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Idgah relief camp of Delhi government

निराशा में हौसले की तस्वीर : कौन से राम ने यह आकर कहा कि लोगों का घर जलाओ, मासूमों को बेघर करो ?

मुस्तफाबाद का ईदगाह (Idgah of Mustafabad) वही जगह है, जहां 25 तारीख की शाम तक बहुत सी महिलाएं और पुरुष अपने परिवार के साथ जान बचाकर भाग यहां पनाह लेने आए थे, आज उन्हें पन्द्रह दिन से ज्यादा हो गए लेकिन वहां जिन्दगी आज भी बिखरी हुई है, वहां रह रहे लोगो को रोज-रोज की जरूरतों के लिए अपना नाम लिस्ट में लिखवाना पड़ता है जिससे अक्सर महिलांए परेशान दिखती हैं। वो जानती हैं कि सरकार व संस्थाएं सब उनके भले के लिए ही कर रहे हैं ताकि सभी को लाभ मिल सके।

कैम्प के सभी लोग यही चाहते हैं कि शिव विहार में सब कुछ अच्छा हो जाए। काश उनके मोहल्ले के हिन्दू भाई उन्हें बुला लें और आश्वासन दें कि हर सुख दुख में उनके साथ खड़े हैं। कई महिलाएं बोलीं कि जिस मुस्तफाबाद में हिन्दू लोगों ने मुस्लिमों का साथ दिया वहां पर दंगाई कुछ नहीं कर सके। वे लोग चाहते हैं कि सरकार उनके घरों की टूट-फूट को दुरुस्त करवा दे जिससे कि वो पहले की तरह से जिन्दगी जीने की शुरुआत करें।

लिस्ट में नाम लिखवाने की परेशानी और छोटी-मोटी जरूरतों से भले ही महिलाएं जूझ रही हैं लेकिन जिन्दगी जीने का जज्बा अब भी उनमें कायम है। कैम्प मे रह रही महिलाएं एक-दूसरे का दर्द बखूबी समझ रही हैं, इसलिए एक-दूसरे को समझा कर अपना गम कम करने की कोशिश करती हैं। इस कैम्प में किसी लड़की की शादी है सारा घर जल चुका है, लुट चुका है कैम्प के मेनेजमेन्ट के लोग उसे यह अहसास नहीं होने देते और हल्दी मेहन्दी सभी रस्में बखूबी निभाई जा रही हैं।

बाहर से मिलने आने वाले पड़ोसी रिश्तेदारों का समय तीन से चार निश्चित है, वो आते हैं तब भी महिलाएं उनके शायद अपने गम को बांटती हैं।

जब मैं कैम्प के अन्दर गई तब बाहर से मिलने वालों का समय शुरू हो गया था, रिश्तेदार पड़ोसियों की भीड़ बढ़ी हुई थी जिन्हें बार-बार यह निर्देश दिया जा रहा था कि जल्दी-जल्दी बातें खत्म करें, समय होने वाला है। ये निर्देश इसलिए भी दिए जा रहे थे ताकि भीड़ ज्यादा न हो पाएं। उस समय मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा थी।

इस भीड़ में बीच से ही अचानक एक आवाज पर मेरा ध्यान गया, वो इसलिए क्यांकि वो आवाज इतनी बुलन्द और हौसले वाली थी कि चाह कर भी मैं अनसुनी न कर सकी। जब इधर उधर नजर घूमा कर देखा तो एक महिला फोल्डिंग पर लेटी हुई ही बोल रही थी कि जो भी बाहर से मिलने वाले आते हैं यही बोलते है कि अल्लाह पर भरोसा रखो,‘‘ जिसे देखो वो ही कहता है कि अल्लाह का नाम लो, जरूर दुआ में कुछ कमी हो गयी जो अल्लाह की मेहर नहीं पड़ी।’’

ये महिला शकीना (बदला हुआ नाम) थी जो कि मेरे टेन्ट के अन्दर आते ही मुझसे ऐसे बात करने लगी जैसे वह मेरा ही इंतजार कर रही हो और मैं ही उनकी उन बातों को दूसरों से बेहतर समझ सकती हूं।

,शकीना कहती है कि मैं तो दुखी हो गई हूं लोगों की बात सुनकर, हमें तो यहां के जैसे भीड़-भाड़ में रहने की बिल्कुल ही आदत नहीं है जब हम घर पर थे तब भी अपने घर के अलावा कहीं नहीं जाते थे’’।

शकीना 45 वर्षीय एकल महिला है, जिसके पति 15 साल पहले उसे बिना किसी कारण के छोड़ कर भाग गए थे और आज तक नहीं आए। तीन बेटियों की मां शकीना ने ही बेटियों को पाल कर बड़ा किया, बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है, बीच की बेटी ने 17 साल की उम्र में बिना कारण बताएं आत्महत्या कर लिया, जिसका गम वह आज भी नहीं भुला पाई, छोटी बेटी ने बारहवीं तक की पढ़ाई की फिर उसकी भी शादी कर दी, आज वह दो बच्चों की मां है।

शकीना के पति के जाने के बाद बच्चों की जिम्मेदारी उस पर आ गई लेकिन उसने जिन्दगी में हार नहीं मानी और जिन्दगी को एक चुनौती समझ कर उस पर जीत हासिल करने की कोशिश की। वह ब्यूटी पार्लर का थोड़ा बहुत काम जानती थी, जिसके दम पर उसने अपने घर शिव विहार में ही एक पार्लर की दुकान खोली, जिसमें थ्रेडिंग और मेहन्दी से घर का खर्चा निकल जाता है। उसकी सभी बेटियों को पार्लर का पूरा काम आता है।

शकीना बताती है कि ‘‘मुझे तो केवल आई ब्रो बनानी ही आती थी जिससे कम ही कमाई हो पाती थी, लेकिन जब से बेटियों ने दुकान में, साथ दिया तब से हमारी दुकान बहुत अच्छी चलती है, बेटियों को फेसियल वगैरह सब काम आता है’’।

शकीना ने अपनी बेटी की बेटी अपने पास रखा हुआ है। वो कहती है कि

‘‘हमारे में बेटियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता लेकिन मेरी ख्वाहिश है मेरी बेटियां पढ़ें। मुझसे जितना बन पड़ा मैंने अपनी बेटियों को पढ़ाया और अब अपनी नातिन को भी पढ़ाऊंगी’’।

वह यहां किस तरह पहुंची उस घटना पर वो बताती है कि

‘‘हमें तो यकीन नहीं नहीं था कि हमारे साथ ऐसा होगा, हम तो हिन्दुओं की कलोनी में रहते थे, हमारा तो उठना बैठना हिन्दुओं के साथ ही रहता था, हमें मुस्लिम लोगों के साथ उठना बैठना आया ही नहीं।”

वह बताती है कि उनके घर एक बिट्टू नाम का लड़का हमेशा से आता जाता रहता था। चौबीस तारीख को वो कह रहा था कि ‘आंटी आप यहां से गांव चले जाओ चाहो तो किराया मैं देता हूं।’ इसका मतलब कि उसे पता था कि यहां ऐसे हमारे घर जलाये जायेंगे।

शकीना के हाथ और पांव में गहरी चोट आई है। उसने मुझे बताया कि ‘‘शाम को मेरा दिल घबराया क्योंकि मेरे घर कोई मर्द नहीं था, इसलिए मैं अपने भाई के घर चली गई, जो कि पास में ही रहते थे। जैसे ही हम खाना खाकर हाथ धो रहे हैं कि अचानक से दरवाजा तोड़ने की आवाज आई। हम सब भाई भाभी भतीजे बच्चे छत से चढ़ कर दूसरे की छत पर कूदे, वहां से तीसरे की छत पर, तीसरे से चौथे की छत पर, पांच पांच फुट की दीवारें कूदने में ही पांव में चोट लग गई, हाथ छिल गए’’।

शकीना ईश्वर के बारे में अपने विचार बताती है जो कि टेंट की अधिकतर महिलाएं ऐसा ही मानती है, सभी यह कहते हैं कि ‘‘अल्लाह पर भरोसा रखो यहां बहुत सी महिलाएं दिन रात ईश्वर को याद करती है लेकिन मै कहती हूं कि अल्लाह हो या ईश्वर सभी एक है तो फिर क्यों ईश्वर के नाम पर दंगे हो रहे हैं, जो दंगाई आये थे वो भी जय श्री राम चिल्ला रहे थे, मैं उनसे पूछना चाहती हूं कि कौन से राम ने यह आकर कहा कि लोगों का घर जलाओ, मासूमों को बेघर करो’’।

डा. अशोक कुमारी

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