भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की कोई सामाजिक जड़ें नहीं हैं और यह आर्थिक राजनैतिक संकट की सबसे बड़ी वजह है

आज प्रेरणा अंशु के  जुलाई अंक की तैयारी में था कि पान सिंह बोरा और बबिता उप्रेती आ गए। उनके आने के वक्त हम लोग यानी रूपेश, वीरेश और विकास स्वर्णकार भारत विभाजन के शिकार तराई के बंगालियों पर लिखी जाने वाली किताब (A book to be written on the Bengalis of Terai, victims of partition of India) के विषय पर बात कर रहे थे।

भारत विभाजन के पहले के बंगाल के सामाजिक और किसान आन्दोलन (Social and peasant movements of Bengal before partition of India) पर सिलसिलेवार बात हुई।

बंगाल के किसान आंदोलन (Bengal peasant movement,) के सिलसिले में मतुआ और चंडाल आंदोलनों के साथ-साथ जोगेंद्र नाथ मण्डल, मुकुंद बिहारी मल्लिक, कृषक प्रजा पार्टी से लेकर भारत के दलित साहित्य और दलित आंदोलन, कम्युनिस्ट आंदोलन और प्रगतिशील साहित्य से लेकर बहुजन समाज के हिन्दुत्वकरण पर चर्चा होती रही।

वाम आंदोलनों में जाति वर्चस्व की बात शुरू हुई तो पान सिंह और बबिता से बहस छिड़ गई।

यह बहस लम्बी चली।

इससे पहले रूपेश ने कहा कि बंगाल में शरणार्थियों के इतिहास के बारे में सन्दर्भ ग्रन्थ कहाँ से मिलेंगे।

मैंने कहा कि जो भी है वे हिंदी में नहीं होंगे। ज्यादातर बांग्ला में या फिर अंग्रेजी में। सारी कथा तीसरे पुरुष की जुबानी होगी क्योंकि उत्पीड़ित जनता ने अपनी कथा नहीं लिखी है। प्रथम पुरुष की कोई कथा उनमें नहीं है।

पहाड़ और पूर्वोत्तर की भौगोलिक नस्ली अस्पृश्यता पर भी बात हुई। राजनीति में प्रतिनिधित्व पर भी बात हुई। इसी सिलसिले में हमने ग्राम्शी के हवाले से इटली में नाज़ी हुकूमत से पहले की स्थितियों की भारत की मौजूदा स्थितियों से तुलना करते हुए कहा कि वही परिस्थितियां भारत में है।

बहुजन जनता में वर्ग चेतना न होने के लिये और अस्मिता राजनीति में उन्हें फँसाये रखने की कारपोरेट हिंदुत्ववादी राजनीति और रणनीति के सिलसिले में भारत के बुद्धिजीवियों के जाति वर्ग हितों की भी चीरफाड़ हो गई।

मैने कहा कि भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन मौजूदा चुनौतियों के मुकाबले आम जनता और खास तौर पर बहुजन जनता को लामबंद करने के लिए ज्यादा जरूरी है।

इसी सिलसिले में मैंने कहा कि बहुजन जनता को मनुस्मृति अनुशासन के तहत शिक्षा और सम्पत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया। आज भी भारत की बहुजन आबादी अंधेरे में हैं और उन्हें रोशनी में लाने की जिम्मेदारी प्रगतिशील जमात ने नहीं निभाई क्योंकि ऐसा करना उनके जाति और वर्ग हित के खिलाफ है।

बहस तीखी हो गयी।

अंततः मैंने कहा कि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की कोई सामाजिक जड़ें नहीं हैं और यह आर्थिक राजनैतिक संकट की सबसे बड़ी वजह है।

बहस अधूरी रही।

हम इस बहस को मुकम्मिल करना चाहते हैं। प्रेरणा अंशु दफ्तर दिनेशपुर में जनता के मुद्दों पर सम्वाद के लिए आप सभी का स्वागत है। आप चाहे तो आपसे भी हम मिल सकते हैं।

आप चाहें तो इस मुद्दे पर लिख भी सकतें हैं।

पलाश विश्वास

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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