हैदराबाद एनकाउंटर : कहीं यह असली अपराधियों को बचाने की साज़िश तो नहीं? यह ख़तरनाक खेल है

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हैदराबाद एनकाउंटर : कहीं यह असली अपराधियों को बचाने की साज़िश तो नहीं? यह ख़तरनाक खेल है

Hyderabad Encounter: Is it a conspiracy to save real criminals? It’s a dangerous game

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2019. . हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के आरोपियों की एनकाउंटर में हत्या पर सवालिया निशान लगना शुरू हो गए हैं। एक तरफ जहां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission, NHRC, India) ने हैदराबाद केस (Hyderabad case) का स्वतः संज्ञान लेते हुए अपनी जांच टीम द्वारा स्थलीय जांच के आदेश (spot inquiry by NHRC’s investigation team) दिए हैं, वहीं सोशल मीडिया पर भी इस मुठभेड़ पर सवाल उठ रहे हैं।

पत्रकार अरविंद शेष ने फेसबुक पर लिखा,

“हैदराबाद की पुलिस ने इस “एनकाउंटर” से अपने ऊपर इस शक को पुख़्ता कर लिया है कि उसने बलात्कार-हत्या के असली आरोपियों को ही पकड़ा था..! यह भी कि क्या उसने अपनी खाल बचाने के लिए ऐसा किया..!

अब कानूनी तौर पर शायद यह कभी साबित नहीं हो सकेगा कि जिन लोगों को मारा गया, वही असली अपराधी भी थे..!

‘आरोपी’ को अपराधी मानना कम जानकारी और गोबर दिमाग का नतीजा होता है। पिछले दस-बीस सालों में अदालती कार्यवाही के बाद दर्जनों वैसे लोगों को निर्दोष पाकर जेल से रिहा किया गया, जिन्हें पुलिस ने आतंकवादी कह कर जेल में दस-बीस या पच्चीस साल सड़ा दिया था!

आखिर उन आतंकी घटनाओं को किसी ने तो अंजाम दिया होगा? किसे सजा मिली?”

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा,

“गुड़गांव के रेयान स्कूल की घटना सिर्फ एक उदाहरण है! करे कोई और गोबर दिमाग वाले मॉब लिंचरों के हल्ले पर हड़बड़ी में पकड़ लो किसी और को!

पता नहीं कितने ‘आरोपी’ विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों मैं बंद हैं!

असली अपराधी का पकड़ा जाना और उसे सजा मिलना आज भी मुश्किल है! बहादुर पुलिस की वजह से..या किसकी वजह से..!!!”

शिक्षाविद् और पूर्व शिक्षक नेता मोहन श्रोत्रिय ने लिखा,

“बलात्कार कांड से जुड़े, और पकड़े गए आरोपितों (पुलिस की नज़र मेंअपराधियों) का एनकाउंटर शर्मनाक है।

जो इसे सही मान रहे हैं, वे चिन्मयानन्द और

सेंगर के साथ भी ऐसा करने की मांग कर सकते हैं क्या?

अभी तो यह भी साबित नहीं हुआ था कि वे ही असल अपराधी थे।

कहीं यह असली अपराधियों को बचाने की साज़िश तो नहीं? पुलिस की तरफ़ से इस मामले की फ़ाइल ही बंद मान लीजिए, अब तो! यह ख़तरनाक खेल है।

पुलिस राज्य में रह रहे हैं क्या हम?”

कल्पना कीजिए, इस कार्रवाई को वैधता प्रदान करने के शिकार कौन होंगे, भविष्य में?

ताक़तवर लोग तो क़तई नहीं!

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