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Idgah relief camp of Delhi government

दर्द के ‘ईद’ गाह में राहत का पर्व, समाज सेवा वालों का चारागाह भी है दिल्ली सरकार का ईदगाह राहत शिविर

Idgah Relief Camp of Delhi Government is also a pasture for social workers

‘‘क्या तुम लोगों का नाम मोबाईल में रजिस्टर्ड हो गया ? नहीं हुआ तो जान लेना आज शाम से यहां नहीं रह पाओगे।’’

लोगों को दर्द व जुल्म के मंजर को सुनते हुए भीगती आंखों और शून्य हो रहे दिमाग ने तारतम्य को भंग कर दिया। सिर उठा कर देखा – दुबली, सांवली सी वह लड़की, देख कर अंदाज लगाया जा सकता है कि वह किसी ‘व्यावसायिक’ एनजीओ की तरफ से नौकरी बजा रही है।

‘सुबह तो लोग नहाने अपने जले घर से कुछ तलाशने चले जाते हैं, थोड़ी देर में आओ तो ठीक रहेगा।’

सिर में 35 टांके खा चुके एक इलेक्ट्रिशयन ने निवेदन किया। ‘‘सुबह साढ़े पांच बजे की घर से निकली हूं। इतनी दूर है एक तो यह कैंप। तो क्या देर रात घर पहुंचूं? मुझे नहीं पता नाम नहीं मिला मोबाईल में तो रात में यहां ठहरने को नहीं मिलेगा।’’

निरीह आंखें याद कर रही हैं कि नाम लिखा है कि नहीं और रात में निकाल दिया तो कहां जाएंगे। तब तक एनजीओ मैडम आगे बढ़ जाती हैं।

दिल्ली की पहचान बन गए सिग्नेचर बिज्र से कोई तीन किलोमीटर चलने पर यमुना विहार के पहले एक संकरी सी सड़क भीतर जाती है- ब्रिज विहार रोड़। इस पर ही आगे चल कर भागीरथी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट वगैरह हैं। लेकिन यहां वह शिव विहार, बाबू नगर आदि हैं जहां अभी दस दिन पहले मानवीयता ने दम तोड़ दिया था। लाशें, घायल लोग, एक कपड़े में जान बचा कर भागे लोग- कोई रिक्शा चलाता है तो कोई मजदूरी या किसी छोटे कारखाने मे नौकरी। अब सभी बेघर और लावारिस हैं। दंगा ग्रस्त रहे इलाके के पहले ही मुस्तफाबाद है।

बेहद संकरी गलियों के बीच घनी मुस्लिम बस्ती वाला मुहल्ला। शायद 20 या उससे अधिक गलियां हैं, जिनमें मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के शानदार मकान, दुकान और छोटे-मोटे कारखाने हैं। नाला पार करते ही पहली संकरी सी गली में है ईदगाह।

अरबी में ईद का अर्थ (Meaning of eid in arabic) होता है- खुशी या पर्व। लेकिन दिल्ली के मुस्तफाबाद का ईदगाह इस समय दर्द का गाह बना हुआ है। अकेले गम ही नहीं है यहां- समाज सेवा वालों का चरागाह भी है।

कोई अंदाज नहीं लगा सकता कि इतनी पतली गली में भीतर जा कर इतना बड़ा मैदान होगा। यह ईदगाह मैदान मजबूत बड़े से दरवाजे से घिरा हुआ है और उसके भीतर हैं कई सौ वे लोग, जो राजधानी के रूतबे, पच्चासी हजार संख्या और दुनिया के बेहतरीन कही जाने वाली दिल्ली पुलिस की मौजूदगी के बावजूद अपने ही घरों में महफूज ना रह सके। दरवाजे पर सीमा सुरक्षा बल के जवान तैनात हैं। कुछ वालेंटियर हैं, वक्फ बोर्ड से जुड़े लोग भी। बाहर तमाशबीनों, मददगारों की भीड़ बनी ही रहती है।

भीतर जाने के समय लिखे हुए हैं, रिश्तेदार कब मिल सकते हैं और एनजीओ कब आ सकते हैं। मुख्य सड़क से गली में घुसते ही एक दुकान है, जहां एनजीओ व अन्य समाज सेवा करने के इच्छुक लोगों के पास बनते हैं। बगैर पास के भीतर नहीं जा सकते। इस दुकान के सामने लगातार आने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियों व टैक्सियों से अंदाज हो जाता है कि कई लोग यहां सेवा करना चाहते हैं।

ईदगाह के भीतर एक छोटे से गेट से घुसते ही बायें हाथ पर एक पंजीकरण जैसा स्टॉल है, उसके बाद मेडिकल का। यहां सरकारी मेडिकल सुविधा दिखती नहीं- कोई अधिवक्ता संघ और उसके बाद एक ईसाई मिशनरी का मेडिकल कैंप है। उसके बाद दिल्ली पुलिस है- लोगों की जान-माल की शिकायतें केवल प्राप्त करने के लिए- इन पर मुकदमा होगा कि नहीं, यह निर्धारण उस शिकायत के थाने जाने के बाद ही तय होता है।

पुलिस के ठीक पास में कोई 10 गुणा-दस फुट का एक घेरा है जिसे बच्चों के मनोरजंन केंद्र का नाम दिया गया है। वहां कुछ खिलौने आदि हे, लेकिन बच्चे नहीं। उसके ठीक बाहर एक एनजीओ नुमा लड़की किताबों के ढेर के साथ खड़ी है। अधिकांश किताबें हिंदी बारह खड़ी की है और किसी ‘‘कमल’8 के निशान वाले प्रकाशक की। बच्चे वहां से किताब ले रहे हैं।

यहीं से शुरू हो जाता है मर्दों के लिए फोल्डिंग पलंग का दौर।

निराश, चोटों के साथ, अपने आने वाले दिनों की आशंकाओं में डूबे लोग। अंबिका विहार का वह इंसान मजदूरी करता था। 25 तारीख की रात में उनके यहां नफरत की चिंगारी पहुंची।

वह बताता है-

‘‘भीड़ में मेरे आस पास के ही लोग थे जो बता रहे थे कि मुसलमान के मकान कौन से हैं। लेकिन मेरे पड़ोसी पंडितजी ने ही हमें छत से अपने घर में उतारा और चौबीस घंटे रखा। जब मिलेटरी (शायद बीएसएफ के लिए कह रहे थे) आई तब उन्होंने हमें उनके हाथ सौंपा।’’

किसी दुकान पर इलेक्ट्रिीशयन का काम करने वाले ने बताया कि वह तो टेंपो से घर के लिए उतरा था, एक भीड़ मिली, नाम पूछा और पिटाई कर दी।

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फल बेचने वाले साठ साल के बुजुर्ग की तो ठेली भी गई और पिटाई भी हुई।

हर चारपाई की अलग कहानियां है लेकिन मसला एक ही है – नफरत, प्रशासन की असफलता, लाचारी।

कैंप के सामने की तरफ औरतों के लिए जगह है। जहां हर एक को जाने की अनुमति नहीं। बोतल पैक पान के डिस्पेंसर लगे हैं और बह भी रहे हैं। कुछ कार्टन-खाके हैं जिनमें दंगा पीडि़तों के प्रति दया जताने के लिए लोगों ने अपने घर मे बेकार पड़े कपड़े भर कर भेजे हैं। खासकर औरतें उनमें कुछ अपने नाप का, हैसियत का तलाशती हैं लेकिन बहुत ही कम को कुछ हाथ लगता है।

राहत कैप के हर ब्लॉक के बाहर कूड़े का ढेर है और वहां घूम रहे वालेंटियर अपना मुंह मास्क के ढंके हैं। तभी एक सज्जन आ कर टोकते हैं – यहां फोटो या वीडियो ना बनाएं, कल किसी ने वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर गलत तरीके से डाल दिया। वहीं सामने बरखा दत्त लोगों से बातचीत रिकार्ड करती दिखती हैं।

जेल की तरह बंद इस राहत शिविर में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। भीतर व बाहर कुछ प्लास्टिक के शौचालय खरीद कर टिकाई गए हैं लेकिन उनमें ताले ही पड़े हैं। संकरी गली में सचल शौचालय लगाए गए हैं, लोगों की संख्या को देखते हुए उनकी संख्या कम है और नियमित सफाई ना होने के कारण उनके इस्तेमाल करने के बनिस्पत परिचित लोगों के घर गुसल को चले जाते हैं।

राहत कार्य के नाम पर खरीदी में कोई कोताही नहीं है, विभिन्न संस्थाओं द्वारा जमा सामग्री पर अपनी मुहर लगा कर वितरित करने का खेल भी यहां है।

हकीकत में ईदगार राहत शिविर दिल्ली सरकार का है और सबसे अधिक लोग इसमें है सा मशहूर भी हो गया। तभी हर एनजीओ यहां आ कर अपना बैनर चमका रहा है।

हकीकत तो यह है कि मौजपुर, गोकलपुरी, कर्दमपुरी, चांदबाग, कबीरनगर व विजय पार्क से ले कर घोंडा, खजूरी तक दंगे के निशान मौजूद हैं। जिनका सब कुछ लुट गया, उनकी बड़ी संख्या पलायन कर गई है, कई पीडित लोगों के घरों में आसरा लिए हैं।

ईदगाह से आगे चल कर ऐसे लोगों की खबर लेने की परवाह बुहत कम लोगों को है। दंगा पीड़ितों की दिक्कतें (Problems of riot victims) अनंत हैं- अपने घर को संभालना, अपने पुराने घर लौटने की हिम्मत और भरोसा जुटाना, पुलिए द्वारा दर्ज कर लिए गए दो हजार से ज्यादा मुकदमों में अपना नाम आने से बचाना, अपने रोजगार की व्यवस्था देखना।

मुस्तफाबाद में दंगे नहीं हुए क्योंकि यहां एक तो लोग संपन्न हैं और दूसरे अधिकांश आबादी एक ही समुदाय की है। इसके बावजूद असुरक्षा का भाव ऐसा है कि हर गली के शुरू होने वाली जगह पर लोहे के दरवाजे लगाए जा रहे हैं।

इन मेहफूज दरवाजों के भीतर फिलहाल जो सैंकड़ों लोग आसरा पाए हैं, उनके फिर से सामान्य जीवन शुरू किए बगैर ऐसी सुरक्षा व्यवस्था बेमानी है और उसके लिए भरोसे की बहाली के मजबूत दरवाजों की ज्यादा जरूरत है।

वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी की रिपोर्ट

 

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