भारतीय युवा बेहतर ढंग से अपनी मानसिक स्वास्थ्य का रख रहे हैं ध्‍यान : प्रैक्टो इनसाइट

भारतीय युवा बेहतर ढंग से अपनी मानसिक स्वास्थ्य का रख रहे हैं ध्‍यान : प्रैक्टो इनसाइट

मानसिक स्वास्थ्य सलाह लेने वालों में 44 प्रतिशत बढ़ोतरी

आज है विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस

57 प्रतिशत पूछताछ 25 से 34 वर्ष की उम्र के लोगों ने की

दिल्ली, 10 अक्टूबर, 2022: विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, दुनिया भर में 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य की वजह से 1.03 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है। वहीं, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Mental Health Survey) में पाया गया कि भारत की आबादी में से करीब 14 प्रतिशत लोगों को मानसिक स्वास्थ्य उपचार की आवश्यकता (need for mental health treatment) है। लेकिन भारतीय लोग अब मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कहीं अधिक जागरूक हो गए हैं और इसके समाधान के लिए सक्रिय तौर पर मदद भी ले रहे हैं।

देश की प्रमुख एकीकृत स्वास्थ्यसेवा कंपनी प्रैक्टो ने पाया है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत सलाह लेने वाले लोगों की संख्या (Number of people seeking individual mental health counseling) में जबरदस्त तेज़ी आई है और सालाना आधार पर ऐसे लोगों की संख्या 44 प्रतिशत बढ़ी है। पिछले वर्ष सलाह लेने वाले कुल लोगों में से 57 प्रतिशत 25 से 34 वर्ष की उम्र के रहे। इनमें से 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं थीं।

कोविड-19 की दूसरी लहर का भारतीयों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा बुरा असर 

प्रैक्टो से मिले आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने से पता चलता है कि कोविड-19 की दूसरी लहर का भारतीयों पर बहुत ही बुरा असर पड़ा जिसके संकेत मानसिक स्वास्थ्य के लिए ऑनलाइन सलाह लेने वालों की संख्या में 95 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी से चलता है।

इन जानकारी से उन वजहों का पता चलता है जिनका असर भारत के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है (अक्टूबर-सितंबर 2021 बनाम 2022) :

•    मादक द्रव्यों का सेवन, तनाव और अवसाद के बारे में प्लेटफॉर्म पर सबसे ज़्यादा सवाल पूछे गए

•    मादक द्रव्यों के सेवन से टियर 1 और 2 शहरों के लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, पूछताछ करने वाले 52 प्रतिशत लोग टियर 1 और 48 प्रतिशत लोग टियर 2 शहरों से आते हैं

•    टियर 1 शहरों में दिल्ली से पूछताछ करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा यानी करीब 20 प्रतिशत है जबकि मुंबई की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत रही

•    हालांकि, टियर 1 शहरों से सबसे ज़्यादा पूछताछ तनाव और अवसाद के बारे में की गई, 66% हिस्सेदारी के साथ टॉप 3 शहर दिल्ली, बेंगलुरू और मुंबई रहे

             (समयावधि: अक्टूबर 2021- सितंबर 2022)

•    मादक द्रव्यों का सेवन, पीटीएसडी और घबराहट कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनमें सालाना आधार पर सबसे ज़्यादा वृद्धि देखने को मिली

•    मादक द्रव्यों का सेवन करने के मामलों में, एल्कोहॉल की आदत से जुड़े सवालों में 28 प्रतिशत, ड्रग्स सेवन से जुड़े सवालों में 53 प्रतिशत और नशा छोड़ने के बाद के लक्षणों से जुड़े सवालों में सालाना आधार पर 98 प्रतिशत बढ़ोतरी देखने को मिली

•    खानपान की आदतों में गड़बड़ी और पीटीएसडी जैसे सवालों को लेकर भी सालाना आधार पर 42 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली

•    नीचे सवालों और घटनाओं के बारे में शहर के हिसाब से जानकारी दी गई है :

•    टियर 1 शहरों में दिल्ली से सबसे ज़्यादा सवाल यानी 20 प्रतिशत पूछे गए, इसके बाद मुंबई 10 प्रतिशत, बेंगलुरू 9 प्रतिशत, चेन्नई 6 प्रतिशत, हैदराबाद और पुणे 3 प्रतिशत। टियर 2 शहरों की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत रही (मादक द्रव्यों का सेवन)

•    खानपान में गड़बड़ी

•    दिल्ली 23 प्रतिशत

•    बेंगलुरू 19 प्रतिशत

•    मुंबई 13 प्रतिशत

•    हैदराबाद 10 प्रतिशत

•    पुणे 8 प्रतिशत

•    चेन्नई 6 प्रतिशत

•    टियर 2 – 21 प्रतिशत

•    पीटीएसडी :

•    दिल्ली 30 प्रतिशत

•    मुंबई 18 प्रतिशत

•    बेंगलुरू 17 प्रतिशत

•    पुणे 7 प्रतिशत

•    चेन्नई 6 प्रतिशत

•    हैदराबाद 5 प्रतिशत

•    टियर 2- 17 प्रतिशत

प्रैक्टो के चीफ हेल्थकेयर स्ट्रैटेजी ऑफिसर, डॉ. एलेक्जेंडर कुरुविला ने इन जानकारी के बारे में कहा, “देश में मानसिक स्थिति से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन अच्छी बात यह है कि लोग मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझ रहे हैं और मदद मांग रहे हैं। यह देखना बहुत ही सुखद है लेकिन जब बात मानसिक स्वास्थ्य की हो तो निजता और पहचान छिपाना महत्वपूर्ण हो जाता है और निजता का ध्यान रखते हुए विशेषज्ञों की मदद लेने में ऑनलाइन कंसल्टेशन ने अहम भूमिका निभाई है।”

डॉ. एल एच हीरानंदानी हॉस्पिटल में मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी (Dr. Harish Shetty, Psychiatrist at Dr. LH Hiranandani Hospital),  जो प्रैक्टो पर सलाह देते हैं, ने कहा, “वैश्वीकरण और आज की तेज़ गति के जीवन ने मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर डाला है। इस असर इतना बुरा है कि सात में से एक भारतीय मानसिक रूप से अस्वस्थ्य है। हालांकि देश के युवाओं में इसे लेकर जागरूकता बढ़ी है लेकिन इसके बारे में कम जानकारी रखने वाले परिवार अब भी बाधक के तौर पर काम करते हैं जिसे मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देकर ही पार किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानसिक बीमारी की समय से पहचान करके इसके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकेगा। इसके अलावा, इमोशनल कॉन्टैक्ट टाइम (ईसीटी) और फैमिली कॉन्टैक्ट टाइम (एफसीटी) को बढ़ाने से भी मदद मिल सकती है।”

Indian youth are taking better care of their mental health

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