Home » Latest » जानिए स्मोक डिटेक्टर कैसे काम करते हैं?
Things you should know

जानिए स्मोक डिटेक्टर कैसे काम करते हैं?

How do fire alarms ‘smell’ smoke?

इस खबर में चर्चा की गई है कि स्मोक डिटेक्टर कैसे काम करते हैं, स्मोक डिटेक्टर क्या है, Smoke Detector (स्मोक डिटेक्टर) कितने प्रकार के होते हैं, भारत में स्मोक डिटेक्टर की कीमत कितनी है (Smoke Detectors – Smoke Sensor Latest Price)…

धुआँ सूँघक या स्मोक डिटेक्टर आग से बचाव के लिए इस्तेमाल में लाया जाने वाला एक छोटा सा उपकरण है जिसकी तस्वीर ऊपर देखी जा सकती है। घरों, बहुमंजिली इमारतों, होटलों और शॉपिंग मालों में आग से सावधान करने के लिए इनका महत्वपूर्ण योगदान है। स्मोक डिटेक्टर की कीमत भी कुछ नहीं सबसे सस्ता लगभग 500 रुपए का मिल जाता है, आकार भी छोटा सा यानि 8 से 12 से मी व्यास का घरेलू उपयोग के लिए बढ़िया रहता है।

स्मोक डिटेक्टर को 9–12 वोल्ट की बैटरी से चलाया जा सकता है।

स्मोक डिटेक्टर के दो भाग होते हैं— एक तो मुख्य यंत्र जो धुआँ सूघता है और दूसरा एक जोरदार हार्न या अलार्म यानि भोंपू जिसका काम होता है लोगों को चेताना।

स्मोक डिटेक्टर कितने प्रकार के होते हैं

सूँघने वाले यंत्र दो तरह के हो सकते हैं—

पहले देखते हैं कि फोटोइलेक्ट्रिक सूँघक किस तरह काम करता है। फोटोइलेक्ट्रिक सूँघक (Photoelectric Smoke Alarm,) का संधि विच्छेद करें तो फोटो का मतलब है प्रकाश फोटोन से यानी प्रकाश ऊर्जा को लेकर चलने वाला अति सूक्ष्म कण, इलेक्ट्रिक का अर्थ है विद्युत से और सूँघक यानि डिटेक्टर जो इन दोनों के प्रभाव से मिलकर बनता है और काम करता है। फोटो इलेक्ट्रिक सिद्धांत (Photo electric principle) के अनुसार कुछ पदार्थों पर यदि प्रकाश पड़ता है तो उससे इलेक्ट्रॉन उत्पन्न होते हैं और फिर विद्युतधारा का प्रवाह उत्पन्न हो जाता है।

सूँघक पर फोटोन की जितनी ऊर्जा पड़ेगी उतनी ही विद्युत धारा और वोल्टेज यानी विभवहृ उत्पन्न करेगा और यदि बिलकुल प्रकाश नहीं पड़ेगा तो धारा बिलकुल उत्पन्न नहीं होगी।

सामान्य स्थिति में प्रकाश सूँघक की ओर नहीं आता है। लेकिन यदि इस स्थान पर धुआँ होता है तो धुएँ के कणों से प्रकाश बिखर जाता है और कुछ प्रकाश सूँघक की ओर चला जाता है। जैसे ही प्रकाश सूँघक की ओर जाता है विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है और पीछे जुड़ा हुआ सर्किट चालू हो जाता है। इस सर्किट के चालू होने से इसमें जुड़ा हुआ अलार्म बजने लगता है।

आयोनाइजेशन सूँघक

ये सूँघक (ionization smoke detectors) काफी कम धुएँ में काम कर सकते हैं और सस्ते भी होते हैं। इसमें एक  नाभिकीय या रेडियोएक्टिव तत्व अमेरीसियम–241 होता है जो अल्फा कणों का अच्छा स्रोत है। अल्फा किरणें घातक नहीं होतीं इसलिए स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं हैं। सूँघक के अंदर इनकी मात्रा बहुत कम यानी 1 माइक्रोग्राम होती है।

आयोनाइजेशन स्मोक डिटेक्टर के काम करने का सिद्धांत बहुत ही सरल है। दो विपरीत आवेशित प्लेटों के बीच अमेरीसियम के कणों द्वारा बनी हुई अल्फा किरणें प्लेटों के बीच मौजूद नाइट्रोजन और ऑक्सीजन गैस के अणुओं को आयनीकृत कर देती हैं। इस प्रक्रिया में नाइट्रोजन व ऑक्सीजन गैस के अणुओं के बाहरी इलेक्ट्रॉन निकल जाते हैं और ये अणु धनावेशित हो जाते हैं। धनावेशित और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन क्रमश: विपरीत आवेशित प्लेटों की ओर प्रवाहित होते हैं। जिससे विद्युत धारा का प्रवाह होता है। इस सूँघक में इलेक्ट्रानिक्स इस तरह की होती है कि वह कम से कम विद्युत धारा के प्रवाह को भी माप सके। जब धुआँ इस प्रवाह के बीच में आता है वह इस आयनीकृत ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के अणुओं से चिपक जाता है और उनको आवेशहीन या न्यूट्रल बना देता है। इससे विद्युत धारा का प्रवाह कम हो जाता है। इस कमी को सूँघक की इलेक्ट्रानिक्स द्वारा माप लिया जाता है और यह अलार्म बजा देता है।

What does the ionization smoke detector look like from inside

आइये अब देखते हैं कि आयोनाइजेशन स्मोक डिटेक्टर अंदर से कैसा दिखता है। इसमें एक बक्सा है जिसमें आयनीकरण होता है। यहीं स्थित होता है अमेरीसियम एक अलार्म और बाकी इलेक्ट्रानिक्स। है न एक छोटी सी चीज पर कितने काम की और कितने सरल सिद्धांत पर काम करती है। यही है विज्ञान की विशेषता, इन्हीं सरल सिद्धांतों को खोजने में बड़े-बड़े-वैज्ञानिकों ने अपना जीवन लगा दिया। हम इस कड़ी मेहनत का महत्व तभी जान पाते हैं जब यह मूर्त रूप में हमारे सामने आता है और हमारे जीवन में क्रांति लाता है।

आशीष गर्ग

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित)

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

हमारे बारे में देशबन्धु

Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

Check Also

dr. bhimrao ambedkar

65 साल बाद भी जीवंत और प्रासंगिक बाबा साहब

Babasaheb still alive and relevant even after 65 years क्या सिर्फ दलितों के नेता थे …

Leave a Reply