एक देश में ही कितने देश बसेंगे ?

How many countries will settle in one country?

भारत कोई देश नहीं बल्कि कई राज्यों का समूह है (India is not a country but a group of many states) जिसे भारत या इंडिया का नाम दिया गया है इसीलिए ये गणराज्य (Republic) है।

Bihar is wanted but hates Bihari

यहां के लोगों को पता नहीं क्यों हेयदृष्टि से देखा जाता है। यहां के लोगों को बिहार तो चाहिए पर बिहारी से नफरत है, यूपी तो चाहिए यूपी वालो से नफरत है, असम तो चाहिए पर असामियों से नफरत है, तमिलनाडु तो चाहिए पर तमिलियों से नफरत है, कश्मीर तो चाहिए पर कश्मीरियों से नफरत है फिर इन लोगों को प्यार किससे है किसी से नहीं क्यों सोचियेगा जरूर। शायद खुद से और खुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में देश को गर्त में डाल दिया।

ये कौन लोग हैं जो हमारे देश की विविधता को खतरे में डाल रहे हैं (Endangering the diversity of the country)। इन्हें पहचानो और इनका सामाजिक बहिष्कार करो अन्यथा तो हर एक देशवासी को प्रवासी बनने में देर ना लगेगी, देखना हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इसी कारण ही आज हर प्रवासी अपने प्रदेश, अपने गाँव, अपने घर पहुंचना चाहता है। अब इसकी होड़ लग चुकी है इसको रोक पाना मुश्किल होता जा रहा है, इसके लिए चाहे जितने भी पहाड़ पार करने हों, चाहे जितने दुख आएं लेकिन विपदा की घड़ी में ये प्रवासी परदेश ( दूसरे राज्यों) में नहीं रहेंगे। भले ही यह वह शहर हो जहां हम आये थे रोजी रोटी के वास्ते।

जब आये थे तब भी पराया था यह शहर, इसे अपनी मेहनत और कर्म से अपना बनाने का प्रयत्न किया पर जब अभावों में जीते रहे, अपने कमाए चंद रुपयों पर यहीं रुके रहे तब भी। बस नमक रोटी ही तो खाई इस परदेस में बाकी क्या बचाकर गांव भेजा था घर ? कुछ नहीं, बस कभी छोटे भाई को तो कभी बड़े को यहां बुला अपने साथ रख लिया दो वक्त की रोटी के लिए। हाँ कभी टूटी छाजन फिर से छवाने के लिए,  एक दो बार गिरी दीवार उठाने के लिए और कभी अपने देश से दौड़े आये माई बाबू की बीमारी हारी में। अलग्योझे के लिए भी गए हम दौड़े-दौड़े।

इस शहर में हमने क्या-क्या न खोया। किसी का बेटा, किसी की बेटी और किसी की बहन के मरने पर यह शहर हमारे पास कब आया । कब पूछा किसी ने हमें कि खाना खाया क्या कभी नहीं।

हम हर हाल में यहां मरते रहे और जीते रहे वहां। अब तो अपनी मिट्टी अपने गाँव पहुंच कर ही उद्धार होगा। गठरी-मोटरी सब समेट सिर पर लादे हम अपने गाँव जाएंगे, वहां  परायेपन की, क्षेत्रवाद की, पूंजीवाद की कोई बीमारी नहीं है। बहुत अपनापन, सुख, चैन संस्कृति सब है क्योंकि अपना देश है ना।

हम जो मर भी गए राह में तो भी परवाह नहीं कोई। इतना सुख तो होगा न कलेजे में कि मरे तो अपने देश की ओर अपने देश की राह पर।

जब अपना देश छोड़ परदेश आ गए थे और हजार मौत मर कर भी जिये जा रहे थे तो अब क्या! अब तो अपनी जनम भूमि जा रहे हैं हम अपने देश।

#एकदेशमेंकितनेदेश

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

रामायण, महाभारत नहीं रोटी, रोजगार दो, मजदूरों की मौत पर मनोरंजन : सत्ता में बैठे धृतराष्ट्र को जनता की ‘त्राहिमाम’ दिखाई नहीं दे रहा

Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे। OR
उपाध्याय अमलेन्दु:
Related Post
Recent Posts
Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे। OR
Donations