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अपराधियों में कानून का खौफ कैसे हो?

अपराधियों में कानून का खौफ कैसे हो?

समाज में अपराध नियंत्रण कैसे हो? How should there be crime control in the society?

जब-जब कोई भयंकर आपराधिक घटना होती है तो हिस्टीरिया जैसा दौर लोगों को पड़ता है। धरना, प्रदर्शन, बलवा, आगजनी, गाली, गलौज, मोमबत्ती जलूस तक होने लगता है। जिसके मन में जो आये वही समस्या का समाधान है। आम लोग तो छोड़िये जो लोग संसद में बैठे हैं, वे लोग तक जंगल के कानून के अनुसार सजा की मांग करके विधवा विलाप करने लगते हैं।

विधानमण्डलों में बैठे इन नासमझ, नालायकों की वजह से इस देश में कानून व्यवस्था आज तक सही नहीं हो पाई है और ऐसे नालायकों को चुनने की गलती हमने की है। हम इन्हें चुनते हैं जाति, धर्म के नाम पर और उम्मीद करते हैं कि ये लोग हमारे लिये तरक्की करेंगे! देश में कायदे कानून लागू करेंगे!! सब के साथ न्याय होगा!!!

कुछ लोग हैं जो गुस्से में लिख रहे हैं कि जब नेताओं की बेटियों के साथ ऐसा होगा तब ये लोग जागेंगे। यानि कि हरामखोरों को चुनकर बेवकूफी तुम करोगे और सजा बेटियों को दोगे? तो तुम में और बलात्कारियों में अंतर क्या रह गया?!! तुम भी दिमाग से बलात्कारी ही हो इसके अलावा कुछ नहीं सोच सकते।

किसी ने पूछा कि हमारे देश की अदालतों में लाखों लाख मुकदमे पेंडिंग पड़े हैं ! क्यों?

दसियों वर्ष हो गये, अभियुक्त अपराध सिद्ध होने से पहले मर गया! क्यों?

हर सरकार अपने कार्यकाल में वकीलों को सरकार की पैरवी के लिये नियुक्त करती है जो सरकार और नेताओं की इच्छा के अनुरूप पैरवी कर केस सत्ता की सुविधा के अनुसार हारते और जीतते हैं। इसमें सुधार क्यों नहीं हुआ है? इन वकीलों की नियुक्ति एक सुस्थापित प्रणाली के द्वारा क्यों नहीं होती?

मुकदमों की संख्या के अनुरूप न्यायालयों की संख्या क्यों नहीं है?

जो अदालतें हैं उनमें भी कर्मचारियों और जजों की नियुक्ति क्यों नहीं हुई है?

हर अपराध के पंजीकृत होने से लेकर सजा होने तक का समय निर्धारित क्यों नहीं है?

अदालतों में मुकदमों की zero pendency कब तक प्राप्त कर ली जायेगी? है किसी राजनीतिक दल के संकल्प पत्र में?

मंदिर-मस्जिद विवाद पर प्रतिदिन सुनवाई हो सकती है, तो आपराधिक मुकदमों पर प्रतिदिन सुनवाई करके जल्दी से जल्दी उनको सजा क्यों नहीं दी जा सकती है?

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अगर समाज से अपराध खत्म करना है तो सबसे पहले समाज को शिक्षित करने की मांग करो। स्कूल मांगो, कालेज मांगो, ऐसी शिक्षा व्यवस्था मांगों की गरीब से गरीब व्यक्ति का काबिल बच्चा भी जहां तक चाहे पढ़ सके। गरीबी उसके आड़े न आये।

अस्पताल मांगो जहां बेहतर से बेहतर इलाज हो। जान बचाने के लिये जमीन और जेवर न बिक जाए। मनोरोगियों की भी काउंसलिंग हो सके पोटेंशियल बलात्कारियों को पहले ही चिन्हित कर उन्हें कंट्रोल किया जा सके।

पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के लिये उन्हें अदालतों के supervision में दो और राजनीतिक/प्रशासनिक हस्तक्षेप को खत्म करो।

खुफिया पुलिस व्यवस्था को और चाक चौबंद करो। और उससे भी पहले उन्माद में बहकना बन्द करो।

रोजमर्रा की जिंदगी में हर तरह के अपराधियों को तेजी से सजा मिलने लगेगी तो आदमी अपराध करने से डरेगा भी और समाज सुरक्षित भी होगा लेकिन एक घटना और एक सजा से कुछ असर नहीं होगा। कोई याद दिलायेगा तो याद आयेगा न तो सब ऐसा ही चलता रहेगा। इसके लिये जनता को मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिये जो ऐसी सोच के लोगों को सत्ता सौंपे न तो मंदिर-मस्जिद तो हैये ही।

पीयूष रंजन यादव

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