घटना के समय जो कानून था ही नहीं उसके नाम पर कार्रवाई कैसे- रिहाई मंच

Rajeev Yadav

लखनऊ 13 जुलाई 2020। रिहाई मंच ने कहा कि लखनऊ प्रशासन की क्षतिपूर्ति के नाम पर सम्पत्तियों को सील और कुर्क करने की कार्रवाई कानूनी कुतर्को पर आधारित अन्यायपूर्ण, दमनकारी और विरोध के स्वर का गला घोंटने वाली है। क्षतिपूर्ति के नाम पर जिस कानून के तहत यह सब किया जा रहा वह न्याय की अवधारणा के विपरीत, लोकतंत्र और न्याय विरोधी क्रूर कानूनों की श्रंखला की एक और कड़ी है। जो कानून घटना के समय था ही नहीं उसके तहत कार्रवाई कैसे की जा सकती है। इस कानून को इलाहाबाद हाई कोर्ट में और सार्वजनिक नुकसान के संबंध में जारी की गई रिकवरी नोटिस को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी गई है। 13 जुलाई यानी आज रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब के रिकवरी नोटिस मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई है।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि लोकतांत्रिक परंपरा के विरुद्ध जाते हुए पहले तो विरोध के अधिकार को गैरकानूनी बता जनता का दमन किया गया। पुलिसिया हिंसा से पूरे माहौल को भयाक्रांत किया गया जिसमें 19-20 दिसंम्बर 2020 को करीब 23 व्यक्ति मारे गए और हजारों को गिरफ्तार और फर्जी मुकदमे लादे गए। बदले की भावना से लोगों के लखनऊ शहर में नाम, पता और फोटो के साथ होर्डिंग्स लगाए गए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस कार्रवाई के लिए कोई प्रावधान के न होने के चलते सरकार को होर्डिंग्स हटाने का आदेश दिया। लेकिन उसका अनुपालन करने के बजाए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और जब वहां भी राहत नहीं मिली तो 15 मार्च को ‘उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी सम्पत्ति क्षति वसूली अध्यायदेश 2020’ को मंजूरी दे दी जो संविधान की मंशा और न्याय की बुनियादी अवधारणा के विपरीत है।

रिकवरी नोटिस देकर संपत्ति जब्त करने और उसे नीलाम करने की धमकी दी गई जो कानून का उल्लंघन और शक्तियों का दुरूपयोग है जिसका तहसीलदार को अधिकार नहीं है। रिकवरी करने का अधिकार हाई कोर्ट के पास है जो आकलन के बाद उस व्यक्ति को पर्याप्त अवसर देने के बाद ही रिकवरी कर सकता है। कोर्ट ट्रायल में अगर यह सिद्ध होता है कि आरोपी नुकसान के लिए जिम्मेदार है तो ही रिकवरी के लिए हाईकोर्ट से अपील की जा सकती है। किसी भी न्यायालय ने दोषी नहीं ठहराया है ऐसे में इनके खिलाफ न हाई कोर्ट जा सकते हैं और न ही वसूली का नोटिस ही दे सकते हैं। वहीं हर्जाने के नुकसान मामले में 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए यहां सिर्फ 7 दिन का दिया जा रहा।

समाचार माध्यमों के अनुसार पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा है कि जिस नियम 143(3) के तहत यह वसूली नोटिस दी गई है वह उत्तर प्रदेश राजस्व नियमावली 2016 के तहत कोई नियम ही नहीं है। वसूली नोटिस जिस आदेश के तहत दी गई है वह आदेश अपने आप में विधि विरूद्ध है। जिस प्रपत्र 36 में यह नोटिस दी गई है उसमें स्पष्ट तौर पर 15 दिन का समय तय किया गया है जिसे मनमर्जीपूर्ण ढंग व विधि के विरुद्ध जाकर तहसीलदार सदर ने सात दिन कर दिया है, इसलिए तहसीलदार सदर की नोटिस उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता व नियमावली का पूर्णतया उल्लंघन है जिसे निरस्त किया जाना चाहिए।

अधिवक्ता संतोष सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अध्यादेश के माध्यम से लाया गया नया वसूली कानून सार्वजनिक एवं निजी सम्पत्ति की क्षति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य में दो विशेषज्ञ समितियों की अनुशंसा पर तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा सुनाए गए निर्णय से टकराता है और उत्तर प्रदेश सरकार ने नई परंपरा कायम करते हुए इसे अध्यादेश लाने से पहले की तिथि लागू किया है। इससे जहां यह जाहिर होता है कि इस कानून का मकसद सीएए आंदोलनकारियों को लक्ष्य बनाना है वहीं यह सवाल भी उत्पन्न होता है कि उच्चतम न्यायालय के तीन सदस्यीय खंड पीठ के निर्णय और समय से पीछे जाकर इसे लागू करने की मंशा को अदालत किस नज़रिए से देखती है और किसको वरीयता देती है।

रिहाई मंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी सम्पत्ति क्षति वसूली अध्यायदेश 2020 बदनाम ज़माना यूएपीए कानून जैसा क्रूर है जिसके तहत आरोप लगाने वाले के बजाए आरोपी को ही अपनी बेगुनाही सिद्ध करने का प्रावधान है। इसके कानून बनने के बाद राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की संभावना बहुत प्रबल हो जाती है। इसी विवादस्पद कानून की बुनियाद पर लखनऊ प्रशासन क्षतिपूर्ति के नाम पर सम्पत्तियों को सील और कुर्क करने की कार्रवाई कर रहा है। इसी कानून का सहारा लेकर लखनऊ में तीन दुकानों को सील करने और रिक्शा चालक मोहम्मद कलीम को गिरफ्तार करने की कार्रवाई सामने आई।

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