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विरासत से नहीं बल्कि हालात से बनता है इंसान : ख़्वाजा अहमद अब्बास

ख़्वाजा अहमद अब्बास

आवारा” एवं “अनहोनी” फिल्म पर कार्यक्रम का प्रीमियर

इंदौर 4 अगस्त 2021. भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा)- Indian Public Theater Association (IPTA) द्वारा ख़्वाजा अहमद अब्बास के रचनाकर्म पर केंद्रित ऑनलाइन कार्यक्रमों की श्रृंखला की चौथी कड़ी (Online programs focused on the work of Khwaja Ahmad Abbas) में “आवारा” एवं “अनहोनी” फिल्म पर कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम में थप्पड़, गुलाम, द्रोहकाल, आरक्षण जैसी प्रसिद्ध फिल्मों के लेखक अंजुम रजब अली ने ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानियों के पीछे रही उनकी सोच और कहन के तरीकों पर फिल्मों के कुछ दृश्यों को दिखाकर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया।

इस कार्यक्रम की रिकॉडिंग का सार्वजनिक प्रसारण फेसबुक प्रीमियर के रूप में 2 अगस्त 2021 को किया गया।

अंजुम रजब अली ने कहा कि अब्बास साहब का सोचना जिम्मेदारी के साथ फिल्मों के जरिये मनोरंजन पेश करना था। उन्होंने मनोरंजन के दायरे में रहकर ऐसी फिल्में बनाईं जो लोगों को सोचने पर विवश कर दें। “आवारा” की पटकथा हो या “अनहोनी” का निर्माण या अन्य फ़िल्में उन्होंने इसी मनोरंजन के दायरे में रहकर ही बनाईं। पटकथा पर अब्बास साहब की मजबूत पकड़ थी। उनकी फिल्मों में गाने कहानी की परिस्थिति की माँग के अनुसार रहते हैं। वे अपनी पटकथा में गानों को बड़ी कुशलता से इस तरह बुनते थे कि उनकी फिल्मों में से एक गाना भी हटाया जाये तो पटकथा लड़खड़ा जाएगी।

श्री अली ने कहा कि “आवारा” और “अनहोनी” फ़िल्म में उनकी थीम स्पष्ट है “विरासत से नहीं बल्कि हालात से इंसान का चरित्र बनता है।” फ़िल्म “आवारा” में बहुत ही स्पष्ट रूप से स्त्रियों की विवशता और समाज में स्थिति को फिल्मांकित किया गया है जो मैसेज देता है कि भले ही परिस्थितियाँ कोई भी हों लेकिन दोषी स्त्री ही मानी जाती है। 2 घण्टे 53 मिनिट की फ़िल्म “आवारा” में शुरू के 40 मिनिट बड़ी ही रोचकता एवं मनोरंजन के साथ राजनीतिक परिस्थितियों से रूबरू करवाते हुए केवल राजकपूर अभिनीत मुख्य पात्र को स्थापित करने में इसलिए लगा दिए जिससे लोगों तक यह संदेश कि समाज की परिस्थितियों ने बिना कोई विकल्प दिए उसे इस मुकाम तक पहुँचाया, आसानी से पहुँच सके।

अंजुम कहते हैं कि एक पटकथा समीक्षक के नाते मैं कह सकता हूँ कि “आवारा” की स्क्रिप्ट बहुत ऊँचे दर्जे की है। यहाँ रोमांस की उपकथा समानांतर नहीं चलती, बल्कि वह मुख्य प्लाट से जुड़ी हुई ही है। “अनहोनी” की बात करते हुए अंजुम रजबअली ने बताया कि नर्गिस की ख्वाहिश थी कि जिस तरह “आवारा” में राजकपूर अभिनीत पुरुष पात्र का विरासत और माहौल के अनुसार उसका चरित्र परिवर्तन होता है उसी तरह महिला पात्र के जरिये मेरे चरित्र में भी लाइए। आप मुझे ऐसा किरदार दीजिये। मुझे यह थीम बहुत पसंद आई। इसी को ध्यान में रखते ही अब्बास साहब ने महिला पात्र की प्रधानता वाली फिल्म “अनहोनी” का निर्माण किया जिसमें नरगिस ने दोहरी भूमिका निभाई है।

 “आवारा” से राजकपूर की लोकप्रियता पूर्व सोवियत संघ में जबर्दस्त बढ़ गई थी

मौलाना आजाद विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और अब्बास साहब की भतीजी डॉ. सईदा हमीद ने कहा कि “आवारा” से राजकपूर की लोकप्रियता पूर्व सोवियत संघ में इतनी बढ़ गई थी कि वहाँ हर युवा के होठों पर “आवारा” फिल्म के गाने होते थे। यहाँ तक की सन 1955 में सोवियत संघ में राजकपूर जवाहरलाल नेहरू जितने ही लोकप्रिय थे।

कार्यक्रम में विशेष उपस्थिति रही डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता मेघनाथ (राँची) की जिन्होंने अब्बास साहब का एक विशेष संस्मरण साझा करते हुए बताया कि सन 1978 में अब्बास कलकत्ता के एक अस्पताल में आये और उन्हें जानकारी मिली कि इस अस्पताल के निर्माण के लिए छात्रों ने रक्तदान कर करीब तीन लाख रुपया एकत्र किया और इस तरह कलकत्ता स्थित बारह बेड का यह चिकित्सालय बनाया गया तो वे इससे काफ़ी प्रभावित हुए और चाय-मूढ़ी खाते हुए उन्होंने पूछा कि “क्या इस बात का किसी अख़बार में जिक्र हुआ था?” तब हमने बताया कि एक-दो स्थानीय अख़बार के तीसरे-चौथे पेज के छोटे से कॉलम में न्यूज़ आई थी। तब वापस जाकर उन्होंने अपने ‘ब्लिट्ज’ के अंतिम पृष्ठ पर इस अस्पताल के बनने की घटना के साथ लिखा था, “आई फील अशेम्ड टू कॉल मायसेल्फ जर्नलिस्ट!” वे जानते थे कि सेंसेशनल जर्नलिज्म और रियल जर्नलिज्म क्या होता है।

इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने कहा कि अब्बास साहब ने गंभीर विषयों से लेकर मनोरंजक फार्मूलों तक से फ़िल्में बनाईं। उन्हें जानने और उनकी मानसिकता को समझने के लिए अब्बास साहब के विपुल कार्यों पर शोध अभी बाकी है।

विनीत तिवारी ने कहा कि भारतीय सिनेमा को विश्व में भारत का सांस्कृतिक राजदूत बनाया था। उनकी मशहूर फिल्म “शहर और सपना” का आइडिया उन्हें बारिश में पाइपों के भीतर रहने वाले लोगों को देखकर आया था। 

इस ऑनलाइन परिचर्चा के अंत में कार्यक्रम से जुड़े साथियों ने अपनी राय और प्रश्न भी रखे। कार्यक्रम में सैय्यद शमशुद्दीन (पाकिस्तान), अपर्णा महाजन, लतिका जाधव (पुणे), जया मेहता, सौम्या लाम्बा, अंतरा देबसेन, एन डी पंचोली, असीमा रॉय चौधरी, राजीव कुमार शुक्ला (दिल्ली), प्रमोद बागड़ी, सारिका श्रीवास्तव, विवेक मेहता (इंदौर), राकेश वानखेड़े, फिल्म अभिनेता राजेन्द्र गुप्त, तरुण कुमार, उषा आठले, नागेश धुर्वे (मुंबई), प्रितपाल सिंह (अंबिकापुर), बेनेडिक्ट डामोर (झाबुआ) अर्पिता श्रीवास्तव (जमशेदपुर), शेखर मल्लिक (घाटशिला), सत्येन्द्र कुमार शेंडेय (सिवनी), संघमित्रा मलिक (हैदराबाद)शमीम अख्तर (अलीगढ), आर. के. एस. राठौर (लखनऊ), हिम्मत छंगवाल (उदयपुर), सुनीता चतुर्वेदी (जयपुर), जमुना बीनी (अरुणाचल प्रदेश), शशिभूषण (उज्जैन), अरुण शीतांश (आरा, बिहार), प्रकाशकान्त (देवास), लोकबाबू (छत्तीसगढ़), कृष्णा दुबे ( गुना), रामदुलारी शर्मा (अशोकनगर) आदि जुड़े।

रिपोर्ट- शेखर मलिक

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