यदि कांशीराम न होते ?

KanshiRam कांशीराम

If Kanshi Ram were not there?

आज एक ऐसे महापुरुष का जन्मदिन है जो अगर भारत भूमि पर भूमिष्ठ नहीं हुआ होता तो हज़ारों साल की दास जातियों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा पैदा नहीं होती; लाखों पढ़े-लिखे नौकरीशुदा दलितों में ‘पे बैक टू दि सोसाइटी ‘की भावना (The spirit of ‘pay back to the society’ among employed Dalits) नहीं पनपती; दलित साहित्य में फुले-पेरियार-आंबेडकर की क्रांतिकारी चेतना का प्रतिबिम्बन नहीं होता; पहली लोकसभा के मुकाबले हाल के लोकसभा चुनावों में पिछड़ी जाति सांसदों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि तथा सवर्ण सांसदों की संख्या में शोचनीय गिरावट नहीं परिलक्षित होती: तब किसी दलित पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में देखना सपना होता; अधिकांश पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्राह्मण ही नज़र आते तथा विभिन्न सवर्णवादी पार्टियों में दलित-पिछड़ों की आज जैसी पूछ नहीं होती; लालू-मुलायम सहित अन्यान्य शूद्रातिशूद्र नेताओं की राजनीतिक हैसियत स्थापित नहीं होती; तब जातीय चेतना के राजनीतिकरण का मुकाबला धार्मिक –चेतना से करने के लिए संघ परिवार हिंदुत्व, हिन्दुइज्म या हिन्दू धर्म को कलंकित करने के लिए मजबूर नहीं हुआ होता।

कांशीराम : वर्ग संघर्ष के महानायक

Biography of kanshiram in hindi

जी, हाँ आज 1934 के 15 मार्च को पंजाब के रोपड़ जिले के खवासपुर गाँव में जन्मे उस कांशीराम का जन्मदिन है, जिनके जीवन में आज से लगभग छः दशक पूर्व पुणे के इआरडीएल में सुख- शांति से नौकरी करने के दौरान एक स्वाभिमानी दलित कर्मचारी के उत्पीड़न की घटना (Incident of harassment of Dalit employee) से नाटकीय भावांतरण हुआ.जिस तरह राजसिक सुख-ऐश्वर्य के अभ्यस्त गौतम बुद्ध ने एक नाटकीय यात्रा के मध्य दुःख-दारिद्र का साक्षात् कर, उसके दूरीकरण के उपायों की खोज के लिए गृह-त्याग किया, कुछ वैसा ही साहेब कांशीराम ने किया.

आम दलितों की तुलना में सुख- स्वच्छंद का जीवन गुजारने वाले साहेब जब ‘दूल्हे का सेहरा पहनने’ के सपनो में विभोर थे, तभी दलित कर्मचारी दीनाभाना के जीवन में वह घटना घटी जिसने साहेब को चिरकाल के लिए सांसारिक सुखों से दूर रहने की प्रतिज्ञा लेने के लिए विवश कर दिया. फिर तो दीनाभानाओं के जीवन में बदलाव लाने के लिए उन्होंने देश के कोने-कोने तक फुले, शाहू जी, नारायण गुरु, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर, पेरियार इत्यादि के समाज-परिवर्तनकामी विचारों तथा खुद की अनोखी परिकल्पना को पहुंचाने का जो अक्लांत अभियान छेड़ा, उससे जमाने ने उन्हें ‘सामाजिक परिवर्तन के अप्रतिम –नायक’ के रूप में वरण किया.

सामाजिक परिवर्तन के इस महानायक पर समाज विज्ञानियों ने हजारों-लाखों पन्ने रंगे हैं पर, वर्ग संघर्ष के अप्रतिम नायक के रूप उनकी भूमिका अगोचर रह गयी, जबकि उनकी पूरी परिकल्पना वर्ग संघर्ष से प्रेरित थी।

कांशीराम के उदय पूर्व : वर्ग-संघर्ष लायक हालात

प्रबुद्ध पाठक जानते हैं कि मार्क्स ने एक सौ सत्तर साल पहले इतिहास की व्याख्या करते हुये कहा था, ’अब तक के विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-सघर्ष का इतिहास है। एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात जिसका शक्ति स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक- पर कब्जा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है। पहला वर्ग सदैव ही दूसरे वर्ग का शोषण करते रहता है। समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस मे संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता। नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है।‘

गुलाम भारत में जन्मे कांशीराम का जिन दिनों भावांतरण हुआ, उन दिनों डॉ आंबेडकर के एकल प्रयास से समाज के रूप में खासा परिवर्तन हो चुका था, बावजूद इसके स्वाधीनोत्तर भारत में समाज का चित्र वैसा ही था जिन स्थितियों में दुनिया भर मे वर्ग संघर्ष संगठित हुये। हजारों वर्ष पूर्व ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त जिस जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का संपदा, संस्थाओं और उच्चमान के लाभकारी पेशों सहित उत्पादन के समस्त साधनों पर एकाधिकार था; स्वाधीन भारत में भी उनका शक्ति के समस्त स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्जा रहा।

हजारों वर्ष पूर्व की भांति स्वाधीन भारत में भी ब्राह्मणों की ‘भूदेवता’; क्षत्रियों की जन अरण्य के ‘सिंह’ और वैश्यों की ‘सेठ जी’ के रूप मे सामाजिक मर्यादा बरकरार थी।

15 प्रतिशत से अधिक लोग कोर्ट-कचहरी, ऑफिस, शहर और शिल्प व्यवस्था, चिकित्सा और बाज़ार, फिल्म-मीडिया के अवसर का लाभ उठाने की क्षमता अर्जित नहीं कर पाये थे। 15 प्रतिशत वाले जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग को छोड़कर शेष जनता में 16-18 प्रतिशत लोग विधर्मी रूप में उपेक्षित; 44 प्रतिशत पिछड़े-अतिपिछड़े अयोग्य रूप मे विघोषित; साढ़े सात प्रतिशत लोग आदिवासी-जंगली रूप मे धिक्कृत व निंदित तथा 15-16 प्रतिशत लोग अछूत रूप मे तिरस्कृत व बहिष्कृत रहे।

शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत व वंचित इन्हीं 85 प्रतिशत लोगों की दशा में बदलाव लाने के लिए ‘गरीबी हटाओ’ और ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा देकर सत्ता दखल किया गया। शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत इन्हीं सर्वहाराओं की वंचना में वर्ग-संघर्ष की अनुकूल स्थितियां देखकर कुछ लोग सत्तर के दशक में बंदूक के बल पर सत्ता दखल की दिशा मे अगसर हुये। इस लक्ष्य में विफल होने के बावजूद आज भी ये लोग बंदूक के बल पर सत्ता दखल का सपना देखना नहीं छोड़े हैं।

‘गरीबी हटाओ’ और ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नारा देने वालों के साथ बंदूक के बल पर सत्ता दखल का सपना देखने वाले लोग उसी जन्मजात शोषक व सुविधाभोगी वर्ग से रहे, जिंनका शक्ति के स्रोतों पर हजारो वर्ष पूर्व की भांति ही स्वाधीन भारत में एकाधिकार था। ये ऐसे लोग थे, जिनका डेमोक्रेसी की ताकत में कोई भरोसा नहीं था। भारतीय समाज से लगभग पूरी तरह अंजान इन लोगों ने रूस –चीन जैसे श्रेणी समाजों में गरीबी की जठर से पैदा हुई क्रांति की सफलता से उत्साहित होकर ऐसा मान लिया कि भारत के जाति समाज में भी गरीबी क्रान्ति का निर्णायक कारक बन सकती है। वंचित समाजों से कटे-फटे इन कल्पना विलासी क्रांतिकारियों को पता नहीं था कि भारत में सर्वहारा नहीं, ‘सर्वस्वहारा’ रहते हैं और ये पूंजी के दास नहीं, हिन्दू ईश्वर- धर्मशास्त्र सृष्ट ‘दैविक – दास’(divine slaves) और ‘दैविक-सर्वस्वहारा’(divine-proletariats) हैं। हिन्दू धर्म का प्राणाधार जाति/वर्ण- व्यवस्थाजनित मानसिकता के कारण इनमें स्वधीनता की चेतना, वित्त-वासना व सर्व-सुविधासंपन्न सवर्णों की भांति उन्नततर जीवन जीने की कोई चाह ही नहीं है: ये सब चेतनायेँ इनके जीवन से कपूर की भांति उड़ा दी गयी है।

बहरहाल लेनिन-माओ के चेलों के विपरीत स्वाधीन भारत में उपजी वर्ग-संघर्ष की स्थितियों के सदव्हवहार के लिए कांशीराम एक भिन्न परिकल्पना लेकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किए।

कांशीराम की वर्ग-संघर्ष की परिकल्पना और बामसेफ | Kanshi Ram’s concept of class struggle and BAMCEF

कांशीराम को लोकतन्त्र में अपार विश्वास रहा। इस विश्वास के कारण उन्हें यह सत्योंपलब्धि करने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि लोकतन्त्र में सत्ता दखल में मुख्य फैक्टर संख्या-बल होता है और भारत में यह संख्या-बल दलित-आदिवासी-पिछड़ों और इनसे धर्मांतरित तबकों के पास है। लेकिन इन तबकों की समस्या मानसिक है, जिस कारण न तो शासक बनने का सपना देखते हैं और न ही सवर्णों की भांति सुख-समृद्धि का जीवन जीने की आकांक्षा पालते हैं। अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए कांशीराम पहले खुद को शूद्रातिशूद्रों समाज में जन्मे ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज, नारायणा गुरु, पेरियार और डॉ॰ आंबेडकर इत्यादि क्रांतिकारी महापुरुषों के विचारों से लैस किए। फिर एक कुशल मनोचिकित्सक की भूमिका में अवतरित होकर वीभत्स-संतोषबोध के शिकार जन्मजात शोषितों की मानसिकता में इच्छित बदलाव लाने हेतु बामसेफ के निर्माण की दिशा में अग्रसर हुये। दिन नहीं, रात नहीं: अर्थाभाव और तमाम प्रतिकूलताओं के मध्य साहब कांशीराम बामसेफ के बैनर तले 85 प्रतिशत शोषितों के जेहन में यह बात बिठाने का ताउम्र अक्लांत अभियान चलाये -:

’प्राचीन विश्व में सुख-समृद्धि की अनुपम मिसाल सिंधु-घाटी के सृजनकर्ता आपके ही पुरूखे रहे, जिन्हें छल-बल- कल से विदेशी आर्यों ने पराजित कर भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया। बाद मे अधीन बनाए गए मूलनिवासियों की भावी पीढ़ी को चिरकाल के लिए दास के रूप में इस्तेमाल करने और देश की संपदा-संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए वर्ण/ जाति-व्यवस्था को जन्म दिया। जाति-व्यवस्था से मूलनिवासी शूद्रातिशूद्रों का सत्यानाश हुआ। इस व्यवस्था के तहत हमें पढ़ने-लिखने नहीं दिया गया, धन-धरती का मालिक नहीं बनने दिया गया। इससे हमें अपमान मिला है और आर्यों को मिला धन-धरती और मान सम्मान। बहुजन समाज को अपमानित किया गया, गुलाम बनाया गया और ऐसी व्यवस्था बना दी गयी कि आगे भी इस समाज से गुलाम पैदा होते रहें। ऐसे में सभी मूलनिवासियों को चाहिए कि आपसी दुश्मनी भुला और संगठित हो कर सवर्णों को सत्ता से दूर धकेलकर हम अपने पुरुखों का खोया गौरव प्राप्त करें और धन-धरती का मालिक बनें।‘

कांशीराम का लक्ष्य रहा : बहुजनों को धन-धरती का मालिक बनाना

Kanshi Ram’s goal was to make Bahujans the master of wealth and land.

वर्ग संघर्ष के इतिहास में शोषितों की लड़ाई लड़ने वाले (Fighters of the exploited in the history of class struggle) हर नेतृत्वकारी व्यक्ति/संगठन का लक्ष्य सत्ता दखल कर वंचितों को धन-धरती का मालिक बनाना रहा है। और भारत में यह लड़ाई सबसे सुपरिकल्पित रूप में किसी ने लड़ी तो, वह कांशीराम ही थे। इस देश की संपदा-संस्थाओं पर एकाधिकार जमाये वर्ग के विरुद्ध लोकतान्त्रिक पद्धति से निर्णायक विजय पाने के मकसद से ही उन्होंने परस्पर घृणा और शत्रुता से लबरेज 6000 से अधिक जाति/उपजाति में बंटे लोगों को जोड़कर एक वर्ग,’बहुजन समाज’ में तब्दील करने का असंभव सा काम शुरू किया। यह काम बहुत कठिन था, जिसके कारण वह खुद ही अपने जीवन के शेष दिनों में स्वीकार किए थे कि भारी प्रयासों के बाद वह 6000 जाति/उपजाति मे बंटे समूहों में बमुश्किल 600 को ही जोड़ पाये हैं। यह बात सही है कि कांशीराम अपने असामयिक निधन के कारण शोषकों के खिलाफ जिस संघर्ष की परिकल्पना की थी, उसमे आंशिक रूप से सफल हो पाये। किन्तु भारत के शोषकों लड़ने के लिए उन्होंने रणनीति स्थिर की थी, उसे निर्भूल मानकर आज भी मूलनिवासी समुदायों के संगठन व बुद्धिजीवी अग्रसर हैं। आज भी असंख्य धड़ों में विभाजित बामसेफ के लोग बहुजन समाज बनाने के लिए उसी मूलनिवावादी का सहारा ले रहे हैं। बहुजन समाज बनाकर ही भारत में शोषक वर्ग के खिलाफ लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, इस दिशा में जितना एक शिक्षित बहुजन तत्पर रहता है, उतना ही विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक।

जाति चेतना का चमत्कार

कांशीराम ने सदियों के जन्मजात शोषकों के खिलाफ संघर्ष चलाने की सुचिन्तित परिकल्पना के तहत ही शोषितों के सक्षम लोगों को पे बैक टु द सोसाइटी के मात्र से दीक्षित किया; इस हेतु ही उन्होंने ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा’, ‘तिलक तराजू और तलवार..’ तथा ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा उछाला : सर्वोपरि इसी मकसद से उन्हों ने ‘जाति चेतना के राजनीतिकरण’ का अभियान चलाया।‘ इसके लिए उन्हों ने अन्य महापुरुषों की भांति जाति का उन्मूलन जैसे असंभव से काम के बजाय जातियों के इस्तेमाल की रणनीति पर काम किया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न जातीय समूहों के मध्य हजारों साल से मनुवादी व्यवस्था में सवर्णों से मिले शोषण-वंचना को याद दिला-दिला कर वर्गीय चेतना से लैस किया। वंचितों में आई वर्गीय चेतना को मुख्यधारा के राजनीतिक विश्लेषकों ने जाति चेतना का नाम दिया। कांशीराम के सौजन्य से सबसे पहले इस चेतना से लैस दलित समुदाय की अग्रसर जातियाँ हुईं : परवर्तीकाल में आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मांतरित तबकों में यह प्रसारित हो गयी। मनुवादी व्यवस्था में मिली वंचना का सद्व्यवहार कर कांशीराम ने बहुजनों की जातिय चेतना का जो राजनीतिकरण किया, उसका असर चमत्कारिक रहा। इसके फलस्वरूप बीसवीं सदी के शेष तक शक्ति के स्रोतों पर काबिज सवर्ण राजनीतिक तौर पर लाचार समूह मे तब्दील हो गए और वे अपना वजूद बचाने के लिए कांशीराम के जातीय चेतना से साधारण से महाबली बने माया-मुलायम, लालू-पासवान के चरणों मे आश्रय ढूँढने लगे। किन्तु 21 वीं सदी के शुरुआती वर्षों में बीमारी के कारण राजनीतिक रूप से कांशीराम के निष्क्रिय होने के बाद भारतीय राजनीति पर जाति चेतना का प्रभाव शिथिल होने लगा और 2006 में उनके परिनिवृत्त होने के बाद बहुजनों की जाति चेतना दम तोड़ने लगी।

जाति चेतना से महाबली बने बहुजन नेता पीएम-सीएम बनने की चाह में जाति-मुक्त दिखने की होड़ लगाने लगे। अपने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए उन्होंने तिलक-तराजू, भूराबाल इत्यादि नारों से पल्ला झाड़ना शुरू किया। इससे जाति चेतना की राजनीति म्लान पड़ने लगी। इसके म्लान पड़ने के साथ-साथ सवर्ण भारतीय राजनीति में अपना खोया गौरव पाने के दिशा में अग्रसर हुये और आज की तारीख में दावे के साथ कहा जा सकता है कि जाति चेतना की राजनीति लगभग पूरी तरह म्लान हो चुकी है, इसके साथ उनका शक्ति के समस्त स्रोतों के साथ राजनीति पर भी वर्चस्व कायम हो चुका है, जिनके खिलाफ कांशीराम ने भारत के जन्मजात शोषितों को संगठित करने की परिकल्पना की थी।

तब अवाम को भारतीय राज्य पर भरोसा था

बहरहाल इतिहास में सत्तत चलते रहने वाले वर्ग संघर्ष की निर्भूल परिकल्पना एक ऐसे समय में की थी, जब देश को आज़ाद हुये महज़ दो-ढाई दशक हुये थे : वंचितों को तब भी भरोसा था कि स्वाधीन भारत के शासक संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की 25 नवंबर, 1949 की इस सावधानीवाणी- ‘हमें निकटतम भविष्य के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खात्मा कर लेना होगा, नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता उस लोकतन्त्र के ढांचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है- पर अमल करते हुये उनकी बेहतरी के लिए कुछ करेंगे। शासकों से इस उम्मीद के कारण ही लेनिन-माओ के चेलों को जनता का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला; भारतीय राज्य से इस उम्मीद के कारण ही कांशीराम भारी प्रयास के बावजूद हजारों भागों में बिखरी महज 10 प्रतिशत वंचित जातियों को ही कांशीराम जोड़ सके। किन्तु साहेब कांशीराम ने लोकतांत्रिक तरीके से जिस वर्ग संघर्ष को अंजाम देने की परिकल्पना की आज की तारीख में उसके लिए अभूतपूर्व अनुकूल हालात पैदा हो चुके हैं। आज की तारीख में भारत का बहुजन शासकों से पूरी तरह मोहमोक्त हो चुका है।

वर्तमान हालात में क्या करते कांशीराम

आज भारत में सामाजिक अन्याय की शिकार विश्व की विशालतम आबादी को आज जिस तरह विषमता का शिकार होकर जीना पड़ रहा है, उससे यहां विशिष्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन पनपने की ‘निश्चित दशाएं’ साफ़ दृष्टिगोचर होने लगीं हैं. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतः सामाजिक असंतोष, अन्याय, उत्पादन के साधनों का असमान बंटवारा तथा उच्च व निम्न वर्ग के व्याप्त खाई के फलस्वरूप होता है.

सरल शब्दों में ऐसे आन्दोलन आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की कोख से जन्म लेते हैं और तमाम अध्ययन साबित करते हैं कि भारत जैसी भीषणतम गैर-बराबरी पूरे विश्व में कहीं है ही नहीं.

जनवरी 2018 में आई ऑक्सफाम की रिपोर्ट बताती है कि देश की टॉप की 1 प्रतिशत आबादी का 73 प्रतिशत धन-दौलत पर कब्ज़ा हो गया है, जबकि 2015 की क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट का अनुसरण करने पर पता चलता है आज टॉप की 10 प्रतिशत आबादी का प्रायः 90 प्रतिशत धन-दौलत पर कब्ज़ा हो चुका है. वहीं विभिन्न रिपोर्टो से यह तथ्य सामने आया है कि नीचे की 60 प्रतिशत आबादी महज 4.7 प्रतिशत धन पर गुजर-वसर करने के लिए विवश है.

भारत में जो बेनजीर गैर-बराबरी पनपी है, उसके लिए मुख्यरूप से जिम्मेवार है, नवउदारवादी नीति, जिसे आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के मकसद से नरसिंह राव ने 24 जुलाई,1991 को ग्रहण किया था. बहुजनों के खिलाफ इस हथियार को इस्तेमाल करने में राव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह ने भी होड़ लगाया, किन्तु इस मामले में जिसने सबको बौना बनाया है, वह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं. इन्होंने अपनी सवर्णपरस्त नीतियों से विगत साढ़े चार में आरक्षित वर्गों को गुलामी की ओर ठेल दिया है. इनकी नीतियों से बहुजन समाज उन स्थितियों के सम्मुखीन हो गया है, जिन स्थितियों में विवश होकर विभिन्न देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए.

क्रान्तिकारी आन्दोलनों में बहुसंख्य लोगों में पनपता ‘सापेक्षिक वंचना’ का भाव आग में घी का काम करता है, जो वर्तमान भारत में दिख रहा है.

क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ’दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें !’

सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना. दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमे भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता. दक्षिण अफ्रीका में जिन 9-10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के समस्त स्रोतों में 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा था, वे आज प्रत्येक क्षेत्र में ही अपने संख्यानुपात में सिमटते जाने के कारण वहां से पलायन करने लगे है. लेकिन आज भारत में हजारों साल के जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के प्रत्येक क्षेत्र में असीमित प्रभुत्व से यहाँ के वंचितों को अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के वंचितों से भी कहीं ज्यादा सापेक्षिक वंचना के अहसास से भर दिया है. इसके कारणों की तह में जाने पर दिखाई पड़ेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80 -90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्हीं के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की हैं. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है. मंत्रिमंडलों मंत्रीमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सुविधाभोगी वर्ग जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में नहीं है, लिहाजा भारत के बहुजनों जैसा सापेक्षिक वंचना का अहसास भी कहीं नहीं है.

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त तबकों के शक्ति के तमाम स्रोतों पर ही 80-90 प्रतिशत कब्जे ने बहुजनों में सापेक्षिक वंचना के अहसास को धीरे-धीरे जिस तरह विस्फोटक बिन्दु के करीब पहुंचा दिया है, उससे बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित होने लायक पर्याप्त सामान जमा हो गया है. भारत में सापेक्षिक वंचना का भाव क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक और शर्त पूरी करता दिख रहा है और वह है ‘हम-भावना’ का तीव्र विकास.

कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध बहुत पहले से ही ‘हम-भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया था, जिसमें आज और उछाल आ गया है। क्रान्तिकारी बदलाव में दुनिया के प्रत्येक देश में ही लेखकों ने प्रभावी भूमिका अदा किया है. मंडल के दिनों में वंचित जातियों में बहुत ही गिने-चुने लेखक थे: प्रायः 99 प्रतिशत लेखक ही विशेषाधिकारयुक्त वर्ग से थे, जिन्होंने मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग को आक्रोशित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी. तब उसकी काट करने में वंचित वर्गों के लेखक पूरी तरह असहाय रहे. लेकिन आज की तारीख में वंचित वर्ग लेखकों से काफी समृद्ध हो चुका है, जिसमें सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है. सोशल मीडिया की सौजन्य से इस वर्ग में लाखों छोटे-बड़े लेखक – पत्रकार पैदा हो चुके हैं, जो देश में व्याप्त भीषणतम आर्थिक और सामाजिक विषमता का सदव्यवहार कर वोट के जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में निरंतर प्रयत्नशील हैं.

बहरहाल उपरोक्त स्थिति को देखते हुये क्या दावे से नहीं कहा जा सकता कि आज की तारीख में यदि कांशीराम होते तो वे अवश्य ही शक्ति के स्रोतों पर बेपनाह कब्जा जमाये वर्गों के खिलाफ लोकतांत्रिक क्रांति घटित कर जन्मजात वंचितों को धन-धरती का मालिक बनाने का जो उनका सपना था, उसे पूरा कर दिखाते। लेकिन बहुजन समाज भाग्यशाली नहीं रहा इसलिए कांशीराम अपना सपना पूरे किए बिना ही 9 अक्तूबर, 2006 को वंचितों को रोते-विलखते छोड़कर दुनिया से चले गए।

क्या और कोई कांशीराम की भूमिका में अवतरित होकर लोकतान्त्रिक क्रान्ति के वर्तमान हालात का सद्व्यवहार कर सकता है?

-एच एल दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )

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