क्वारंटाइन सेंटर किस तरह से कंसन्ट्रेशन कैंप में तब्दील हुए ?

क्वारंटाइन सेंटर की जमीनी हकीकत और सरकार की भूमिका | Quarantine Center’s ground reality and government’s role

जनपक्षधर स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने 20 मई 2020 को देश भर में हो रहे क्वारंटाइन सेंटरों में हो रही अव्यवस्था और लापरवाही पर झारखंड के संदर्भ में क्वारंटाइन सेंटर की जमीनी हकीकत (Truth of quarantine centers) और सरकार की भूमिका के विषय को लेते हुए ‘‘मैं बोल रहा हूं’’ फेसबुक पेज पर लाइव (Live on the “Main Bol Raha Hoon” Facebook page) के जरिये अपनी बातें रखी थी। आज के संदर्भ में इसके महत्व को समझते हुए इसे हूबहू यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

How did quarantine centers turn into a concentration camp?

आज क्वारंटाइन सेंटरों की सच्चाई को सामने लाने वाले पत्रकारों पर कई जगह मुकदमें भी हुए हैं, जहां मीडिया का बड़ा ग्रुप चुप है, सरकार की चापलूसी में लगा है, वहां बोलने  वाले पत्रकारों पर मुकदमा करना इस महामारी के दौर में भी चालू है। वैसे स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह भी अपनी लेखनी के कारण ही राजकीय दमन के शिकार हुए हैं और उन्होंने 6 महीने तक जेल-जीवन को भी भोगा है। इनके ऊपर काला कानून यूएपीए की आधा दर्जन धाराओं के अलावा आइपीसी व सीआरपीसी की कई धाराओं के तहत न्यायालय में मुकदमा लंबित है। फिलहाल ये जमानत पर बाहर हैं।

प्रस्तुतिः

इलिका प्रिय

सारे साथियों को इंकलाबी सलाम,

दोस्तों,

आप जान रहे हैं, पूरा देश आज लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और इस लॉकडाउन ने हमारे देश के लोकतंत्र ‘‘जिसे पूरी दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है’’ की सड़ांध को भी बाहर ला दिया है। आज इस लोकतंत्र की सड़ांध स्पष्ट रूप से दिख रही है कि किस तरह से हमारे देश की व्यवस्था, चाहे वह हमारा स्वास्थ्य व्यवस्था हो, चाहे पूरा सिस्टम हो, वह किस तरह से सड़ चुका है और किस तरह से उससे मवाद निकल रहा है?

साथियो,

आज हम आपलोगों से जिस विषय पर चर्चा के लिए मुखातिब हुए हैं, वह है झारखं डमें क्वारंटाइन सेंटरों की जमीनी हकीकत क्या है? इसमें सरकार की क्या भूमिका है और क्या होनी चाहिए? आज जब पूरे देश में कोरोना महामारी अपना विकराल रूप धारण करती जा रही है, और वह क्रम अभी शुरू ही हुआ है। शुरू से ही जिस समय से लॉकडाउन प्रारंभ हुआ, जिनपर भी सरकार को शक होता था कि इसमें कोरोना के लक्षण पाये जा रहे हैं, उन्हें क्वारंटाइन सेंटर में रखा जा रहा है। यह पूरे देश के अंदर तमाम राज्यों में हो रहा है। लेकिन 1 मई के बाद जब प्रवासी मजदूरों ’’जो अपने राज्यों से बाहर दूसरे राज्यों में काम कर रहे थे ’’की राज्य वापसी शुरू हुई, उसके बाद जब क्वारंटाइन सेंटरों की जरूरतें बढ़ी, जगह-जगह जरूरतें बढ़ने लगी और उसके बाद तमाम राज्यों ने क्योंकि उनके पास कोई सुविधा नहीं थी, जो लोकल स्वास्थ्य सुविधा है, अस्पताल है, स्थानीय तौर पर वे सारे नष्ट हो चुके हैं, सारे ध्वस्त हो चुके हैं, कहीं भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है, इस कारण से राज्य सरकार ने जगह-जगह पर स्कूलों को, सरकारी विद्यालयों को ही क्वारंटाइन सेंटर बनाना शुरू किया, घोषित करना शुरू किया। उसी में जो बाहर से लोग आ रहे थे, दूसरे प्रदेश में जो फंसे हुए थे और विभिन्न दुख-तकलीफ को झेलते हुए आ रहे थे, जिनमें बहुत सारे लोग मर गये, अपनी जान से उन्हें हाथ धोना पड़ा और कुछ लोग जो अपने राज्य में पहुंचे, अपने घरों में पहुंचे, लेकिन इस आशंका से, डर से कि अगर मैं अपने घर जाउंगा तो मेरे साथ-साथ मेरे कारण मेरे घर वाले भी उनसे संक्रमित हो सकते हैं, इसलिए कहीं 14 दिन, कहीं 21 दिन तक लोगों ने अपने आप को क्वारंटाइन सेंटरों में रखना शुरू किया, सरकार ने रखना शुरू किया।

उसके बाद यहां कि जो लोकल व्यवस्था थी, उसका असली रूप, किस तरह से वे जनविरोधी है? किस तरह से कंसन्ट्रेशन कैंप में तब्दील हुआ है? वह दिखना शुरू हो गया।

आज जब पूरे देश में हम क्वारंटाइन सेंटर की स्थिति को देखते हैं, आए दिन अखबारों में पढ़ते हैं, टीवी न्यूज चैनलों में तो बहुत कम दिखाया जाता है, कुछ वेब पोर्टल हैं उनपर खबरें आ रही हैं, कि देश के तमाम राज्यों की स्थिति इस मामले में एक सी ही है। देश के तमाम राज्यों के क्वारंटींन सेंटर एक यातना गृह में तब्दील हो चुका है, कंसंट्रेशन कैंप बन चुका है। किसी भी क्वारंटाइन सेंटर में न तो स्वच्छ पानी की व्यवस्था है, न तो शौचालय की व्यवस्था है, न तो मच्छर से बचाव की व्यवस्था है, न तो भरपेट खाना मिलता है। कहीं-कहीं मिलता भी होगा पर अधिकांश जगहों की यही स्थिति है। पिछले दिनों मैंने एक रिपोर्ट भी लिखी थी और लगातार अखबारों में खबरें आ रही थी कि किस तरह से बिहार के अंदर में जो क्वारंटाइन सेंटर बनाए गये हैं, प्रखंड लेवल पर, ग्राम लेवल पर वे सारे जो स्कूल थे, प्राइमरी स्कूल, हाई स्कूल, समुदायिक भवन जैसे जगहों पर बनाए गये थे। उन तमाम जगहों पर कहीं भी स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं थी। लगभग जगहों पर जो चापाकल है, उससे दुर्गंध करता हुआ पानी निकल रहा है। कहीं भी शौचालय की व्यवस्था नहीं हैं, लेकिन वहां पर रहने के लिए लोग मजबूर हैं और अगर लोग आवाज उठाते हैं, तो यातनाएं मिलती है।

बिहार के बांका जिला के शंभूगंज की खबर

पिछले दिनों खबर आई थी बिहार के बांका जिला के शंभूगंज की, जहां के विद्यालय में रह रहे लोगों ने खराब खाने को लेकर मिलकर आवाज उठाई, उनके खाने में कीड़ा मिल रहा था, उन्हें पानी जैसा दाल दिया जा रहा था तब उनपर पुलिस के जरिये लाठियां चलाई गयी और एक मजदूर का तो हाथ तोड़ दिया गया। जिसको लेकर काफी हंगामा भी हुआ, लेकिन उसके बाद भी स्थिति जस की तस है। आज भी पूरे देश के अंदर क्वारंटाइन सेंटरों की स्थिति यही है, यही आलम है और जो भी पत्रकार क्वारंटाइन सेंटरों की जो यह स्थिति है, अव्यवस्था है इसपर अपनी रिपोर्टिंग करते हैं, लोग आवाज उठाते हैं, तब उनपर झूठा मुकदमा लाद दिया जाता है।

पत्रकारों पर मुकदमें

पिछले दिनों आपने सुना होगा, हिमाचल प्रदेश में 6 पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज किये गये, उत्तर प्रदेश के सीतापुर में मुकदमे हुए, बिहार के सीतामढ़ी और बेगुसराय में भी मुकदमें पत्रकारों पर दर्ज हुए। क्यों? क्योंकि पत्रकारों ने सही रिपोर्टिग की।

पत्रकारों ने लिखा कि आपके क्वारंटाइन सेंटर में सुबह में सूखा चना दिया जाता है, सूखा चूड़ा दिया जाता है, उसने लिखा जो चावल दिया जा रहा है, वह घटिया क्वालिटी का है, दाल में सिर्फ पानी है। सिर्फ यह सच लिखने के आरोप में सीतामढ़ी के रीगा प्रखंड में जो क्वारंटाइन सेंटर था बुलाकीपुर गांव में, उस पर जब वहां के पत्रकार गुलशन कुमार मिठ्ठु ने रिर्पोटिंग की, जो दैनिक भास्कर में लिखते हैं, तो उनपर वहां के रीगा थाना में मुकदमा हुआ, और उनपर आरोप लगाया गया कि इन्होंने ही उन लोगों को भड़काया, विरोध प्रदर्शन करने को उकसाया। क्या लोगों को घटिया खाना मिल रहा है तो पत्रकार का दायित्व नहीं है, कि वो इस चीज को अपने अखबारों में छापे? वो लोगों को कहे कि हां आपका यह डाईट है कि क्वारंटाइन सेंटर में आपको यह मिलना चाहिए, आपको यह नहीं मिल रहा है, आपका यह हक बनता है।

और अगर क्वारंटाइन सेंटर में रह रहे लोग अपने हक अधिकार को जान जाए और उसको लेकर वे आवाज उठाए, नारे बुलंद करे तो क्या पत्रकारों पर मुकदमा कर देना चाहिए? मैं पूछना चाहता हूं नीतिश कुमार से भी।

इसी तरह बेगुसराय में एक पत्रकार अमित पोद्दार ने एक वीडियो बनाई, तो उन पर लॉकडाउन के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। जब पूरे देश के अंदर मीडियाकर्मियों को इस लॉकडाउन मे छूट दी गयी है, वे जा सकते हैं, रिपोर्टिंग कर सकते हैं, लेकिन यह ऊपर-ऊपर है। यदि धरातल पर आप सच्ची रिपोर्टिंग करेंगे, तो आपके ऊपर मुकदमा दर्ज होंगे और आपको जेल जाना पड़ सकता है। पर दोस्तों इसके बावजूद रिपोर्टिंग बाहर आ रही है। लॉकडाउन के दौरान जब लोग एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा पा रहे हैं, तब भी रोज ब रोज अखबार के पन्ने क्वारंटाइन सेंटर में हो रही अव्यवस्था, वहां के लोगों को हो रही परेशानी से रंगे पड़े हैं। झारखंड की स्थिति भी वही है।

झारखंड में खास करके क्वारंटाइन सेंटरों की जमीनी हकीकत क्या है?

यहां के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जिन्होंने 27 दिसंबर को सत्ता संभाली थी, उसके कुछ दिन बाद ही कोरोना महामारी आया और कोरोना के आने के बाद इन्होंने लगातार यह घोषणा किया, एक मई को जब थोकभाव में प्रवासी मजदूरों का आना शुरू हुआ, इन्होंने कहना शुरू किया, हम सभी लोगों को क्वारंटाइन सेंटर में रखेंगे, पूरी व्यवस्था देंगे। किन्हीं को भी कोई दिक्कत नहीं होने देंगे। लेकिन जमीनी हकीकत इन घोषणाओं से इतर है।

जमीनी हकीकत यह है कि क्वारंटाइन सेंटर में लोगों को नाश्ते के नाम पर मात्र चार पूड़ी दी जा रही है, खाना के नाम पर घटिया चावल और पानी वाला दाल दिया जा रहा है। रात में खाने में मात्र चार रोटी दी जा रही है। मैं पिछलें दिनों छः महीने जेल में रहा हूं और जेल में जो खाना की क्वालिटी थी मैं अखबारों को पढ़ते हुए वही सोच रहा था कि यहां तो जेल से भी बदतर खाना दिया जा रहा है।

क्या झारखंड का क्वारंटाइन सेंटर जेल में तब्दील हो गया है, यातना गृह में तब्दील हो गया है?

बेशक आप कह सकते हैं कि हां यहां का क्वारंटाइन सेंटर यातना गृह में तब्दील हो गया है। अभी जब मैं आज के ही अखबारों को पढ़ रहा था, तो मैं देख रहा था कि रामगढ़ जिला में ही रामगढ़ जिला के चितरपुर महाविद्यालय में क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है और वहां के लोगों का कहना है कि यहां न तो खाना है, न तो पीने को स्वच्छ पानी है, रात को तो मच्छर सोने ही नहीं देता है, न साबुन की व्यवस्था है, न सर्फ की व्यवस्था है, आखिर हम रहे कैसे? वहां के लोगों का कहना है कि यहां पर जो शौचालय है उसमें ताला बंद रहता है। सरकार घोषणा कर रही है कि खुले में शौच नहीं कीजिए, तो हमलोग शौच कहां पर करेंगे? रामगढ़ जिला के क्वारंटाइन सेंटर में रहने वाले लोगों का कहना है कि हमलोग झाड़ियों में शौच करने को मजबूर है। सभी लोगों को वहीं जाना पड़ता है, इससे संक्रमण का खतरा बढ़ेगा ही, रूकेगा नहीं।

धनबाद के डिगुवाडीह के क्वारंटाइन सेंटर का मामला

दूसरी तरफ आज के अखबार में मैंने खबर पढ़ी धनबाद के डिगुवाडीह में बीसीसीएल का एक कौशल विकास केंद्र है, उसी में एक क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। वहां पर वैल्लोर से, जहां काफी नामी अस्पताल है, कुछ लोग इलाज करके आए थे, उन लोगों को रखा गया है। उन लोगों का कोरोना टेस्ट के लिए सैंम्पल लिया गया, लेकिन दस दिन बीत चुके हैं, उन लोगों के कोरोना जांच का रिपोर्ट नहीं आया। वहीं फिर मुंबई से कुछ लोग आए हैं, महाराष्ट्र से आए हैं, उन लोगों को भी उसी क्वारंटाइन सेंटर में रख दिया गया है। वहां के लोगों ने कल भूख हड़ताल किया था, हंगर स्ट्राइक की थी, बहुत सारे लोगों की खबर छपी है, सभी लोगों का कहना है – न खाने की व्यवस्था है, न बिजली की व्यवस्था है, वहां रोज 3 से 4 घंटे बिजली कटती है, बिजली चले जाने के बाद मोमबत्ती की व्यवस्था नहीं है, न ही रात में मच्छरदानी की व्यवस्था है, न साफ-सफाई की व्यवस्था है। और आप जानते हैं वेल्लोर से जो लोग जांच कराकर आए होंगे, उन लोगों की जो रोग-प्रतिरोधक क्षमता होगी, वह काफी कमजोर होगी। लेकिन उसके बावजूद वहां पर कोई भी मेडिकल ऑफिसर या डॉक्टर को नहीं रखा गया है। एक तरह से क्वारंटाइन सेंटर में हम कह सकते हैं कि यदि एक भी बंदा कोरोना संक्रमण लेकर आया होगा, वह पूरा का पूरा क्वारंटाइन सेंटर में कोरोना को फैला देगा, क्योंकि सरकार की जो लचर व्यवस्था है, वहां पर फिजिकल डिस्टेंसिंग नाम की कोई चीज नहीं है। वहां पर न खाने की व्यवस्था है, न पीने के पानी की व्यवस्था है।

गिरिडीह बगोदर के तुकतुको गांव के हरिजन टोला का मामला

धनबाद जिले के गोमो में भी यह न्यूज छपी है कि वहां कि भी यही हालात है। मैं देख रहा था, दो-तीन दिन से गिरिडीह जिला में बगोदर प्रखंड है, वहां एक गांव में जब लोग वापस आए, तो उन लोगों के लिए क्वारंटाइन सेंटर की कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में स्कूल भी नहीं था। यह गिरिडीह के बगोदर के तुकतुको गांव के हरिजन टोला का मामला है। उनलोगों ने जंगल में जाकर प्लास्टिक का तंबू लगाया, बांस लगाया। वे महाराष्ट्र से आए थे, मुंबई से आए थे, इसलिए चाहते थे कि हमारे परिवार में हमारे कारण संक्रमण न फैले, इसलिए जंगल में तिरपाल व प्लास्टिक का तंबू गाड़ दिया है। वहीं पर रह रहे हैं, घर से खाना मंगाते हैं, वहीं खाते हैं। सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं है। स्वाभाविक सी बात है कि जब वहां पर उन्होंने तंबू गाड़ा है, तब लैटरिंग रूम तो बनाया नहीं होगा, वे खुले में शौच कर रहे होंगे, मच्छरों से उनका डरना स्वाभाविक है, उनलोगोंं का अखबार में बयान छपा था, मुझे कोरोना से नहीं सबसे अधिक डर सांप और बिच्छू से लग रहा है। अभी जो मौसम खराब हो रहा है जिस तरह से लगातार बज्रपात हो रहे हैं, उस तरह से जो ठनका गिर रहा है, उससे मौत का डर लग रहा है।

पत्रकार क्या कर सकता है?

आज ही लातेहार के साधना न्यूज में काम करने वाले एक पत्रकार दोस्त से बात हो रही थी, उन्होंने बताया कि लातेहार जिला की स्थिति भी जस की तस है, वे बता रहे थे कि सरयू जगह से क्वारंटाइन सेंटर में रह रहे एक लड़के का कॉल आया, वह रो रहा था कि भइया यहां पर कोई व्यवस्था नहीं है, न सो पाते हैं, न खा पाते हैं, न पानी पी पाते हैं क्या करें, वे काफी रो रहे थे।

मेरे पत्रकार दोस्त भी काफी दुखी थे, हम लोग क्या कर सकते हैं? पत्रकार क्या कर सकता है?

दोस्तों, ऐसी जगह पर पत्रकार आवाज उठा सकता है। पत्रकार चीजों को सामने ला सकता है। इससे ज्यादा एक पत्रकार और क्या कर सकता है? और उन चीजों को सामने लाने में भी जिस तरह से पत्रकारों पर मुकदमे हो रहे हैं, झारखंड में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, लेकिन अब वे दिन दूर नहीं जब यहां भी होंगे। यहां पर भी क्वारंटाइन सेंटर की सच्चाई लगातार सामने आएंगी, तो यहां भी पत्रकारों पर मुकदमें होने ही होने हैं, क्योंकि तमाम सरकारों का चरित्र एक ही जैसा है, चाहे कांग्रेस की सरकार हो, चाहे बीजेपी की, जेएमएम की सरकार हो। मैं नहीं मानता इनका चरित्र अलग-अलग है, कि बीजेपी मुकदमें करेंगी और कांग्रेस नहीं करेगी, जेएमएम नहीं करेगी।

घर में भी कमरे नहीं कि होम क्वारंटाइन रह सके

आज ही बगोदर प्रखंड का एक और न्यूज छपा था, कि किस तरह से अटका पंचायत के कसियाटांड़ में लोगों ने जिरामों पहाड़ है, वहां पर स्कूल नहीं हैं, लोग क्या करेंगे? वे पहाड़ पर ही तंबू गाड़कर रह रहे हैं, सरकार की व्यवस्था नदारद है। सरकारी व्यवस्था नहीं मिल रही है। इसी तरह 17 मई को बोकारो जिला के नावाडीह में प्रोटेस्ट हुआ, वहां के लोगों ने प्रदर्शन किया, उन लोगों का भी कहना था, जो बोकारो जिला के नावाडीह के ऊपरघाट में बिरसा मुंडा इंटर कॉलेज हैं, वहां पर क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। वहां 20-25 मजदूर रह रहे हैं, उन लोगों का कहना था, यहां तो न लाइट की व्यवस्था है ,न पानी की व्यवस्था है न खाने की व्यवस्था है। कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन हम घर इसलिए नहीं जा रहे हैं कि हमारे घर में इतने कमरे नहीं है इतने रूम नहीं हैं, कि मैं एक स्पेशल रूम में होम क्वारंटाइन कर सकूं, ये झारखंड की हकीकत है, यहां के ग्रामीण इलाके में यदि आप जाएंगे, तो यहां के 90 प्रतिशत घरों में, 90 प्रतिशत लोगों के पास इतने कमरे नहीं है, अतिरिक्त कमरे नहीं है, कि उनके घर में यदि बाहर से लोग आ रहे हैं, तो एक रूम स्पेशल 14 दिन तक उनको होम क्वरंटाइन के लिए दिया जाए। लोग किसी तरह से रहते हैं। दो रूम तीन रूम में ही सास-ससुर, पतोहू, दामाद जो लोग आते हैं एक ही रूम में रहने को विवश हैं।

कोई व्यवस्था नहीं, होम क्वारंटाइन की

यह झारखंड की सच्चाई है और ऐसे में झारखंड सरकार कह रही है झारखंड सरकार की तरफ से कल बुलेटिन जारी होता है, हर रोज रात के 9 बजे कोविड-19 बुलेटिन! उसमें कहा गया है, घोषणा किया गया है, अभी झारखंड के अंदर 1 लाख 96 हजार 7 सौ 63 लोग होम क्वारंटाइन में है।

मैं कहना चाहता हूं दोस्तों! यह होम क्वारंटाइन नाम की कोई चीज झारखंड के अंदर गांवों में देखने को नहीं मिल रही है। लगातार खबरें आ रही है कि जो भी अभी भी लोगों को होम क्वारंटाइन का मोहर लगाकर भेज दिया जा रहा है कि इन्होंने 14 दिन रहने की मियाद है उसको पूरा कर लिया है और अब ये अपने घरों में रह सकते हैं। गांवों में जो लोग होम क्वारंटाइन के नाम पर रह रहे हैं, उनकी स्थिति यही है कि उनके पास इतने कमरे उपलब्ध तो नहीं है, कि वे होम क्वारंटाइन रहेंगे, तो वे गांव में घूम रहे हैं, फिर रहे हैं, जिसके कारण गांव में भी अफवाह का माहौल गर्म है। लगातार गांवों से खबरें आ रही है, कि इस तरह से रहेगा तो लोगों को सरकारी क्वारंटाइन सेंटर में भेजिए।

मैं कल ही अखबारों में पढ़ रहा था कि रामगढ़ जिला के ही दुलमी प्रखंड में वहां के उसरा गांव के मुखिया का बहुत सारी महिलाओं ने घेराव किया और उस मुखिया के घेराव का कारण यही था कि महिलाओं का कहना था कि मेरे गांवों में जो होम क्वारंटाइन के नाम पर लोगों को भेजा गया है, उनलोगों को सरकारी क्वारंटाइन सेंटर में रखा जाए, क्योंकि किसी के पास भी, किसी के घर में भी चार कमरे, पांच कमरे नहीं है कि चार कमरे में खुद रहेंगे और एक कमरे में उसको रखेंगे। इसलिए वे लोग गांव में घूम रहे हैं। यह है झारखंड में होम क्वरंटाइन के नाम पर घर भेजने की सच्चाई।

सरकारी व्यवस्था में अन्य बीमारियों को दावत

दूसरी तरफ जो सरकारी आंकड़ा कहता है, यहां के सरकारी क्वारंटाइन सेंटरों में 64425 लोग हैं तो मेरा कहना है कि इन 64425 लोगों में से अधिकांश लोग यातनागृह में रहने को मजबूर है। वे वहां पर जेल से भी खराब जीवन गुजारने को विवश है। मैं कहना चाहता हूं दोस्तों झारखंड सरकार जब प्रवासियों को दूसरे राज्यों से यहां बुला रही थी, जो मजदूर दूसरे राज्यों से तमाम दुख-तकलीफ को झेलते हुए अपने राज्यों में आए हैं, तो क्या वे यही दिन देखने के लिए आए हैं कि मुझे दाल के नाम पर पानी मिलेगा, मुझे भात में कीड़ा मिलेगा, मुझे खाने के लिए सिर्फ चार पूड़ी दी जाएगी? चार पूरी तो एक बच्चा खाता है, फिर एक मजदूर जो शारीरिक श्रम करता है, शारीरिक श्रम करने वाले लोग आठ से दस रोटी खाते हैं, तो क्या आप उन्हें आधा पेट खिलाकर उन्हें मारना चाहते हैं? वे कोरोना से तो बाद में मरेंगे पहले वे भूख से मर जाएंगे।

अभी जो झारखंड के अंदर की स्थिति है, यहां के ग्रामीण इलाके में मलेरिया काफी संख्या में पाया जाता है। जब आप रात में उनके सोने की व्यवस्था नहीं करेंगे, उनके मच्छरदानी की व्यवस्था नहीं करेंगे, तो उनको मच्छर काटेंगे और स्वाभाविक-सी बात है कि उनको मलेरिया होगा। यह क्वारंटाइन सेंटर एक तरह से आने वाले बीमारियों के लिए रास्ता खोल रही है। खास करके मलेरिया, ब्रेन मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए।

क्वारंटाइन सेंटर से भागने की सच्चाई

इसके साथ ही लोगों में फ्रस्टेशन आ रहा है, इस कारण बहुत लोग क्वारंटाइन सेंटरों से भाग जा रहे हैं। 17 मई को चाईबासा में (चाईबासा एक जिला है) वहां एक टाटा कॉलेज है और टाटा कॉलेज के कम्पाउंड में एकबहुदेशीय भवन है, मल्टीपरपस हॉल है यूनिवर्सिटी का, वहां पर क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। वहां पर सैकड़ों लोगों को रखा गया है, यह शहर के बीच की स्थिति है। वहां की हालत सुनिये 17 मई को वहां से 24 मजदूर भाग रहे थे, भागते हुए उन लोगों को पुलिस ने रोका, तो पुलिस को उन्होंने बताया कि वहां पर हमें खाना नहीं मिल रहा है, सुबह में पोहा दिया गया, वहां पर महिला और बच्चे थे, बच्चों को पोहा पसंद नहीं, बच्चे पोहा खा नहीं पा रहे है। किन माता-पिता को अपने बच्चों का भूखा रहना पसंद आएगा? कौन मां-बाप चाहेगा कि मेरा बच्चा भूखा रहे? और किनसे अपने बच्चे का भूखा पेट देखा जाएगा? इस स्थिति में वे लोग क्या करते? उन लोगों ने कहा बच्चे की भूख हमसे बर्दाश्त नहीं हुई और हमलोग वहां से भागकर अपने गांव जा रहे है, चाहे जैसा भी होगा, हमलोग रह लेंगे। उनलोगों ने पुलिस को बताया कि कल दोपहर में जब खाना आया 20 लोगों का खाना ही घट गया था। 100 लोग हैं और 100 लोगों में 20 लोगो का खाना घट जा रहा है, तो लानत है आपकी व्यवस्था पर। आप किस तरह का खाना ला रहे हैं, कि 20 लोगों का खाना घट जा रहा हैं?

हजारों में चंद ट्वीट पर संज्ञान

पूरे झारखंड के अंदर में लगभग जगहों, ग्रामीण जगहों पर खास कर स्थिति यही है। न यहां पर भर-पेट खाना है, न खाने की क्वालिटी अच्छी है, न पीने का स्वच्छ पानी है और न ही बिजली की व्यवस्था है। बिजली प्रतिदिन 3-4 घंटे तो कहीं पांच घंटे रहती है और कहीं-कहीं तो बिजली है ही नहीं, फिर भी सरकार का इसपर कोई नजर नहीं रहा। जगह-जगह जब बात होती है, लोग सवाल उठाते हैं, तब कहीं कुछ होता है। वह भी न्यूनतम।

मैंने आज एक ट्वीट किया, रामगढ़ चितरपुर महाविद्यालय का जो बताया मैंने तब यहां झारखंड पुलिस मुख्यालय से रिप्लाई आया कि हां हम उस पर संज्ञान ले रहे हैं, उस पर कार्रवाई करेंगे। इसी तरह से पिछले दिनों गिरिडीह जिला के बिरनी प्रखंड में चरघरा में एक स्कूल है, वहां पर जो क्वारंटाइन सेंटर था, वहां जो स्कूल था उसका चापाकल खराब पड़ा था, बिजली की व्यवस्था नहीं थी, पानी की व्यवस्था नहीं थी, तो एक अजय सिंह नामक लोकल लड़के ने वहां पर ट्वीट किया, फिर उसको न्यूज-18 की पत्रकार प्रेरणा ने ट्वीट किया। जब बड़ी पत्रकार ट्वीट करती है, तो तुरंत हेमंत सोरेन जगते हैं, इसपर फिर एक्शन लेते हैं और गिरिडीह डीसी को कार्रवाई के लिए कहते हैं। और दूसरे ही दिन वहां पर चापाकल ठीक हो जाता है। एक चापाकल तो ठीक हो गया मगर पूरे झारखंड के अंदर रोज ब रोज हजारों ट्वीट हेमंत सोरेन को टैग करते हुए हो रहे हैं। रोज-ब-रोज यहां की समस्याओं को दिखाया जा रहा है कि किस तरह से क्वारंटाइन सेंटर एक कन्सनट्रेशन कैंप में तब्दील हो गया है। किस तरह से लोग घुट-घुट कर रहने को मजबूर हैं? किस तरह से यहां के क्वारंटाइन सेंटर में, रेड जोन से आए व्यक्तियों और ग्रीन जोन से आए व्यक्तियों को साथ में रखा जा रहा है? इसके बावजूद भी प्रशासन न तो चेतती है, न कोई एक्शन लेती है।

क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर एक बड़ा घोटाला

दरअसल मेरे ख्याल से क्वारंटाइन सेंटर के नाम से एक बड़ा घोटाला झारखंड के अंदर व पूरे देश के अंदर हो रहा है। झारखंड में प्रति व्यक्ति सरकार कितने रूपये खर्च कर रही है, यह पता लगाने की कोशिश की तो कुछ लोगों ने कहा 2440 रूपये, कुछ लोगों ने कहा अभी पता नहीं है। मैं कन्फर्म नहीं हूं, वैसे मैंने आज ट्वीट करके मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछा है, आप प्रति व्यक्ति कितने रूपये खर्च कर रहे हैं क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर, वहां रह रहे लोगों पर? देखना है रिप्लाई क्या आता है?

वैसे मैं गूगल में जब सर्च कर रहा था तो पाया, राजस्थान सरकार के द्वारा 2440 रूपये प्रतिदिन एक क्वारंटाइन सेंटर के व्यक्ति पर खर्च होता है। लेकिन झारखंड की जो स्थिति है, जो देखने से लगता है, जमीनी हकीकत के अवलोकन से लगता है कि यहां पर ज्यादा से ज्यादा रोज 50 रूपये एक बंदे पर खर्च हो रहा है। नावाडीह बिरसा मुंडा इंटर कॉलेज की बात करें, तो वहां पर रह रहे 20-25 लोगों को पहले खाना भी नहीं दिया गया था, कुछ दिया ही नहीं गया। जब उन लोगों ने लगातार जिला परिषद्, मुखिया से कहा तो एक पैकेट चावल, पांच किलो दाल, पांच किलो आलू, एक किलो सरसों तेल दे दिया गया। क्या यहां के पदाधिकारी, यहां के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जितने भी लोग हैं, वो क्या सिर्फ आलू का सब्जी खाते हैं? क्या वे रात में रोटी नहीं खाते हैं? क्या वे दिन-रात चावल खाकर रहते हैं? फिर आपने किस हिसाब से नावाडीह में जो लोग है, प्रखंड के ऊपरघाट स्थित बिरसा मुंडा इंटर कॉलेज में जो क्वारंटाइन सेंटर है वहां के लोगों को चावल-दाल, आलू, सरसों तेल दे दिया। क्या एक किलो सरसों तेल में 14 दिन लोग रह जाएंगे?

बहुत सारे जगहों पर लोग घर से खाना लाकर खाने को मजबूर है। अब जो घर से खाना लाकर देगा, उसमें संक्रमण तो होगा, आप जिस तरह से क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर धांधली कर रहे हैं, पूरे झारखंड के अंदर यह आप कोरोना के संक्रमण को और फैलाने का ही काम कर रहे है। इससे कोरोना का संक्रमण और भी तेज गति से बढ़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है। झारखंड के अंदर एक तरह से हम कह सकते हैं कि यही जमीनी हकीकत है कि यहां कोई भी व्यवस्था झारखंड सरकार की तरफ से नहीं है और सरकार की भूमिका नगण्य है। सरकार अपने लोकल जनप्रतिनिधियों पर मुखिया, वार्ड मेंबर और जो पंचायत अधिकारी हैं, उनपर छोड़ दे रहे हैं और मॉनिटरिंग कर रहे हैं बीडीओ, सीओ, ये लोग न तो पंचायत में विजिट कर रहे हैं, न जा रहे हैं। यह आलम है भ्रष्टाचार का नीचे से ऊपर तक का। स्वाभाविक सी बात है हमारे देश में जब एक सड़क बनने के लिए अगर बीस हजार रूपये पास होते हैं, तो मात्र दो हजार रूपये के ही सड़क बनते है। उसी तरह से क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर अगर हमारे पत्रकार दोस्त की बात सच हो कि 2440 रूपये मिलता हो, तो फिर हम कहते हैं कि यहां पर मात्र 50-60 रूपये ही खर्च हो रहा है और सारा पैसा पूरी जो मशीनरी है नीचे से ऊपर तक, उनके पेट में जा रहा है। एक बड़ा घोटाला, एक बड़ा घपला क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर यहां पर चल रहा है और क्वारंटाइन सेंटर में व्यवस्था नगण्य है।

जनकल्याणकारी राज का चरित्र

और सरकार जो खुद को जनकल्याणकारी बता रही है, उस कल्याणकारी का भेष स्पष्ट रूप से नंगी आंखों से दिख रहा है। दोस्तों, यह सिर्फ झारखंड की स्थिति नहीं है, पूरे देश की स्थिति है। जैसा मैंने कहा और स्वाभाविक-सी बात है जब कोई भी राज्य, कोई भी देश जन कल्याणकारी नहीं होगा, जब कोई भी देश, जैसे हमारे देश की व्यवस्था है, अर्ध-सामंती व अर्ध-औपनवेशिक, एक शोषण पर टिका हुआ समाज है, ऐसी एक पूरी समाजिक व्यवस्था है, तब स्पष्ट सी बात है समाज के सबसे नीचले पायदान में जो रहने वाले लोग हैं, उनका इस तरह से शोषण होगा। आप देखिए क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर ही आज इस होम क्वारंटाइन में किनको भेजा गया है, आज जितने भी लोग बाहर से जैसे कोटा से स्टूडेंट आए, वे लखपति-करोड़पति के बच्चे थे, कितने लोग क्वारंटाइन सेंटर में है? वे नहीं है। वे अपने घर में हैं, होम क्वारंटाइन में है, उनके लिए कोई दिक्कत नहीं है। लोग कह रहे हैं कि ये बीमारी अमीरों और गरीबों दोनों के लिए है। लेकिन ऐसी बात नहीं है।

आप क्वारंटाइन को ही लेकर देख लीजिए, झारखंड में ही देख लीजिए, क्वारंटाइन सेंटर के नाम पर उसके अंदर भी जब बड़े-बड़े लोग आते हैं, तो उनको होम क्वारंटाइन किया जा रहा है, उनके लिए पूरी व्यवस्था है। लेकिन जो गरीब लोग हैं, उन्हें ऐसे क्वारंटाइन सेंटर में भेजा जा रहा है, जहां दाल के नाम पर पानी मिल रहा है, चावल में कीड़े मिल रहे हैं। रात में गर्मी में मरिये, इतनी गर्मी का मौसम है आप समझ सकते हैं, मई का आखिरी दिन चल रहा है, न बिजली की व्यवस्था है, न पानी की व्यवस्था है। खाने के नाम पर तो कुछ है ही नहीं। अब रेड जोन से मुंबई के धारावी से लोग आए हुए हैं और ग्रीन जोन से जो लोग आए हुए है दोनों को एक ही जगह में रख दिया गया है।

लोकतंत्र के मायने

मेरा कहना है कि आज की जो व्यवस्था है, तथाकथित लोकतंत्र है, जो कहा जा रहा है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, वास्तव में यह लोकतंत्र क्या होता है? जनता के लिए जनता के द्वारा जनता का राज!  क्या हमारे देश में ऐसा है? नहीं है। यह शोषण पर टिकी व्यवस्था है। शोषण पर टिकी व्यवस्था में हमेशा एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन करता है। और आज जो गरीब लोग इस यातनागृह में रहने को मजबूर हैं, रह रहे हैं, वह सिर्फ इसलिए रह रहे हैं कि वे गरीब हैं। वे समाज के सबसे दबे-कुचले लोग हैं। उनके पास भी करोड़ो रूपये होते, तो वे भी अपने आप को बहुत ही आलिशान घरों में क्वारंटाइन करते, उनकी भी एक छींक से पूरी मशीनरी जग जाती, उनके लिए भी पंखे, बिजली और जेनरेटर की व्यवस्था होती, आज के दिन में गरीबों का कहीं कुछ नहीं है। पूरे परिदृश्य में कहा जा सकता है कि झारखंड में क्वारंटाइन सेंटर की जो व्यवस्था है, काफी दयनीय है। जमीनी हकीकत काफी ही खराब है और रोज ब रोज तमाम चीजों को छुपाने के बाद भी हम प्रिंट मिडिया में चाहे कोई अखबार उठाकर देख लें, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण तमाम कोशिशें करती हैं इनको छुपाने की भी, उनके जरिये भी लगातार चीजें सामने आ जा रही है। इसी का एक भय जो क्वारंटाइन सेंटर में अव्यवस्था है, इसी के भय के कारण झारखंड के अंदर कहीं भी घनी आबादी के अंदर जो स्कूल है, वहां पर लोग क्वारंटाइन सेंटर बनने नहीं देना चाहते हैं।

प्रदर्शन के कारण 

लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं, रामगढ़ जिला के गिद्दी प्रखंड में लगातार मैंने देखा कि प्रोटेस्ट हुआ, पोचरा में जो रामगढ़ छावनी परिषद में ही है, वहां भी प्रोटेस्ट हुआ, उन लोगों का बस एक ही डिमांड था कि हमारे स्कूल में आप क्वारंटाइन सेंटर नहीं बनाइए, क्योंकि यहां कोई व्यवस्था नहीं है। यहां लोग आएंगे तो शौचालय के लिए बाहर जाएंगे ही, यहां खाने-पीने की व्यवस्था है नहीं और आपलोग कीजिएगा नहीं, लोग भूखे रहेंगे, हम लोगों से देखा जाएगा नहीं और हमलोग उनकी मदद में जाएंगे। स्वाभाविक सी बात है हममें संक्रमण फैलेगा। आज झारखंड में एक लेबल पर यह भी प्रोटेस्ट चल रहा है, हम अपने गांव में घनी आबादी वाले इलाके में क्वारंटाइन सेंटर बनने नहीं देंगे। उसके पीछे पूरे झारखंड के अंदर क्वारंटाइन सेंटर की जो अव्यवस्था है, उस अव्यवस्था का डर है उस अव्यवस्था के डर के कारण ही क्वारंटाइन सेंटर को अपने गांव के स्कूलों में बनने नहीं देना चाहते हैं। यह पूरी की पूरी स्थिति है।

सरकार की भूमिका

सरकार की भूमिका एक तरह से लोगों को क्वारंटाइन सेंटर में यातना देने की हो गयी है। सोशल मीडिया के हमारे दोस्त लोग हैं, उन्हें लगता है कि झारखंड के अंदर बहुत अच्छा काम हो रहा है, और ट्वीटर से ही सारे कुछ का समाधान कर दिया जा रहा है, उन दोस्तों को मैं कहना चाहता हूं, दोस्त एक बार झारखंड आइए झारखंड के गांव में जाइए और आप भी ट्वीट कीजिए। आप भी 50 ट्वीट करके देखिए, कौन-कौन से आपके ट्वीट पर सरकार संज्ञान लेती है? और कौन-कौन से समस्या का समाधान हो जाता है? मैं भी लगातार ट्वीट करता हूं और शायद ही कभी महानुभाव की आंख खुलती है और कभी रिप्लाई आ जाता है। तो यह झारखंड की स्थिति है। बहुत दयनीय स्थिति है और सरकार की भूमिका नगण्य है।

शोषण रहित समाज ही विकल्प

Rupesh Kumar Singh Freelance journalist Jharkhand

अंतिम में मैं सिर्फ एक ही बात कहना चाहूंगा, कि अगर आप सरकार की भूमिका चाहते हैं, चाहते हैं कि तमाम लोगों को सरकार की तरफ से एक नजरिये से देखा जाए, तमाम लोगों की जिम्मेवारी उनके स्वास्थ्य की, उनके खाने की, रहने की, रोजगार की जिम्मेवारी सरकार उठाए, तो फिर आपको इस तरह की व्यवस्था से, इस तरह के शोषण पर टिकी व्यवस्था से उम्मीद नहीं करना चाहिए, आपको इस शोषण पर टिकी जो पूरी व्यवस्था है इसके खिलाफ खड़ा होना होगा। और आपको एक ऐसे समाज के लिए, ऐसे व्यवस्था के लिए प्रयत्न करना होगा, जिसमें कि कोई शोषण नहीं हो। एक शोषणरहित समाज की लड़ाई में आपको आगे आना होगा। आपको, जो लड़ रहे हैं शोषणरहित समाज की लड़ाई, उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा, तभी वास्तविक में जनता के प्रति सरकार की क्या भूमिका होती है आप समझ पाएंगे। जब आप जनता की सरकार बनाएंगे, जब आप सर्वहारा के हाथों में सत्ता की चाबी देंगे, बागडोर सौंपेंगे, जब ऐसा शोषणरहित समाज बनेगा, तभी सभी लोगों के लिए बराबरी की हम सरकार की तरफ से ऐसी आशा कर सकते हैं। लेकिन इस तरह की सरकार से यह आशा करना ही बेईमानी है कि वे तमाम लोगों के लिए एक तरह की व्यवस्था करेगी। यही निष्कर्ष है पूरे देश का, झारखंड में भी यही स्थिति है कि वहां पर गरीब लोग रहने पर मजबूर है और अमीर लोग बढ़ियां से है। दस दिन से वेल्लौर से आए हुए लोग अपने जांच के लिए तरस रहे हैं, उन्हें रिपोर्ट नहीं मिली है, लेकिन जो पैसे वाले लोग हैं, उनका दो दिन में जांच रिपोर्ट आ जा रहा है। इस तरह से पूरा क्वारंटाइन सेंटर में भी गरीबों को मार दो उनका कौन बोलने वाला है, जो विरोध करते हैं उनके विरोध को लोकल स्तर में दबा दो और पत्रकार यदि इनकी बातों पर ज्यादा उछल रहा है, बोल रहा है तो एफआईआर करो।

जिस तरह सीतामढ़ी के बेगुसराय में हुआ, जिस तरह हिमाचल प्रदेश में हुआ, जिस तरह से उत्तर प्रदेश में हुआ, सीतापुर में हुआ, उस तरह झारखंड में भी हो सकता है, कोई बड़ी बात नहीं है।

इसी एक लाइन के साथ हम अपनी बात को खत्म करना चाहेंगे, कि झारखंड में क्वारंटाइन सेंटर की स्थिति बहुत ही खराब है, क्वारंटाइन सेंटर एक यातनागृह में तब्दील हो गया है, कंसनट्रेशन कैंप में तब्दील हो गया है, सरकार इस ओर से अपनी आंखें बंद किये हुए हैं और कभी-कभी नजर इसपर पड़ती है, तो कुछ एक्शन हो जाते हैं, बहुत ज्यादा एक्शन नहीं हो रहा है, इसी बात के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं आप लोगों ने मुझे सुना इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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