जलवायु परिवर्तन के चलते ‘डस्‍ट बोल’ काल के मुकाबले दोगुनी गर्मी पड़ने की आशंका

Environment and climate change

1930 के दशक में “डस्‍ट बोल” काल (dust bowl 1930) के दौरान अमरीका के विशाल मैदानी इलाके में रिकॉर्डतोड़ गर्मी बेहद लम्‍बे वक्‍त तक चली हीट वेव्स के कारण हुई थी।

In the US, there is a one-and-a-half-time chance of the heat of the dust bowl era in the 1930s

How was America transformed from wheat bowl to dust bowl?

नई दिल्ली, 24 मई 2020> अमेरिका में सबसे ज्‍यादा गर्मी वर्ष 1934 और 1936 में पड़ी थी। इस तपती गर्मी के चलते सूखा पड़ने से जमीन के स्‍वरूप में आये तेजी से बदलाव ने ग्रेट डिप्रेशन के साथ-साथ विनाशकारी ‘डस्‍ट बोल’ युग की भी भूमिका निभायी थी। एक ताजा अध्‍ययन में इस बात का पता लगाने की कोशिश की गयी है कि अगर वातावरण में छोड़ी जा रही ग्रीनहाउस गैसों के मौजूदा स्‍तर में वैसी तपती गर्मी पड़ी तो क्‍या होगा।

क्‍लाइमेट मॉडल का इस्‍तेमाल करके इस विश्‍लेषण में पाया गया कि 1930 के दशक में मानव की गतिविधियों की वजह से पैदा होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का स्‍तर तुलनात्‍मकरूप से कम था, मगर इसके बावजूद ऐतिहासिक डस्‍ट बोल काल में पड़ी तपती गर्मी की सम्‍भावना बढ़ी। हालांकि यह मामूली थी। हालांकि ग्रीनहाउस गैसों के वर्तमान स्‍तर के कारण वैसी ही तपती गर्मी पड़ने की सम्‍भावना करीब ढाई गुना हो जाएगी।

Why do we consider America as a bread basket and Dust Bowl?

अध्‍ययन के मुख्‍य लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न क्‍वींसलैंड के रिसर्च फेलो टिम कोवन के मुताबिक

‘‘1930 के दशक में पड़ी डस्‍ट बोल काल की तपती गर्मी बेहद दुर्लभ परिघटना थी और माना जा सकता है कि 100 साल में ऐसा एक बार होता है। हमारा अध्‍ययन यह दिखाता है कि ग्रीनहाउस गैसों के मौजूदा स्‍तरों में उस तरह की प्रचंड गर्मी की सम्‍भावना ढाई गुना है और उसके दोबारा पड़ने का समय भी 100 से घटकर करीब 40 साल ही रह गया है।’’

इस अध्‍ययन में ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किये गये जलवायु मॉडल (Climate models prepared by Oxford University) का इस्‍तेमाल किया गया है। यह मॉडल सुपरकम्‍प्‍यूटर्स पर नहीं बल्कि दुनिया भर में मौजूदा वॉलंटियर्स के पर्सनल कम्‍प्‍यूटर्स पर चलता है। यह खासतौर से 1930 के दशक की तपती गर्मी की पड़ताल के लिये उपयुक्‍त है, क्‍योंकि एक डस्‍ट बोल वर्ष के लिये हजारों स्टिमुलेशंस संचालित किये जा सकते हैं।

डॉक्‍टर कोवन ने कहा

‘‘हमारा अध्‍ययन ऐतिहासिक प्रचंड ग्रीष्‍म कालखंडों पर ग्रीनहाउस गैसों के प्रत्‍यक्ष प्रभाव पर केन्द्रित है। हालांकि हमारा यह भी मानना कि हम सम्‍भवत: प्रचंड गर्मी में इंसान के योगदान को कम आंकते हैं, क्‍योंकि इस मॉडल में ग्रेट प्‍लेंस में सूखे के दौरान बड़े पैमाने पर भू-परिवर्तन और फसलें खराब होने की पूरी पड़ताल शामिल नहीं होती।’’

एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में जलवायु प्रणाली विज्ञान के प्रोफेसर और इस अध्‍ययन रिपोर्ट के लेखक गेबी हेगेर्ल ने कहा

‘‘1936 अब भी महाद्वीपीय अमेरिका में सबसे गर्म वर्ष का रिकॉर्ड रखता है। मगर यह देश और भी तपिश भरी गर्मियों की तरफ बढ़ रहा है और वैश्विक रूप से इस प्रचंड तपिश का यह स्‍तर एक नया सामान्‍य स्‍तर है। इस सदी के दौरान अमेरिका में गर्मी और बढ़ने की सम्‍भावना है लिहाजा इस बात की प्रबल आशंका है कि वर्ष 1930 के दशक का रिकॉर्ड निकट भविष्‍य में ही टूट जाएगा।’’

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एनवॉयरमेंटल चेंज इंस्‍टीट्यूट के कार्यवाहक निदेशक और इस अध्‍ययन के लेखक फ्रीडीराइक ओटो ने कहा

‘‘अगर 1934 और 1936 की तरह प्रचंडतम गर्मी और सूखे के कारण वनस्‍पतियां नष्‍ट हुईं तो तपिश और भी तेज हो सकती है। इसका बुरा असर न सिर्फ अमेरिका पर बल्कि वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर भी पड़ेगा। इस अध्‍ययन के परिणामों से पता चलता है कि वैसे हालात बनने की आशंका पहले से कहीं ज्‍यादा है। साथ ही वे परिणाम ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन में कमी लाने और अनुकूलन सम्‍बन्‍धी अधिक महत्‍वाकांक्षी योजनाएं अपनाने का संदेश भी देते हैं।’’

नोट- The Dust Bowl was a period of severe dust storms that greatly damaged the ecology and agriculture of the American and Canadian prairies during the 1930s; severe drought and a failure to apply dryland farming methods to prevent the aeolian processes caused the phenomenon. (Wikipedia)

कोवन, टी एस अंडोर्फ, जी हेगेर्ल, एल हेरिंगटन और एफ ओटो (2020), वर्तमान समय में ग्रीनहाउस गैसें जल्‍दी-जल्‍दी पड़ने और लम्‍बे समय तक रहने वाली डस्‍ट बोल तपिश का कारण बन सकती हैं। (नेचर क्‍लाइमेट चेंज)

एनवॉयरमेंटल चेंज इंस्‍टीट्यूट

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी में वर्ष 1991 में एनवॉयरमेंटल चेंज इंस्‍टीट्यूट (Environmental Change Institute) की स्‍थापना की गयी थी। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन की प्रकृति, कारणों और प्रभावों पर अंतःविषय अनुसंधान को व्यवस्थित करना और बढ़ावा देना है। साथ ही भविष्य में जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए प्रबंधन रणनीतियों के विकास में योगदान करना है।

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें