योजनाओं के लॉलीपॉप पर भारतीय अर्थव्यवस्था

Nirmala Sitharaman and Anurag Thakur

Indian Economy on Lollipops of Plans

कोरोना के बढ़ते मामले और लॉकडाउन की विफलता (Corona mounting cases and lockdown failure) के बाद अब सरकार ने भारतीयों का ध्यान भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर कर दिया और अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए ‘आत्मनिर्भर’ भारत बनाने की कवायद शुरु कर दी। 3 जून साइकिल दिवस के दिन भारत की मशहूर एटलस साइकिल का कारखाना बंद हो गया (India’s famous Atlas cycle factory closes on 3 June Cycle Day) और एक हजार मजदूर सड़क पर आ गए। कोरोना संक्रमण के समय कारखाने के बंद होने का कारण लॉकडाउन होने की वजह मानना स्वाभविक है लेकिन सच्चाई यह है कि कोरोना संकट से पहले ही अर्थव्यवस्था बुरी हालत में पहुंच चुकी थी लेकिन अब सरकार इस बुरी हालत की जिम्मेदार कोरोना के माथे मढ़ना चाहती है। एटलस साइकिल का उत्पादन (Atlas Cycle Production) हरियाणा में 1951 में प्रारंभ हुआ था जिसकी तीन इकाइयां थी जिसमें से पहली इकाई मध्यप्रदेश के मालनपुर मे स्थित थी जो कि 2014 में बंद कर दी गई और दूसरी इकाई सोनीपत हरियाणा की 2018 में बंद कर दी गई अब तीसरी इकाई उत्तर प्रदेश साहिबाबाद 3 जून 2020 को बंद हो गई। तीनो इकाईयों के बंद होने के पीछे मालिकों ने वित्त की तंगी को कारण बताया।

इसी प्रकार 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से बिस्कुट की बिक्री में कमी आई है। पारले कंपनी के कैटेगरी हेड मयंक शाह ने कहा है कि

‘‘जीएसटी लागू होने के कारण कर बढ़ने से पारले जी बिस्कुट ब्रांड की बिक्री में कमी आई है। कर बढ़ने के कारण पारले को हर पैकेट में बिस्कुटों की संख्या कम करनी पड़ रही है जिसकी वजह से ग्रामीण भारत के निम्न आय वाले ग्राहकों की मांग पर असर पड़ रहा है। इसके कारण कंपनी के सबसे ज्यादा बिकने वाले 5 रुपये के बिस्कुट पर असर पड़ा है’’।

‘पारले जी’ की बिक्री में कटौती का सीधा मतलब है कि कंपनी को अपने उत्पाद में कटौती करनी पड़ेगी जिसके कारण आठ से दस हजार लोगो की नौकरियां जा सकती है’। जब ये कंपनियां बंद हो रही थी और लगातार मजदूरों की छंटाई की जा रही थी तब मोदी जी को क्यांे नही सूझा कि इन्हें आर्थिक मंदी से उबारा जाये इसके विपरीत 2019 तक भी सरकार बेरोजगारी के डाटा को छुपाती रही और आर्थिक मंदी को नकारती रही है।

Arrangement of loan to promote small scale industries under Pradhan Mantri Mudra Yojana

2014 में सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत सी ऐसी योजनाएं प्रारंभ की जिससे की भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाया जा सके। जैसे कि 2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (Pradhan Mantri Mudra Yojana) जिसमें लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए लोन की व्यवस्था की गई थी, जिससे लघु उद्योगों आत्मनिर्भर बन सके।

एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ विदेश भ्रमण कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में आने का न्यौता देते हैं। एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी आने से सैकड़ों लघु उद्योग बन्द हो जाते हैं और उनके बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गेट पर मजदूर के रूप में खड़े मिलते हैं।

Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana (PMKVY)

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, जिसका उद्देश्य (The objective of this Skill Certification Scheme) युवाओं में कौशल विकसित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था। 2018 का प्रधानमंत्री रोजगार योजना जिसका उद्देश्य युवाओं को रोजगार दिलाना था। इस रोजगार दिलाने में गृहमंत्री अमित शाह ने अफसर बनने से लेकर पकौड़े बेचने तक के काम को रोजगार में शामिल कर लिया था इसके साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ व स्वदेशी का राग अलाप कर स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर जोर दिया गया था जिसके तहत रामदेव के पतंजलि उत्पाद की बिक्री में बेहताशा वृद्धि हुई थी।

ऐसी अनेक योजनायें प्रारंभ होने के बाद भारत को अब तक आत्मनिर्भर बन जाना चाहिए था, इसके बावजूद भी भारत की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती रही और 2019-20 में जीडीपी 4.2 प्रतिशत पर आई जिसका लॉकडाउन से कोई लेना देना नहीं है।

एटलस साइकिल की दो यूनिटो का 2014 और 2018 में बंद होना बताता है कि 2014 से पहले भले ही अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी रही हो, लेकिन भारतीय अर्थव्यस्था का पतन 2014 से ही शुरु हो गया था और 2019 आते-आते आर्थिक मंदी ने विकराल रूप धारण कर लिया था।

नेशनल सेंपल सर्वे (एनएसएसओ) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे अधिक 6.1 प्रतिशत हो गई है जबकि कुछ शोध बेरोजगारी की दर 8 प्रतिशत से भी अधिक बता रहे है खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर 3-6 जून 2019 की मौद्रिक नीति समिति की समीक्षा बैठक में कह चुके है कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्पष्ट तौर पर अपनी रफ्तार खो रही है।

7 अगस्त 2019 की मौद्रिक नीति समिति की बैठक (Monetary Policy Committee Meeting,) में रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि ‘‘जून 2019 के बाद आर्थिक गतिविधियों से ऐसे संकेत मिल रहे है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ रही है’।

आज कोरोना के संकट के समय भले ही सरकार ने छोटे मंझोले कंपनियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बीस लाख करोड़ रुपये की योजना को प्रस्तावित किया, लेकिन सच्चाई यह भी है कि कोरोना आने से पहले ही कई औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई थी और कंपनियों के मालिक की आत्महत्याओं का सिलसिला चल पड़ा था।

2500 करोड़ के सलाना कारोबार करने वाले ‘कैफे कॉफी डे’ के मालिक वीजी सिद्धार्थ को आत्महत्या करनी पड़ी, जिसका व्यापार देश में ही नहीं, विदेशो, तक फैला हुआ था। मंदी की मार केवल छोटे मंझोले कारोबारी ही नहीं बड़े बड़े कारोबारी भी झेल रहे हैं। अर्थशास्त्री इसका मुख्य कारण नोटबंदी मानते हैं जिसके बाद देश की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है।

लेकिन मोदी सरकार इस बात को कभी भी स्वीकार करने को राजी नहीं हुई और अपनी योजनाओं और असफल उपलब्धियों की गिनती आज तक कर रही है।

Unemployment and recession affect IT world

बेरोजगारी और मंदी का असर आईटी जगत में भी देखा जा सकता है जमशेदपुर के आईटी सेल के प्रभारी कुमार विश्वजीत के 25 साल के बेटे आशीष कुमार ने नौकरी जाने के डर से आत्महत्या कर लिया।

आशीष खड़गझार की एक कंपनी में काम करते थे जो कि टाटा मोटर्स के लिए पार्ट्स बनाने का काम करती थी। आशीष के पिता ने कहा है कि टाटा मोटर्स में प्रोडक्शन काफी समय से रुका हुआ था जिसका असर आशीष की कंपनी पर भी पड़ रहा था इस कारण वह काफी समय से डरा सहमा रहता था।

Suicide due to loss of business | व्यापार में घाटा होने के कारण आत्महत्या

देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र के धूलकोट में 2 अगस्त को पिज्जा चलाने वाले कारोबारी ने आत्महत्या कर लिया जिसका कारण व्यापार में घाटा होना बताया जा रहा था।

व्यापार में घाटा होने के चलते ही कर्नाटक के 36 साल के व्यापारी ओम प्रकाश ने परिवार के पांच लोगों के साथ आत्महत्या कर लिया इसी प्रकार 3 अगस्त को ट्रक कि किस्ते नही चुका पाने के कारण हरियाणा निवासी 34 वर्षीय दलजीत सिंह ने घर में आत्महत्या कर लिया। व्यापार में घाटा व आत्महत्या करने वालों के ये कुछ उदाहरण है इस लिस्ट में सैकड़ों नाम है जो दर्ज किए जा सकते हैं।

आर्थिक मंदी पर बात करने वालों पर सरकार हमेशा राजनीति करने व अर्थव्यवस्था को चौपट करने की साजिश रचने का इल्जाम लगाती रही, जबकि सरकार ने स्वयं 1 जुलाई 2019 को लोकसभा में जानकारी दी है कि देश में 6.8 लाख से अधिक कम्पनियां बंद हो गई हैं’

इस मंदी का असर ही रहा है कि लॉकडाउन की घोषणा होते ही बहुत कम्पनियां बंद हो गईं और लाखों मजदूर सड़कों पर दिखने लगे। कोराना संकट ने सरकार की इस नाकामी को छुपा लिया और सरकार ने बड़ी चालाकी से इस संकट को अवसर में बदलते हुए उद्योगो को बढ़ावा देने के लिए बीस लाख करोड़ की घोषणा कर दी, लेकिन ये पैकेज भी अक्टूबर से लागू किए जायेंगे जबकि छोटी मंझोली कम्पनियां आज बंद पड़ी हैं, जिसके कारण लाखों मजदूर गांव की ओर पलायन कर चुके हैं और जो बाकी हैं उन कम्पनियों और मजदूरों को तत्काल सहायता राशि की जरूरत है।

एक करोड़ टर्नओवर वाली कम्पनियां भी अब एमएसएमई में गिनती की जायेगी इसका असर उन छोटे उद्योगों पर पड़ेगा जिनका टर्न ओवर कम है, क्योंकि एमएसएमई का लाभ उन कम्पनियों को मिलेगा जिनका टर्न ओवर एक करोड़ है। इस कारण से यह बड़ी मछलियां, छोटी मछलियों को खा जायेंगी। कहीं ऐसा न हो जाये कि ये पैकेज भी अन्य योजनाओं की तरह एक योजना मात्र साबित हो और मन्दी की मार झेल रहे लोग आत्महत्या को मजबूर होते रहे।

डॉ. अशोक कुमारी

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

 

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