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क्या अफगान संकट सुलझाने में भारत सक्रिय भूमिका निभाएगा !

अफगान संकट सुलझाने में भारत सक्रिय भूमिका निभाएगा,अफगान संकट सुलझाने में भारत की भूमिका

अफगान संकट सुलझाने में भारत की भूमिका! | India’s role in solving the Afghan crisis!

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

लम्बे समय तक निर्वाचित सरकार के शासन के पश्चात अफगानिस्तान पर तालिबानियों का कब्जा होना एक बार फिर से दुनिया भर के लिए चिंता का सबब बन गया है। सारे देशों को मिलकर वहां तत्काल लोकतंत्र की बहाली के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसा करते वक्त यह ख्याल रखना होगा कि ऐसा बगैर किसी महाशक्ति के अनावश्यक हस्तक्षेप के हो और वहां फिर से कोई अकेला देश अपनी स्थायी सैन्य तैनाती न करे। वैसे तो वहां के राष्ट्रपति अशरफ गनी (Afghan President Ashraf Ghani) ने देश छोड़ दिया है लेकिन लाखों मासूमों, बच्चों एवं बुजुर्गों को जान-माल का खतरा बना हुआ है क्योंकि तालिबानी अपनी नृशंसता और कट्टरता के लिए जाने जाते हैं। वहां लोकतंत्र को लौटाने में सभी का सहयोग तो हो ही, खासकर भारत को इस मामले में आगे बढ़कर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

भारत का अफगान समस्या से क्या रिश्ता है | How is India related to the Afghan problem?

इस मसले पर विचार करते समय कुछ बातों पर गौर करना होगा ताकि इस बात की ज़रूरत स्पष्ट हो सके कि आखिर भारत का इस समस्या से क्या रिश्ता है और वहां लोकतंत्र की बहाली हमारे देश के लिए क्यों जरूरी है।

पहली बात तो यह है कि अफगानिस्तान से भारत के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। वहां बौद्ध धर्म की मौजूदगी और उसका लम्बे समय तक प्रभाव रहा है। अविभाजित भारत के समय वह हमारा प्रत्यक्ष पड़ोसी रहा है। आज भी वहां के लोगों एवं भारतीय नागरिकों के बीच निजी, सामूहिक, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संबंध हैं। भारत का वहां बड़ा निवेश है जिसके चलते भी हमारी अफगानिस्तान को लेकर चिंता करना जायज होगा।

मोदी के नेतृत्व में आंतरिक और बाह्य दोनों ही स्तरों पर भारत की साख गिरी है

अब भी भारत सार्क देशों में सबसे बड़े भाई की तरह ही देखा जाता है, बावजूद इसके कि उसने हाल के वर्षों में अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति का स्वयं ही परित्याग कर दिया है। अब वह सत्ताधीशों की शस्त्रीकरण की लालसा और चंद उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लालच में बड़े देशों का पिछलग्गू बन गया है।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की साख आंतरिक और बाह्य दोनों ही स्तरों पर गिरी है। इसके बावजूद उसके पड़ोस में हो रहे इस तरह के घटनाक्रम और ऐसे मामलों में जहां उसके हितों एवं लोकतंत्र को समग्र रूप से खतरा हो, उसकी नैतिक दखलंदाजी वांछनीय व अपेक्षित है। इतना ही नहीं, इस समय तो वह संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष भी है। ऐसे में उसे अपने रूतबे का इस्तेमाल करना होगा। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के प्रति उसका यह उत्तरदायित्व भी है।

वैसे भी हाल के वर्षों में मोदी की अगुवाई में विश्व का नेतृत्व करने की हसरत और अपेक्षाएं भारत के लोगों में हिलोरें मार रही हैं। विश्वगुरु के तौर पर हो या सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अथवा बतौर उभरती वैश्विक शक्ति के, प्रधानमंत्री को चाहिये कि वे इस मामले में सक्रिय भूमिका निभायें।

भारत हमेशा से पीड़ितों के लिए सहायता का हाथ बढ़ाता रहा है

दुनिया में जहां कहीं भी मानवता खतरे में पड़ी हो, भारत हमेशा से अपनी आवाज बुलंद करता रहा है तथा पीड़ितों के लिए सहायता का हाथ बढ़ाता रहा है। फिर, लोकतंत्र का हिमायती होने के नाते यह उसका वैश्विक कर्तव्य भी है। इस परम्परा का निर्वाह भारत को करना ही चाहिये।

भारत सहित विश्व समुदाय को चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि इस बात की आशंका है कि सत्ता पर पूरी तरह से काबिज होने के बाद तालिबानी निर्दोषों, कमजोरों, महिलाओं, बच्चों पर कहर ढा सकते हैं। उनका रिकार्ड इस मामले में बेहद खराब है। तालिबान अपने महिला एवं शिक्षा विरोधी विचारों के लिए जाना जाता है। औरतों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे और आधुनिक तालीम देने वाले स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया जायेगा। छोटे बच्चों और किशोरों को तालिबानी और जेहादी बनाये जाने की रुक चुकी परम्परा फिर से प्रारम्भ हो सकती है।

सच तो यह है कि उस देश में लोकतंत्र के साथ समग्र मानवीयता एवं मानवाधिकार भीषण खतरे में हैं। अमेरिकी हस्तक्षेप और उसकी सेना की मदद से अफगानिस्तान में तालिबानी पिछले कुछ समय से ठंडे पड़े हुए थे, पर अब उनकी वापसी पहले के मुकाबले अधिक घातक व संहारक हो सकती है। इसी आशंका के चलते वहां से लोगों का पलायन प्रारंभ हो चुका है।

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका क्या होगी ? | What will be India’s role in Afghanistan?

सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा कर पायेगा या मूकदर्शक की तरह वह इस घटनाक्रम को देखता रहेगा? इस संदेह का कारण यह है कि भारतीय नेतृत्व का अंतरराष्ट्रीय पटल पर कूटनीटिक दबदबा कम हुआ है, क्योंकि वह स्वयं आंतरिक तौर पर तालिबानी प्रवृत्तियों के पोषक संस्थान के रूप में उभरा है। देश में भी एक तरह से आधुनिकता, वैज्ञानिकता, समानता, बंधुत्व के सिद्धांतों को निरुत्साहित किया जा रहा है।

दुर्भाग्य से भारत में कट्टरपंथ बढ़ रहा है | Unfortunately radicalization is on the rise in India

तालिबान चाहे एक संगठन हो लेकिन अब वह एक प्रवृत्ति और मुहावरे के रूप में भी स्थापित हो चुका है। जिन देशों में यह कट्टरपंथ उभर रहा है, उनमें दुर्भाग्य से भारत का नाम भी काफी ऊपर है। ऐसे में देखना होगा कि भारत अफगानी संकट पर कुछ बोलने या हस्तक्षेप करने का नैतिक साहस जुटा पाता है या नहीं। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि नये नागरिकता कानूनों के चलते वह किस मुंह से शरणार्थियों को शरण देने की अपील अन्य देशों से कर सकेगा? अगर वह यह सब नहीं कर सकता तो उसे कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप व सार्क देशों की अगुवाई और दुनिया की रहनुमाई करने का ख्वाब छोड़ देना चाहिए। 

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

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