राह चलते कोई तुम्हें थप्पड़ मारे तो?

राह चलते कोई तुम्हें थप्पड़ मारे तो?

कहानी काफी पुरानी है। मेरी किशोरावस्था की। कहीं से भी, जो कुछ भी मिले, पुरानी पत्रिकाएँ, फटी किताबें, उन्हें जमा कर बार-बार पढ़ने के वे दिन। उन दिनों मैं जो कुछ पढ़ता, उस में से बहुत सारा मेरे पल्ले नहीं पड़ता था। लेकिन उस में से कुछ शायद दिल की गहराइयों में जाकर कहीं बस जाता था। एक लंबे अंतराल के बाद उस के मायने समझ में आने लगे। बूझना तो खैर अभी-अभी की बात है।

उन दिनों मशहूर मराठी हास्य-व्यंग्यकार पु. ल. देशपांडे जी (पु. ल.) की एक रचना पढ़ी थी। उस का शीर्षक भी काफी रोचक था – राह चलते कोई तुम्हें थप्पड़ मारे तो? – या ऐसा ही कुछ।

बाद में काफी ढूँढने पर, कई लोगों से पूछने के बाद भी, उस का पता नहीं चला। मैं आज भी उसे ढूंढ रहा हूँ। अगर मिल जाए तो मैं उस की हजारों प्रतियाँ बनाकर मुफ्त में बाँटूंगा, उस का पारायण – जाहीर पठन करूंगा। आखिर ऐसा क्या था उस रचना में?

बड़े तड़के उठ कसरत करना, आज की भाषा में ‘सिक्स पैक’ बनाना यह कभी लेखक की फितरत नहीं रही। लेकिन कुछ ‘सन्मित्र’ उन के पीछे पड़ जाते हैं; उन से पूछते हैं – “मान लो, राह चलते, कोई तुम्हें थप्पड़ मारें तो?” लेखक कहते हैं, “लेकिन कोई ऐसा क्यों करेगा? अगर मैंने उस का कुछ बिगाड़ा नहीं, तो वो भला मुझे थप्पड़ क्यों मारेगा?”

लेकिन ‘सन्मित्र’ लीक से हटने वालों में से नहीं हैं। वे फिर से दोहराते हैं – “लेकिन अगर ऐसा होता है, तो फिर तुम क्या करोगे? अपनी बेइज्जती सह कर चुपचाप मार खाओगे, दूसरा गाल आगे करोगे?”

“अरे भाई, लेकिन कोई ऐसा क्यों करेगा? उसे पागल कुत्ते ने काटा है क्या?,” लेखक अपने बचाव में बात रखते हैं।

“यहीं पर मार खाता है हिन्दोस्तान! हम समझते हैं कि सब अपनी ही तरह शरीफ, शांतिप्रिय हैं। लेकिन ‘वे’ ऐसे नहीं हैं। वे खुन्नस रखते हैं। ऊपर से चिकनी चुपड़ी बातें करेंगे, लेकिन आस्तीन के साँप बन कर कब ड़स लेंगे, आप को पता भी नहीं चलेगा। अब तक यही होता रहा है। इसीलिए सज्जन बार बार पराजित होते रहे हैं। लेकिन अब हम ऐसा होने नहीं देंगे। हमें शक्ति की उपासना करनी ही होगी। कोई आप पर हाथ उठाएं, इस से पहले ही उस का हाथ उखाड़ देने की क्षमता आप की भुजाओं में होनी चाहिए।”

‘सन्मित्र’ वीर रस में डूबे जा रहे हैं और लेखक अपनी ‘भुजाओं’ को देखकर सोचते हैं कि भले ही कलम पकड़ने की ताकत और कला इन भुजाओं में है, लेकिन किसी का हाथ उखाड़ना वगैरा इन के बस की बात नहीं। फिर भी कोई राह चलते अपने को थप्पड़ मारे और इसलिए हम शक्ति की आराधना करें, यह बात उन्हें हजम नहीं होती।

फिर वे ‘सन्मित्र’ द्वारा सुझायी सामूहिक बलोपासना की राह छोड़, सुबह उठ कर दौड़ लगाने जैसे सीधे सादे तरीके अपनाने की कोशिश करते हैं। अलार्म का गलत समय पर बजना, रात के अंधेरे में दौड़ लगाने वाले युवा लेखक को पुलिस ने चोर समझ कर पकड़ना, ‘बड़े साहब’ के पधारने तक उन्हें पुलिस थाने में रोक कर रखना, सुबह के समय बिन आस्तीन का बनियान और ढीली ढाली निकर पहने लेखक का शहर के मेन रोड से गुज़रना, चार चार फास्ट ट्रेन छोड़ने के बाद भी जिन का दर्शन दुर्लभ होता था, उन सभी कॉलेज क्वीन्स ने उन्हें इस ‘रूप’ में देखना आदि काफी रोचक मसाला इस लेख में है।

इस हास-परिहास के बाद लेखक पाठक को बतलाता है कि कोई हमें थप्पड़ मारे इस काल्पनिक भय से ग्रस्त होकर आत्मसुरक्षा के बहाने आक्रामक होना, दूसरे के मन में भय पैदा करने के लिए बलोपासना करना उन्हें मंजूर नहीं। ऐसा नहीं कि वह उन के बस की बात नहीं, बल्कि बाहुओं में मचलती मछलियों का प्रदर्शन करना, उन्हें पाने के लिए बड़े तड़के उठना उन्हें मंजूर नहीं।

वे कहते हैं – मीठी नींद से मुझे जगाने की ताक़त सिर्फ़ मल्लिकार्जुन मन्सूर, बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब, बेगम अख्तर जैसी भू-गन्धर्वों के सूर में है, किसी की वहशत में नहीं।

लेखक कोई नाम नहीं लेते। मगर दिलों के बीच ‘हम’ बनाम ‘वे’ की विभाजन रेखा खींचने वाली, ‘उन’ के खिलाफ नफ़रत का जहर उगालने वाली, बात-बात पर आक्रामकता की बुहार लगाने वाली सभी ताकतों को वे बे-नकाब करते हैं। बड़ी सहजता से वे बताते हैं कि बाहुओं में मचलने वाली मछलियों से ज़्यादा ताकत दिलों को जोड़ने वाले ‘ढाई आखरों में’ तथा दिल को विभाजन और पार्थिवता के परे ले जानेवाली कला में है। पाठक के मन पर यह संस्कार वे बड़ी ही सहजता और नज़ाकत से करते हैं, जो किसी भी अच्छी कलाकृति की पहचान है। 

मैंने खुद कला की इस ताकत को महसूस किया है। किशोरावस्था में मैं भी ‘उन का हाथ उठने से पहले ही उसे उखाड़ा जाए वाली विचारधारा से बहुत प्रभावित था। हमारे घर में तब ‘अंडे’ का नाम तक लेने की मनाही थी। लेकिन ‘वीर पुरुष’ की जीवनी पढ़ (जिस में वे म्लेच्छ लोग मांसाहार करने से बलशाली बनते हैं, ऐसा लिखते हैं ) मैंने भी बलशाली बनाने के लिए मांसाहारी बनाने का प्रण किया था। शाखा में खेल खेलते वक़्त ‘मराठा’ बन ‘मुगलों’ पर टूट पड़ने में बड़ा मज़ा आता था। लेकिन बाद में चेहरे पर मूँछों के साथ-साथ मेरे मन में नये विचार भी फूटने लगे और और मैं अनायास ही ‘हम ‘ बनाम ‘वे’ वाले विचारों से दूर चला गया। इस परिवर्तन का श्रेय सत्तर के दशक की बेचैनी, बाबा आमटे जी का शिविर इन के साथ-साथ इस रचना को तथा ऐसे साहित्य के गहरे मानसिक प्रभाव को भी जाता है। यह बात मेरी समझ में तब नहीं आयी थी; लेकिन आज उस का अहसास ज़रूर हुआ है। 

अब मेरे इर्द-गिर्द बाँहों में मचलने वाली मछलियों का प्रदर्शन करने वालों की पूरी फ़ौज खड़ी है।

हर कोई भयभीत है, इसीलिए उस की बाँहें मचल रही हैं। मैंने कभी किसी युद्ध का वर्णन पढ़ा था – समर शुरू होने से पहले हाथी आक्रमण के लिए इतने मचल रहे थे कि उन के पैरों से उछाली गयी मिट्टी से सारी रणभूमि धूल-धूसरित हुई थी। सब कुछ धुंधला-धुंधला नज़र आ रहा था। कौन शत्रु, कौन मित्र, समझ में नहीं आ रहा था। अब जो भी सामने आएगा, उस पर वार करना है, यही भाव हर योद्धा के मन में जाग रहा था…. मुझे आज कुछ वैसा ही महसूस हो रहा है। हर तरफ धूल ही धूल छायी है। आगे-पीछे कुछ दिखाई नहीं देता। सामने वाले पर टूट पड़ने के लिए लोग अकुलाए हुए हैं। ‘दुनिया जाए जहन्नुम में, मुझे बस अपना, अपने परिवार, जात, धर्म, देश का स्वार्थ देखना है। इसी का नाम ‘चाणक्य नीति’ है। आज की दुनिया में टिके रहने के लिए यही एक रास्ता है’, इस बात की दुहाई दी जा रही है।

मुझे ड़र है, शीघ्र ही विधर्मी हीरो-हीरोइन से प्यार करने पर भी पाबंदी लगाई जाएगी। लेखक दूसरे जाति का होगा, तो लोग उसकी किताबें पढ़ना बंद कर देंगे। किसी जमाने में अपने यहाँ हिन्दू जिमख़ाना, पारसी जिमख़ाना नाम से क्रिकेट की टीमें हुआ करती थीं। कल जात-धर्म-रंग के आधार पर टीमों का गठन कर उन में आईपीएल टूर्नामेंट खेली जाएगी। लेकिन फिर हर मैच के पहले और बाद में युद्ध जैसा माहौल पैदा होगा, उस का हम क्या करेंगे?

मेरे इर्द-गिर्द फैली इस धूल को साफ कर वातावरण को निर्मल बनाने की ताकत किस में है, इस सवाल से मैं बहुत परेशान हूँ।  

किसी जमाने में जिन के पास यह शक्ति हुआ करती थी, उन में से कई सारे आज आँखें मलते हुए मुझे नज़र आ रहे हैं। कुछ लोग अपनी टूटी-फूटी हवेली-गढ़ियों की मिल्कियत को लेकर आपस में जूझ रहे हैं। कई सरदार, जो अपने सिपाहियों की वफादारी को लेकर आशंकित हैं, उन की अग्नि परीक्षा लेने पर तुले हैं। कुछ अर्जुन रणभूमि पर ध्यान लगाए बैठे हैं; जब तक उन्हें गीता सुनाई नहीं जाती, वे शस्त्र धारण नहीं करेंगे।

समर, फिर वह महाभारत का हो, या कलिंग का, जब समाप्त होता है, तब जाकर लोग-बाग, उस की व्यर्थता को समझ कर (कुछ समय के लिए) सयाने हो जाते हैं, यह इतिहास रहा है। लेकिन मैं या मेरे जैसे अनगिनत लोग, जो बेवजह युद्ध या यादवी में मरना नहीं चाहते, क्या करें?

हम जानते हैं कि नफ़रत की आग को बुझाने ही ताक़त दिग्गज साहित्यिकों की कलम में, किशोरी आमोणकर-कुमार गंधर्व, रफी-लता-आशा की स्वर्गीय आवाज़ में, या कबीर-मीरा-तुकाराम की मलंग भक्ति में है। लेकिन जिन के पास ऐसा कुछ नहीं है, ऐसे हम जैसे सामान्य जन क्या कुछ नहीं कर सकते?

मैं आप से पु. ल. देशपांडे जी के इस लेख का पारायण करने के बारे में कह रहा था। वैसे भी अपने देश में धर्म ग्रन्थों के पारायण की परंपरा रही है, जैसे कि तुलसी रामायण या भागवत कथा। लोग आज भी अच्छी फिल्में देखने के लिए तरसते हैं। बच्चों को कहानी सुनने वाली किताबें, ऐप, कार्टून नेटवर्क इन का बोलबाला आज भी है। यानी कि छोटे हों या बड़े, सभी को आज भी कहानी सुनना अच्छा लगता है। फिर क्या हर्ज़ है अगर हम उन को कहानियाँ सुनाएँ? कहानी दुख की खोज में घर परिवार छोड़ कर जानेवाले सिद्धार्थ की, युद्ध जीतने के बाद शोक करने वाले अशोक की, दूसरों की मुक्ति के लिए खुद सूली पर चढ़ने वाले ईसा की, प्रेम दीवानी मीरा की, अक्का महादेवी की, मुगल महल में रह कर कृष्ण की आराधना करने वाली जोधा की, जोधा-अकबर के प्यार की, दशरथ मांझी की, ढाई आखर की। अपने ही सुर-ताल में, गद्य या पद्य में, महीन या बुलंद आवाज़ में प्रेम-आशा-सूरज की रोशनी की कहानी कहने में क्या हर्ज़ है, मैं कहता हूँ।   

रवीन्द्र रुक्मिणी पंढरीनाथ

(रवीन्द्र रुक्मिणी पंढरीनाथ : The author is a practitioner and activist of the inter-relation of sociology)

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.