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Narendra Modi Addressing the nation from the Red Fort

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न पर मोदीजी ने क्या शेख हसीना से कोई बात की?

Did Modiji talk to Sheikh Hasina on minority oppression in Bangladesh?

मोदी जी की बांग्लादेश यात्रा के निहितार्थ

ढाका के अखबारों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश में दो सौ साल पहले हुए दलित नवजागरण मतुआ आंदोलन के मुख्यालय जाने को प्रमुखता से कवर किया जाता है। बंगाल और बाकी देश में इस ऐतिहासिक किसान विद्रोह और दलित नवजागरण, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह और जमींदारों, अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, बौद्धों और मुसलमानों के बहुजन नवजागरण आंदोलन की कभी चर्चा ही नहीं हुई है। इतिहासकारों ने इसे सिरे से नज़रंदाज़ किया। नील विद्रोह, पाबना किसान विद्रोह, रंगपुर किसान विद्रोह, राजशाही किसान विद्रोह, गरामिं हड़ताल की कितनी ही घटनाएं इस नवजागरण से जुड़ी हुईं है। कोलकाता के नवजागरण का मतलब सवर्णों का नवजागरण था, जबकि मतुआ आंदोलन आम जनता, किसानों का जातिधर्म की दीवारें तोड़ने वाला आंदोलन है।

चाहे बंगाल के चुनाव जीतने और मतुआ दलित वोटबैंक साधने के लिए यह यात्रा की गई हो, लेकिन पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री की ओडाकांदी की यह यात्रा इस महादेश के इतिहास भूगोल पर नए सिरे से अध्ययन का मौका जरूर बनती हुई नजर आती है।

देश में और खास तौर पर मोदी बांग्लादेश और पश्चिम बांग्ला के बाहर प्रधानमंत्री की इस सोशल इंजीनियरिंग से दलित नवजागरण की दो सौ साल से दबी हुई कथा से परदा हटा है।

हम मोदी के एजेंडे की आलोचना करते रहे हैं और उनके जनविरोधी राजकाज, विभाजन की राजनीति का विरोध भी करते हैं। इसके बावजूद दो सौ साल से दबी हुई किसान आंदोलन की शक्ल में दलित नवजागरण के इस इतिहास पर फोकस बनाने के लिए उनका आभार।

अखण्ड भारत में दो सौ साल पहले हुए बहुजन नवजागरण के इतिहास पर प्रधानमंत्री की यात्रा से पर्दा उठा। इस अवसर का सही उपयोग क्या भारतीय बुद्धिजीवी करेंगे?

मोदी की बांग्लादेश की चुनावी यात्रा पर ममता ने कई सवाल उठाए, वह राजनीतिक तौर पर वाजिब है। चुनाव आचार संहिता का भी शायद उल्लंघन हुआ हो। लेकिन प्रश्न यह है कि दलित, मतुआ और शरणार्थी, पिछड़ा और आदिवासी वोट बैंक आज भाजपा के कब्जे में है और मुसलमानों का 33 फीसदी वोट बैंक विभाजित है। इस वोट बैंक की राजनीति किसने नहीं की?

भाजपा जो कर रही है, वह सरासर गलत है। लेकिन बंगाल और बाकी देश में 1947 से अब तक कांग्रेस, वाम दल, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे दल क्या कर रहे थे?

सवाल यह है कि कामरेड ज्योति बसु या ममता बनर्जी ने बंगाल के बहुजनों का इतिहास सामने लाने का कोई प्रयास किया?

कल तक दलित, मतुआ, पिछड़ा,आदिवासी और मुस्लिम वोटबैंक भाजपा के नहीं, इन्हीं दलों के कब्जे में थे। वह सही था और पाला बदलते ही नैतिकता के मानदंड बदल गए।

आगे चरचा से पहले कुछ बुरी खबरें साझा करना जरूरी है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न का सिलसिला कभी थमा नहीं है और न वहां से आने वाले शरणार्थियों के सैलाब।

इन बेनागरिक, आम सर्वस्व वंचित लोगों के दम पर बंगाल, असम और बाकी भारत की राजनीति चलती रही है। इन्हीं को साधने के लिए नागरिकता कानून में बार-बार संशोधन होते रहे हैं।

बंगाल असम में हीं नहीं, बाकी देश में भी हर राज्य में बिखरे विस्थापित लोग सत्ता की राजनीति के सचल बंधुआ बोट बैंक हैं जो मुसलमानों की तरह असुरक्षित हैं और सत्ता दल को समर्थन के सिवाय उनके बचने का कोई रास्ता नहीं है।

नागरिकता की राजनीति कुल मिलाकर यही है और सीएए का इस्तेमाल एनपीआर और एनसीआर से नागरिकता छीनकर समूचा भारत को मनुस्मृति का उपनिवेश बनाने के लिए किया जा रहा है।

मोदीजी बांग्लादेश से चले आये और आज बांग्लादेश के सभी अखबारों में बांग्लादेश में हिफाज़त, जमात और बीएनपी की ओर से भारी हिंसा और तांडव की खबरें छपी हैं।

हर बार बांग्लादेश की सियासी हिंसा के शिकार होते हैं अल्पसंख्यक। हिंसा के हर दौर में शरणार्थियों का नया सैलाब आता है।

1947 से लगातार ऐसा हो रहा है। इसे रोकने की भारत सरकार ने कभी कोशिश नहीं की।

अल्पसंख्यक उत्पीड़न पर भारत पाकिस्तान या भारत बांग्लादेश बातचीत कभी नहीं हुई और न शुरू से लेकर आज तक भारत सरकार की कोई शरणार्थी नीति रही है।

मोदी जी को जाहिर है कि बंगाल जीतने के लिए दलित मतुआ वोटबैंक की सख्त जरूरत है और वे खुशी-खुशी बांग्लादेश हो आए। लेकिन बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न पर उन्होंने शेख हसीना से कोई बात की?

उनकी इस ऐतिहासिक बांग्लादेश यात्रा के बाद बांग्लादेश में मातुआ दलितों पिछड़ों आदिवासियों बौद्धों ईसाईयों के साथ ताज़ा हिंसा की सुनामी में क्या होगा, उन्हें उसकी चिंता है?

ममता बनर्जी को कोई चिंता है?

कांग्रेस और वामदलों को?

और आपको?

पलाश विश्वास

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

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