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ज्ञान की देवी का अपमान :लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में

ज्ञान की देवी का अपमान : राहत, नवाज़ और मार्टिन के सबक

ज्ञान की देवी का अपमान : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने बागपत के बड़ौत में सौ साल से भी पुराने दिगंबर जैन कॉलेज में स्थापित श्रुत देवी की प्रतिमा हटाकर सरस्वती की प्रतिमा लगाने के लिए जमकर हंगामा किया। वे जूते-चप्पल पहने हुए ही श्रुत देवी की मूर्ति पर चढ़ गए।

राहत इंदौरी के मशहूर शेर की पंक्तियां हैं – ‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां सिर्फ मेरा मकान थोड़ी है’। इसी बात को दूसरे मशहूर शायर नवाज देवबंदी इस तरह से कहते हैं कि ‘उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया, मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है’। यही बात कई दशकों पहले जर्मनी में हिटलर के अत्याचारी शासन के ख़िलाफ़ पास्टर मार्टिन निमोलर (Friedrich Gustav Emil Martin Niemöller i.e. pastor Martin Niemöller) कह चुके हैं- ‘पहले वे समाजवादियों के लिए आए, लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था। आगे वे इसी तरह कम्युनिस्टों, मजदूर संगठनों और यहूदियों का जिक्र करते हैं और फिर कहते हैं कि ‘आखिर में वे मेरे लिए आए लेकिन तब कोई बोलने वाला नहीं बचा था’।

दुर्भाग्य से आज के भारत में हम ये तीनों कथन सच होते हुए देख रहे हैं। जब दलितों- आदिवासियों पर हमले होते हैं, तब हममें से अधिकांश चुप रहते हैं। जब अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जाता है, तब भी बोलने वाले कम होते हैं। जब बलात्कारियों के समर्थन में जुलूस निकाले जाते हैं, तो विरोध में आवाज कम ही उठती हैं। किसी विचारधारा से असहमति रखने या उसकी आलोचना करने वालों की हत्या कर दी जाती है, तब भी ज़्यादातर लोगों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। प्रवासी मज़दूर घर वापस जाने के लिए मीलों पैदल चलने को मजबूर होते हैं, तो उनके लिए आंसू कम ही आंखों में आते हैं। कड़ाके की ठण्ड में लाखों किसान खुले आसमान के नीचे रात बिता रहे हैं और हम चैन की नींद सो रहे हैं।

Raiders are being encouraged by public apathy

दरअसल, इस तरह की बातों को न्यू इंडिया का न्यू नॉर्मल बना दिया गया है और जनता ने भी इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया है। उसे शायद यह अहसास ही नहीं है कि उसकी उदासीनता से हमलावरों के हौसले बढ़ रहे हैं और इसका ख़ामियाजा एक न एक दिन उसे भी भुगतना पड़ेगा। राहत इंदौरी, नवाज देवबंदी और मार्टिन निमोलर की चेतावनियों को अनसुना करने का नतीजा ये है कि नफ़रत की आग उन लोगों तक पहुंच चुकी है जो अब तक उसकी अनदेखी कर रहे थे। खून के प्यासे खंजर उन जिस्मों तक आ गए हैं जो अपने आपको महफ़ूज़ समझ रहे थे। एक खास किस्म की सोच अब उन लोगों पर भी हावी होने की कोशिश कर रही है जो उसे परवान चढ़ाते आ रहे हैं।

Insult to the Goddess of Knowledge

कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह भारत जैसे विविधवर्णी महादेश को एक ही रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है। हाल ही में फ़रीदाबाद और मिर्ज़ापुर में सरकारी अस्पतालों के नाम बदलने की घटनाओं से हमारे कथन की पुष्टि हुई है। अब बागपत के बड़ौत में हुई घटना तो शक की कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ती। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने यहां सौ साल से भी पुराने दिगंबर जैन कॉलेज में स्थापित श्रुत देवी की प्रतिमा हटाकर सरस्वती की प्रतिमा लगाने के लिए जमकर हंगामा किया। वे जूते-चप्पल पहने हुए ही श्रुत देवी की मूर्ति पर चढ़ गए। इस घटना को लेकर बागपत के जैन समाज ने तत्काल बैठक की और प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।

कॉलेज प्रशासन ने 2016 में संभवत: शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में यह मूर्ति लगवाई थी। उस समय भी छात्रों ने मां सरस्वती की मूर्ति के सिर पर जैन तीर्थंकर को दर्शाने का विरोध किया था तो मूर्ति को ढंककर रख दिया गया था। पिछले मंगलवार मूर्ति को अनावृत किए जाने की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता कॉलेज पहुंचे और प्रवेश द्वार पर ताला लगाकर धरने पर बैठ गए। उनके मुताबिक सरस्वती की मूर्ति पर अलग तरह की पहचान बनाया जाना ज्ञान की देवी का अपमान है। इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इन कार्यकर्ताओं ने कॉलेज के कर्मचारियों और पुलिस के साथ अभद्रता की और प्रबंधन को आंदोलन की चेतावनी भी दी।

In Jainism, Shrut Devi is the goddess of learning and knowledge, just like Saraswati for Hindus

जैन समाज का कहना है कि उनके धर्म में श्रुत देवी विद्या और ज्ञान की देवी है, बिलकुल वैसे ही जैसे हिन्दुओं के लिए सरस्वती। उनके प्रत्येक तीर्थंकर के साथ जिनशासन देवियां और देवता भी विराजमान होते हैं। देश भर में ऐसी अनेक मूर्तियां स्थापित हैं, लेकिन इन्हें लेकर पहले कभी विवाद नहीं हुआ। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि मूर्ति की स्थापना के समय ही जब हंगामा हुआ था, तब कॉलेज प्रबंधन ने ऐहतियाती कदम क्यों नहीं उठाए। गौरतलब है कि जैन समाज अब अल्पसंख्यक समुदाय में शुमार होता है, हालांकि व्यापक तौर पर इस समुदाय के लोग – चाहे दिगम्बर हों या श्वेताम्बर, संघ-भाजपा की विचारधारा का समर्थन करते हैं और अब उनका ही एक संस्थान उस विचारधारा के हमले का शिकार हो गया।

हंगामा करने वाले एबीवीपी कार्यकर्ता अपनी पार्टी को हासिल जैन समाज का समर्थन भूल गए। उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि अभी दो साल पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैन समाज के सबसे बड़े गुरु आचार्य विद्यासागर का आशीर्वाद लेने के लिए ख़ास तौर पर इंदौर आए थे। भाजपा शासन के दौरान ही आचार्य जी को मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रवचन के लिए आमंत्रित किया जा चुका है। जैन समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले अनेक राजनेता अलग-अलग राज्यों की भाजपा सरकारों में मंत्री रह चुके हैं और अभी भी हैं। इसी समाज के वीरेंद्र कुमार सकलेचा और सुंदरलाल पटवा मध्यप्रदेश की भाजपा सरकारों के मुखिया रह चुके हैं।

हमने इसी जगह यह भी लिखा था कि संघ-भाजपा के लोगों को देश के इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है, उलटे वे उसे मिटाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। मिज़ार्पुर और बागपत की घटनाओं के बाद अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि विद्यार्थी परिषद का ज्ञान और शीलसे भी कोई वास्ता नहीं है, उसके प्रतीक चिन्ह में ये शब्द दिखावे भर को रह गए हैं। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अपने सहोदर बजरंग दल की तरह वह भी अराजक हो चुकी है। ‘संघ’ अपने जिस अनुशासन का गुणगान करता है वह उसके घटकों के भीतर तक ही सीमित है। हंगामा, मारपीट और तोड़फोड़ जैसे कारनामों से उनकी छवि कैसी बन गई है, इस बात की चिंता शायद उसे नहीं है।

बाग़पत की घटना के लिए विद्यार्थी परिषद ने फ़िलहाल माफी मांग ली है और भविष्य में इसे न दोहराने का आश्वासन दिया है। जैन समाज और संघ परिवार के लिए ये राहत की बात हो सकती है। लेकिन ऐसी घटनाओं की अनदेखी बिलकुल नहीं की जानी चाहिए न ही इन्हें भुला दिया जाना चाहिए। हम भले ही धर्म और जाति के खांचों में बंटे हुए हों लेकिन इन घटनाओं को हमें एक सबक के तौर पर याद रखने की जरूरत है। प्रताड़ना, दमन या शोषण किसी भी तबके का हो, उससे बेपरवाह नहीं रहा जा सकता। जो लोग यह मानते हैं कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा, वे एक बार राहत इंदौरी, नवाज देवबंदी या मार्टिन निमोलर को जरूर पढ़ लें।

•पलाश सुरजन

(लेखक देशबन्धु के संपादक हैं)

देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित अंश साभार

पलाश सुरजन, लेखक देशबन्धु के संपादक हैं

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