतर होता है। इसके बाद पहरेदारों ने उसे अंदर जाने दिया।

राजा के सामने आते ही अष्टावक्र ने कहा “हे राजा, मैं आपको तुरंत मोक्ष की प्राप्ति करवा सकता हूँ।” एक बच्चे से यह सुनकर राजा जनक चकित हो गए, लेकिन अन्य असफल होने के कारण अष्टावक्र को आगे बढ़ने को कहा।

अष्टावक्र ने पूछा “हे राजा, क्या वह रत्नजड़ित हार, जो आपने अपना पहना हुआ है, आपका है?” राजा ने कहा ”नहीं, यह राज्य का है”।

तब अष्टावक्र ने पूछा ”हे राजा, क्या आपके राज्य की 10,000 गायें आपकी हैं? ”।

राजा ने उत्तर दिया कि वे राज्य की हैं।

अष्टावक्र ने तब पूछा ”हे राजा, क्या यह सुंदर महल जिसमें इतना सोना जड़ा हुआ है, आपका है? ”।

राजा ने कहा कि यह राज्य का है।

इस तरह अष्टावक्र राजा की बात पर सवाल पूछते रहे और हर बार राजा को कहना पड़ा कि राज्य का है।

अंत में अष्टावक्र ने पूछा, ”हे राजा, क्या आप मुझे कुछ भी नाम बता सकते हैं जो आपका है? ”।

इस पर राजा जनक बेहोश हो कर गिर पड़े। जब वह उठे, तो उन्होंने कहा ”मेरा कुछ नहीं है”।

तब अष्टावक्र ने कहा ”हे राजा, आपने मोक्ष प्राप्त कर लिया है।”

कहानी का सार –

इस कहानी में समाज के लिए एक संदेश है – “मेरा कुछ नहीं है”। साथ ही मनोवृद्ध और वयोवृद्ध ऐसे शब्द हैं जिन पर चर्चा की जानी चाहिए और इसका वर्तमान जीवन से संबंध होना चाहिए।

भारत के रहबरों को पेश-ए-ख़िदमत जस्टिस मार्कंडेय काटजू की नज्म |

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