कोरोना से ज्यादा खतरनाक है भूख, भय, और भ्रम : मोदी

How many countries will settle in one country

अचानक के लॉक डाउन से उपजे भूख, भय, और भ्रम करोना समुदाय में फैलने का डर बढ़ गया है

Hunger, fear, and confusion resulting from sudden lock down have increased fear of spreading in the community

प्रिय साथियो,

इस बारे में कोई दो राय नहीं कि लॉक डाउन इस करोना की महामारी को तेजी से बढ़ने से रोकने का एक उपाय है। और, हमें इसमें सरकार का साथ देना होगा। लेकिन, जिस तरह से यह सारा किया गया उस पर अगर सही सवाल पूछे बिना आँख मीचकर साथ दे दिया, तो इससे देश का नुकसान होगा।

क्योंकि, करोना अचानक भारत के अन्दर किसी कारण से जन्मी महामारी नहीं है, जिसके लिए अचानक रात आठ बजे तीन हफ्ते के कर्फ्यू की घोषणा करना पड़ी। पिछले दो माह से यह महामारी चीन से आए यात्रीयों के माध्यम से पूरे दुनिया में फ़ैल रही थी, और विदेश से आए यात्रियों के माध्यम से भारत भी धीरे-धीरे इसकी चपेट में आ रहा था। भारत में इसका पहला मरीज जनवरी 30 को मिल गया था।

दुख: की बात यह है की प्रधानमंत्री सार्क देशों और जी-20 के देशों के मुखियाओं से करोना को लेकर बात कर रहे हैं, लेकिन, लॉक डाउन घोषणा की जानकारी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी रात आठ बजे उनकी घोषणा से ही हुई; उन्हें भी विश्वास में नहीं लिया गया।

जिस तरह से न्यूजीलैंड जैसे छोटे देश भी ने लॉक डाउन के पहले लोगों और अपनी सरकार को सारी व्यवस्था करने के लिए दो दिन का समय दिया, वो हमारी सरकार ने 135 करोड़ के देश में क्यों नहीं किया? यह सामान्य समझ के बाहर है।

जिस तरह से अचानक रात के आठ बजे देश में 21 दिन की तालाबंदी की घोषणा और घर के बाहर कदम रखना मतलब मौत करार कर दे दिया, उससे देश में भूख, भय और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। चारों तरफ, या तो भूख है, या भ्रम या व्हाट्स एप्प की अफवाह।

Modiji’s lock down order has divided the people of the country into two parts:

मोदीजी के इस आदेश ने देश की जनता को दो हिस्से में बाँट दिया है : आधे लोग जो अपने घरों में बैठकर नेटफ्लिक्स और ऑनलाइन आर्डर के सहारे अपना समय काट रहे हैं, और इस लॉक डाउन को सही ठहरा रहे हैं। और बाकी आधे वो प्रवासी मजदूर हैं, शहर में रह रहे गरीब हैं जो सारी सोशल डिसटेंसिंग भूलकर देश के शहरो और मेट्रो सिटी में या तो भूखे मुफ्त भोजन की लाइन में खड़े हैं, या पैदल अपने घर की ओर कूच कर चुके हैं।

खासकर पिछले दो दिनों से जिस तरह से दिल्ली से, अहमदाबाद से, राजस्थान से और ना जाने कितने शहरों से लाखों प्रवासी मजदूरों के 100 से 400 किलो मीटर पैदल चलकर अपने घर वापस जाने की खबरें आ रही हैं, वो दिल दहलाने वाली हैं।

https://twitter।com/i/status/1243203008202256385/ https://thewirehindi।com/114846/corona-virus-covid-19-india-lockdown-migrant-workers/

इनकी मदद करने की बजाए उत्तर प्रदेश के बदायूं में पुलिस ने इन लौटते मजदूरों को भी बख्शा और उन्हें सड़क पर अपने बैग के साथ मेढंक के जैसे फुदक कर आगे जाने को मजबूर किया गया। https://www।ndtv।com/india-news/coronavirus-lockdown-india-am-ashamed-says-budaun-police-chief-after-up-cops-caught-on-video-forcing-2201177

यह मजदूर सिर्फ महानगरों से निकले ऐसा नहीं है,  देश का ऐसा कोई हाइवे नहीं है, जहाँ यह मजदूर पैदल नहीं चल रहे हैं। इसमें दूरस्थ आदिवासी इलाके के मजदूर भी शामिल हैं। अभी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में मेरे घर बात हुई तो मालूम हुआ कि वहां भी मजदूर ना जाने कहाँ से निकले हैं, जो सतना जा रहे हैं; हमारे वहां से भी सतना 350 कि. मी. है।

अभी जो लाखों मजदूर देश अनेक शहरो में फंसे पड़े हैं, 21 अप्रेल तक ना जाने उनका क्या हाल होगा, पता नहीं? एक आकलन के अनुसार भारत में लगभग 27 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जो एक राज्य से दूसरे राज्य में काम के लिए जाते हैं। और, इसमें से .001% भी अपने साथ करोना के खतरे को गाँव-गाँव ले गए, जो अभी तक वहां नहीं पंहुचा था, तो यह महामारी भयानक रूप ले लेगी।

दूसरा, शहर के शेलटर होम और फुटपाथ पर पड़े इन मजदूरों को भी करोना का खतरा है।

अगर वाकई ऐसा हुआ तो लॉक डाउन का उल्टा असर होगा, और जो महामारी अभी तक सीमित इलाके में थी, वो अब इन मजदूरों के साथ पूरे देश और सारे शहर में फ़ैल जाएगी और उस स्थिति को कोई भी नहीं संभाल पाएगा।

कमाल की बात यह है कि करोना के डर से लॉक डाउन के कुछ दिन पहले तक ट्रेन खाली जा रही थी; यहाँ तक कि रेलवे प्रशासन को अधिकांश ट्रेने खाली चलने के कारण रद्द करना पड़ी थी। इसका मतलब लोग खतरे को समझकर ट्रेन से यात्रा टाल रहे थे। इसके बाद, अचानक पहले जनता कर्फ्यू और फिर यह लॉक डाउन ने स्थिति बिल्कुल उल्ट दी। इसका मतलब है अगर इन मजदूरों अगर भोजन के लिए मुफ्त राशन मिलता और उनके रोजगार प्रदानकर्ता से एडवांस दिलवा दिया जाता और सरकार एक माह का राशन दे देती और इस तरह की अचानक घोषणा करके डराया नहीं जाता, तो यह शहर छोड़कर गाँव की ओर कूच नहीं करते।

सरकार ने घोड़े के आगे गाड़ी खड़ी की। तालाबंदी की घोषणा के बाद दूसरे दिन लोगो को राशन में सस्ता अनाज देने की घोषणा की गई। अब इस लॉक डाउन में कब और कैसे यह अनाज वितरण की आखिरी कड़ी तक पहुचेगा? और कैसे अंतिम व्यक्ति को मिलेगा? और, इन दुकानों पर भीड़ कैसे नियंत्रित होगी? फिर, उसके बाद वाले दिन के तरह की आर्थिक मदद की घोषणा की गई। अब यह मदद भी कब मिलेगी और खाते में आने के बाद कैसे लोग उसे निकाल पाएंगे, नहीं मालूम!

वैसे भी इसमें सिर्फ 21 दिन के लॉक डाउन से काम नहीं चलेगा। वुहान दो माह के लॉक डाउन के बाद अभी सिर्फ आंतरिक रूप से खुला है। अमेरिका और ब्रिटेन ना सिर्फ दो से तीन माह के लॉक डाउन (Three month lock down) की बात कर रहे है, बल्कि अगले लम्बे तक सोशल डिसटेंसिंग (Social distancing) के पालन की बात कर रहे है।

हमे इटली से लेकर अमेरिका तक के अनुभव बताते है कि वहां स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता सुरक्षा के लिए जरूरी मास्क से लेकर पैर के अंगूठे से लेकर सर तक का सुरक्षा वस्त्र आदि से जूझते हुए ना सिर्फ बीमार पड़ रहे हैं, बल्कि मर रहे हैं।

23 मार्च इकॉनमिक्स टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फरवरी माह में भारत को इन सुरक्षा उपकरण का उत्पादन 40% बढ़ाने का सुझाव  दिया था। सरकार ने एचएलएल लाइफ केयर को नोडल एजेंसी बनाकर 7 लाख 25 हजार बॉडी कवर और 15 लाख तीन प्लाई मास्क और 10 लाख एन 95 मास्क आदेश का टेंडर निकाला। एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्रीज के समन्वयक राजीव नाथ ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी 21 मार्च को हुई है।

संजीव रेलहन, चेयरमैन प्रिवेंटिव वेयर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा की उन्होंने 7 फरवरी को भारत सरकार से मुनाफाखोरी के खिलाफ बने एंटी प्रॉफिटरिंग कानून इन सुरक्षा उपकरणों पर लागू करने की मांग थी लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया।  https://economictimes।indiatimes।com/news/politics-and-nation/covid-19-outbreak-protective-health-gear-in-short-supply/articleshow/74765953।cms?from=mdr

सारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रोज पत्रकार वार्ता कर पत्रकारों के माध्यम से लोगों की चिन्ताओं का जवाब दे रहे हैं। भारत में इस कठिन समय में भी हम अचानक की गई एकतरफा घोषणा और फैसले को मानने को मजबूर हैं।

जाने-माने सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता Anurag Modi अनुराग मोदी समाजवादी जन परिषद् से जुड़े हैं।
जाने-माने सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता Anurag Modi अनुराग मोदी समाजवादी जन परिषद् से जुड़े हैं।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि देश में प्रधानमंत्री का जबरदस्त असर होता है। मगर उसके सही ढंग से लागू होने के लिए लोगों से दो तरफ़ा संवाद जरुरी है। वर्ना जैसा उन्होंने घर पर रहकर शाम पांच बजे ताली बजाकर स्वास्थ कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने को सही ढंग से समझे बिना लोगों ने सड़क पर आकर करोना खत्म होने के जश्न में बदल दिया।

इस संवाद की पहली कड़ी राज्य सरकार है, और उसके बाद सामाजिक कार्यकर्त्ता, एन जी ओ, धार्मिक और सामाजिक मंडल, रोटरी जैसे क्लब आदि। इसके अलावा देश भर की मजदूर यूनियन और पार्टी के संगठनों को भी क्रियाशील बनाना होगा।

और, डॉक्टरों के लिए जरुरी सुरक्षा उपकरणों की व्यवस्था, गाँव लौटे मजदूरों सहित सभी संशयास्पद मामलों की कोरोना जांच की व्यवस्था और वेंटीलेटर और आक्सीजन की आपूर्ति और अतरिक्त आई सी यू बेड की व्यवस्था लॉक डाउन के इन तीन हफ्तों में हो जाना चाहिए।

ऐसा लगता है मोदी सरकार के पास कोई व्यापक रणनीति नहीं है। अगर हम एक हफ्ते के लिए अपना काम भी बंद करते हैं, तो पहले उसके बारे में सोचकर योजना बनाते हैं, यहाँ सारा देश अचानक तीन हफ्ते के लिए बंद कर दिया गया। और लगता है, जिस तरह से नोटबंदी में कोई कालाधन नहीं पकड़ाया था, उसी तरह इस अचानक के लॉक डाउन से कोरोना समुदाय में फैलने से रूकने की बजाए उसमें में फैलेगा।

एक व्यापक रणनीति के बिना लॉक डाउन से कुछ नहीं होगा, यह दुनिया भर के उदाहरण से साफ़ है। और यही बात विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुखिया ने भी अपनी चेतावनी में कही। हालांकि, इसके बाद मोदीजी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन में ही बदलाव की मांग कर दी है।

एक सोची समझी रणनीति और सबको साथ लेकर ही इस महामारी से लड़ा जा सकता है। आशा है, अब कम कम कम संवाद शुरू होगा और इस भय, भूख और भ्रम की स्थिति को खत्म कर एक साझा रणनीति बनाई जाएगी।

अनुराग मोदी  

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