Home » Latest » सिर्फ महिलाओं पर क्यों अंगदान का बोझ?
Organ Donation

सिर्फ महिलाओं पर क्यों अंगदान का बोझ?

The technology of organ transplant is a major miracle of medical science.

अंग प्रत्यारोपण की तकनीकी मेडिकल साइंस का एक बड़ा चमत्कार है। किसी मृत या जीते-जागते इंसान के शरीर के किसी खास अंग या उसके एक हिस्से को दूसरे व्यक्ति को लगा देना और उसे सक्रिय कर देने की इस तकनीक ने दुनिया में लाखों लोगों को नया जीवन दिया है। भारत में भी अब ऐसी तमाम टेक्नोलॉजी और सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन भारत की बड़ी आबादी के हिसाब से यहां न के बराबर अंग प्रत्यारोपण होता है।

भारत में अंग प्रत्यारोपण की मुश्किलें | Important Information About Organ Donation

दरअसल कोई भी टेक्नोलॉजी जब किसी समाज में आती है, तो उसके हिसाब से ढल जाती है, और असरदार या बेअसर हो जाती है। चूंकि भारत के कई समाजों में मरने के बाद शरीर को क्षति न पहुंचाने की मान्यता है, इसलिए मृत शरीर से अंग निकालकर उससे किसी को नवजीवन देना एक सहज बात नहीं है। साथ ही, समाज अभी इसके लिए तैयार भी नहीं है कि किसी के मरने के बाद उसके परिजनों से यह बात की जाए कि क्या वे इस मृत देह के कुछ उपयोगी अंगों को किसी और को देने की इजाजत देंगे। इसके अलावा मेडिकल सुविधाओं के अभाव के कारण ऐसे अंगों को सहेजकर रखने में भी दिक्कत है।

ये वे कारण हैं जिनकी वजह से भारत में प्रत्यारोपण के लिए अंगों की कमी हमेशा बनी रहती है। यह कमी आंख, किडनी, लीवर तमाम अंगों के लिए है।

भारत में अंग दान | भारत में अंगदान की स्थिति | Organ donation status in india

अंग प्रत्यारोपण अक्सर इसलिए रुके रहते हैं, क्योंकि अंग उपलब्ध नहीं होते, जबकि यह तय है कि कई बार अंग न मिलने की स्थिति में मरीज की मौत हो जाएगाी। मानव अंगों की मांग और आपूर्ति में अंतर की वजह से भारत में मानव अंगों का एक बाजार विकसित हो गया। होना तो यह चाहिए कि जिसे अंग की जरूरत है, उसे अंग उस आदमी से मिले जो उसे चाहता है या परिवार का सदस्य या दोस्त हो। लेकिन अक्सर होता यह है कि परिजन और प्रियजन अंग देने के लिए उपलब्ध नहीं होते और ऐसे में कोशिश की जाती है कि किसी आदमी को पैसे देकर अंग खरीद लिया जाए। खासकर किडनी के मामले में यह एक समय आम चलन था। 90 के दशक के आते-आते हालात इतने बिगड़ गए कि गांव के गांव लोगों ने थोड़ा सा पैसा कमाने के लिए किडनी बेच डालीं।

The Transplantation of Human Organs and Tissues Act, 1994 PASSED in 1994

इस वजह से 1993 में केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया और इस तरह 1994 में मानव अंग प्रत्यारोपण विधेयक पारित हुआ। इस कानून की वजह से जीवित व्यक्तियों से अंगों की खरीद-बिक्री को मुश्किल बना दिया गया। इस कानून में व्यवस्था है कि अगर अंगदान करने वाला व्यक्ति (Organ donor) परिवार का सदस्य नहीं है तो ऐसे मामलों को एक स्क्रूटनी यानी जांच कमेटी देखेगी कि कहीं अंगदान करने वाले ने रुपए-पैसे लेकर अंग तो नहीं बेचा है या कहीं उसे किसी तरह की लालच या धमकी तो नहीं दी गई है।

लेकिन अंगदान करने वाला अगर परिजन है तो ऐसे मामलों को स्क्रूटनी कमेटी तक ले जाने की जरूरत नहीं है।

यह सुविधा ही औरतों के लिए आफत बन गई है।

1994 का अंग प्रत्यारोपण कानून एक केंद्रीय एक्ट है। यह एक मॉडल कानून है, जिसके आधार पर राज्य सरकारों को अपने-अपने कानून बनाने थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वास्थ्य संविधान के तहत राज्य सूची का मामला है। केंद्र सरकार के कानून बनाने के बाद तमाम राज्य सरकारों ने मानव अंग प्रत्यारोपण कानून बनाए हैं।

यह कानून अपने सबसे बड़े लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब रहा है। मानव अंग की तस्करी और खरीद-बिक्री (Human organ trafficking and buying and selling) अब पहले से मुश्किल हुई है। हालांकि अब भी मानव अंग की खरीद-बिक्री के छिटपुट मामले आते रहते हैं।

इस कानून से यह फायदा भी हुआ कि मृत्यु की परिभाषा (Definition of death) भी निर्धारित हो गई।

अब ब्रेन डेड व्यक्ति यानी जिस आदमी के दिमाग ने काम करना पूरी तरह बंद कर दिया है, उसके अंग, प्रत्यारोपण के लिए लिए जाने का प्रावधान किया गया है। पहले इस मामले में उलझन थी और इस कारण होने वाले विलंब के कारण मृतक के शरीर से अंग समय पर निकाल पाना मुश्किल होता था।

लेकिन इस कानून ने एक मुश्किल भी खड़ी कर दी है। यह मुश्किल परिवार के अंदर की है। चूंकि परिवार के सदस्यों का अंग लेना आसान हो गया है, इसलिए अब परिवार के अंदर देखा जाने लगा कि किसका अंग लेना है या लिया जा सकता है। इस मामले में शिकार बन गई परिवार की महिलाएं।

अंगदान करने वालों में 85 फीसदी महिलाएं

देश के तीन अलग-अलग अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण और अंग दान के आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि अंग देने वालों में 85 फीसदी तक महिलाएं हैं। वही अगर इस आंकड़े को देखा जाए कि अंग मिलते किसे हैं तो पाएंगे कि सिर्फ 10 फीसदी अंग की महिलाओं को मिलते हैं, जबकि इन बीमारियों में स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है और अंगों की जरूरत दोनों को पड़ सकती है।

अगर पति और पत्नी के बीच अंग का लेन-देन हो रहा है तो 90 फीसदी से ज्यादा मामलों में पत्नी ही अंग दे रही है। पति आम तौर पर पत्नी को अंग नहीं देता।

1997 में ऐसा पहला शोध अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में हुआ और अब कई अस्पतालों के अंगदान के आंकड़ों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि अंगदान करने का लगभग पूरा बोझ महिलाएं उठा रही हैं।

इस बात के कई तर्क हो सकते हैं कि ऐसा क्यों हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह मानी गई कि परिवार में कमाऊ सदस्य आम तौर पर पुरुष होता है, इसलिए उसकी जान बचाना ज्यादा जरूरी होता है। लेकिन यही बात परिवार की महिलाओं के बारे में नहीं कही जा सकती। इसकी दूसरी बड़ी वजह शायद यह है कि महिलाओं को करवा चौथ समेत तमाम सांस्कृतिक ट्रेनिंग के तहत यह सिखाया जाता है कि पति परमेश्वर होता है और वे महिलाएं भाग्यशाली होती है, जो पति से पहले मर जाती हैं और जिन्हें विधवा होने का ‘शाप’ नहीं झेलना पड़ता है। एक और श्रेणी उन महिलाओं की है, जो प्यार की खातिर, अंग तो छोड़िए सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहती हैं। यह भी एक सांस्कृतिक अभ्यास का ही मामला है। वरना प्यार तो पुरुष को भी उतना ही करना चाहिए। लेकिन अंग देने जितना प्यार वह अक्सर नहीं कर पाता।

इसके अलावा ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जब लड़के वाले ने शादी से पहले ही लड़की का ब्लड ग्रुप और बाकी स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां ले लीं और किडनी मैच करने पर ही शादी हुई। अब पत्नी पर पूरा परिवार दबाव डालेगा कि बीमार पति की जान बचाओ और अंगदान करो।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह भी हुआ है शादी और फिर अंग लेने के बाद महिला को तलाक दे दिया गया।

ये बेहद जटिल सामाजिक स्थितियां हैं, जिसे कम समय में बदलना आसान नहीं होगा। अगर सरकार चाहती है कि अंगदान का बोझ सिर्फ औरतों पर न पड़े, तो इस बारे में कानून में बदलाव की जरूरत पड़ेगी। मौजूदा कानून में पहला संशोधन तो यह हो कि – अंग देना वाले चाहे परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, लेकिन स्क्रूटनी समिति हर हाल में उस शख्स से बात करे और ध्यान रखे कि महिला को बहला फुसलाकर या दबाव डालकर तो अंगदान नहीं कराया गया है। साथ ही ऐसा भी प्रावधान हो कि अंग देने वाली महिला से डॉक्टरों की एक टीम बात करे और कम से कम एक समय तो ऐसा जरूर हो जब डॉक्टर अंगदान करने वाले से बिल्कुल अलग से बातचीत करके उसकी राय ले। साथ ही अगर कोई व्यक्ति शादी के बाद पत्नी की किडनी ले और बाद में उस महिला को तलाक दे दिया जाए तो भी ऐसा प्रावधान हो कि महिला का भरण-पोषण अंग लेने वाले के परिवार की जिम्मेदारी हो।

ऐसा होने पर ही अंग प्रत्यारोपण कानून का चेहरा मानवीय हो पाएगा और महिलाओं से अंग ले लेने का रिवाज खत्म होगा।

गीता यादव     

(देशबन्धु में 30-12-2017 को प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

paulo freire

पाओलो फ्रेयरे ने उत्पीड़ियों की मुक्ति के लिए शिक्षा में बदलाव वकालत की थी

Paulo Freire advocated a change in education for the emancipation of the oppressed. “Paulo Freire: …

Leave a Reply