शरणार्थी कैम्प में हम लाशों के बीच जिन्दा भूत बन गए थे : 88 साल के विजय सरकार की आपबीती

Interview- Vijay Sarkar, A partition victim's tragedy

साक्षात्कार- विजय सरकार | एक विभाजन पीड़ित की आपबीती | Interview- Vijay Sarkar | A partition victim’s tragedy in Hindi

‘‘रोटी क्या होती है? आटा किसे कहते हैं? कैसा होता है आटा? रोटी बनती कैसे है? आटा गूँथना तक नहीं आता था, हम लोगों को। 1947 के विभाजन के बाद अस्थाई कैम्पों में रहते हुए रोटी का दीदार हुआ। तब मेरी उम्र उन्नीस साल रही होगी। इससे पहले मैं और मेरा परिवार आटा और रोटी से अपरिचित थे। पहले-पहल जब कैम्प में खाने के लिए आटा दिया गया, तो लोगों ने आटे में पानी, ढेहली वाला नमक और हरी मिर्च डाल कर उबाल दिया। लेई की तरह लुगदी बन गयी। मुँह में डाला तो न निगलते बना, न ही उगलते। कुछ लोगों ने नमक, पानी डालकर कच्चा ही घोल बनाकर पी लिया।

बहुतों के पेट चल निकले। उल्टी-दस्त शुरू हो गई। दोबारा जब आटा मिला तो शरणार्थियों ने लेने से मना कर दिया। तब कैम्प के कर्मचारियों ने रोटी बनाने की विधि बताई। आटा ले तो लिया, लेकिन हम लोग रोटी खाने के आदी नहीं थे। जुबान पर रोटी का स्वाद था ही नहीं। चावल के अलावा किसी चीज से पेट भरता नहीं था। कैम्प में आटा मिलने पर अक्सर कई परिवार आटा एक जगह करके दूर बाजार में दुकानदार को दे आते थे। बदले में चावल ले आते थे। खान-पान के बदलाव में ढलने में भी बंगाली शरणार्थियों को अच्छा-खासा वक्त लगा।’’

यह आप बीती है 88 साल के विजय सरकार की। वर्तमान में वे दिनेशपुर के वार्ड न. 6 में रहते हैं। इन्होंने विभाजन की पीड़ा और पूर्वी पाकिस्तान से पलायन के दर्द (Pain of partition and pain of migration from East Pakistan) को झेला है।

1932 में खुलना जनपद के थाना पाइकगाछा क्षेत्र के अन्तर्गत कासिमनगर गाँव में विजय सरकार का जन्म हुआ। गाँव में बाह्मणों व कायस्थों की अलग बस्ती थी और नमोःशूद्रों, पौण्ड क्षत्रियों की बस्ती अलग। खुलना जनपद तीन तरफ से नदियों से घिरा क्षेत्र है। खुलना और बरिशाल के दक्षिण में सुन्दरवन और बंगाल की खाड़ी है। पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24 परगना की तरह।

विजय सरकार बताते हैं,

‘‘भारत की आजादी की लड़ाई का ज्यादा असर खुलना जनपद के गाम्रीण क्षेत्र में नहीं था। गाँव की चौपाल में  बैठकर कभी-कभी स्वतंत्रता आन्दोलन की चर्चा जरूर होती थी। लेकिन गाँव के लोगों की कोई सीधी भागीदारी आन्दोलन में नहीं थी। गाँव की प्राथमिक पाठशाला में पढ़ते, नूनदाड़ी(खो-खो), डुग-डुग (कबड्डी) खेलते-खेलते हम बढ़ रहे थे। लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं। खेत की जमीन दलदली थी। समुद्र के असर में ज्वार-भाटा की तरह पानी चढ़ता-उतरता रहता था। धान के अलावा कुछ पैदा नहीं होता था। माछ-भात ही हमारा प्रिय और सर्वसुलभ भोजन था।

1947 में भारत आजाद हो गया है, अंग्रेज भारत से जा रहे हैं और भारत-पाकिस्तान दो हिस्सों में देश बँट गया है, यह जानकारी शहर से आये मातब्बर (नेता) ने गाँव के लोगों को दी।

मातब्बर ने बताया कि ’’खुलना डिस्टिक पाकिस्तान में रहेगा और यहाँ मुसलमानों का राज होगा।’’

गौरतलब है कि हिन्दू बहुल खुलना के लोगों को भारत में बने रहने की उम्मीद थी और 15 अगस्त 1947 को वहाँ तिरंगा भी फहराया गया था, लेकिन झंडे को उसी दिन उतार दिया गया। चर्चा चहुँ दिशा गरम थी। आशंका भी परवान चढ़ रहीं थीं। रात में बाबा (पिता) खाना खाते हुए माँ को बता रहे थे,

‘‘अब हम लोग यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पायेंगे। पीछे के गाँव में दंगे शुरू हो गए हैं। मुसलमान हिन्दुओं की सम्पत्ति हथिया रहे हैं। अत्याचार कर रहे हैं। हमें अपना देश छोड़कर भारत जाना होगा।’’

घर के साथ-साथ पूरे गाँव में तनाव था। हर कोई हैरान-परेशान था। आगे के गाँव से पलायन शुरू हो गया था। जिन इलाकों में मुसलमान बहुतायत में थे, वहाँ से लोग रातों-रात बॉर्डर की तरफ बढ़ रहे थे। कुछ दिन उहापोह में बीते, फिर एक दिन बाबा और माँ ने हम तीनों भाइयों को लेकर गाँव छोड़ दिया। काका (चाचा) व जेठा (ताऊ) का परिवार भी हमारे साथ था। कार्तिक माह की कोई तारीख रही होगी। बरसात खत्म हो चुकी थी और मौसम में कुछ ठंडक बढ़ने लगी थी।

बाबा बड़ी सी टोकरी में कुछ कपड़े और खाने का सामान लिये हुए थे। माँ भी कुछ जरूरी सामान और जमा पूँजी साथ में लिए हुई थी। मैं बड़ा था। छोटा भाई मेरी गोद में और मझला भाई मेरी कमीज पकड़कर पैदल चल रहा था। कितनी दूर जाना है? कहाँ तक चलना है? इसका कोई अनुमान नहीं था। सैकड़ों परिवार बॉर्डर की ओर बढ़ रहे थे। ऐसा नहीं कि 1947 के तुरंत बाद भगदड़ मच गयी थी। तकरीबन दो साल तक पूर्वी पाकिस्तान में ही बसे रहने की जद्दोजहद चलती रही। अन्ततः खुलना जनपद छोड़ना ही पड़ा।

कोपताक्ष नदी तक पैदल ही पहुँचे। वहाँ से नाव द्वारा इछामती नदी पार करके हासनाबाद बॉर्डर पहुँचे। उस समय बॉर्डर ओपन थे। 1952 से पहले भारत-पाकिस्तान के बीच पासपोर्ट, बीजा का चलन नहीं था। पूर्वी और पश्चिम पाकिस्तान से लोग बिना किसी वैध दस्तावेज के आये। इसी तरह भारत से पाकिस्तान गए। मुहाजिरों के पास भी कोई वैध दस्तावेज नहीं था। हिन्दू महासभा के स्वयं सेवक और कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता बॉर्डर पर हिन्दू बंगालियों का स्वागत कर रहे थे। हमारा परिवार सात दिन हासनाबाद बॉर्डर के अस्थाई शरणार्थी शिविर में रहा। परिवार के सभी सदस्यों के नाम एक कार्ड पर लिखकर रिफ्यूजी कार्ड जारी किया गया। एक परिवार का एक ही कार्ड बनाया जा रहा था। पुनर्वास विभाग के अधिकारी मोहर लगाकर अपने हस्ताक्षर करके रिफ्यूजी कार्ड जारी कर रहे थे। शुरूआती सात दिन गुड़ और च्युड़ा खाकर गुजारे।

सरकारी ट्रक में भरकर हमारे साथ तमाम शरणार्थियों को उल्टोडांगा (विधाननगर) पहुँचाया गया। यहाँ तीन दिन रखने के बाद हमें श्याम बाजार (तिमला) के कैम्प में शिफ्ट किया गया। यह कैम्प दरअसल पाट (जूट) का गोदाम था। यह भूतों की हवेली से कम नहीं था। गोदाम तीन मंजिला था। संभवतः दूसरे विश्व युद्ध में जब अंग्रेजी फौज पश्चिम बंगाल में थी, तब यह शेड सैनिकों के रुकने का अड्डा रहा हो।

दस-बारह लोगों की जगह वाले कमरे में 50-60 शरणार्थियों को ठूंस दिया गया। वो दौर बहुत भयावह था। कैम्प में हैज़ा फैल गया। रोज 40-50 लोग मर रहे थे। जितने मरते थे, उससे ज्यादा हर रोज नये शरणार्थी कैम्प में आ जाते थे। न दवा की व्यवस्था, न डॉक्टर। संक्रामित रोगों से बचाव के लिए कोई परहेज कैम्प में नहीं था। खाने-पीने की व्यवस्था भी सुचारु नहीं थी। महिला-पुरूष के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं थी। खुले में शौच करके पानी डालकर लकड़ी के फाबड़े से मल को नाले में धकेला जाता था। जैसे गाय-भैंस की गोशाला में होता है।

पूरे दिन-रात मृतकों के परिजनों का रुदन अन्दर तक झकझोर देता था। दिन में एक बार सत्कार समिति (अन्तिम संस्कार समिति) के स्वयं सेवक लाशों को लेने आते थे। ट्रक में कबाड़ की तरह लाशें भर दी जाती थीं। परिजनों को अन्तिम संस्कार करने तक का मौका नहीं मिलता था। कैम्प में लोगों का खाना-पीना, हगना-मूतना, रोना-चिल्लाना सब एक साथ होता था। बच्चों को जानवर उठा ले जाते थे। ऐसा लगता था कि हम मरघट में हैं और लाशों के बीच जिन्दा भूत बन गए हैं। डायरिया, चैचक का प्रकोप भी लोगों की जान ले रहा था। यहाँ हमें छः माह से ज्यादा रहना पड़ा। पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा शरणार्थी कैम्प रानाघाट में था। यहीं से शरणार्थियों को देश के अन्य राज्यों में भेजा जाता था।

1950 में माह तो याद नहीं, लेकिन गर्मी थी। हमें कोयला से चलने वाली रेलगाड़ी से रानाघाट लाया गया। यह काफी विशाल कैम्प था। तकरीबन पाँच से सात हजार लोग एक साथ रहते थे। यहाँ पहुँचने के बाद सात-आठ माह बाद दूसरे राज्य में जाने का नम्बर आता था। प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को पुनर्वास के लिए भेजा जाता था। जितने लोग जाते थे, उतने ही नये आ जाते थे। यहाँ दाल-भात सरकार द्वारा मिलता था, लेकिन और कोई सुविधा नहीं थी। मेडिकल के नाम पर चंद दवाएं जरूर थीं, लेकिन संक्रमण के बाद बहुतायत में मरते लोगों के हिसाब से कोई इंतजाम नहीं थे। रानाघाट से शरणार्थी शहर व ग्रामीण क्षेत्र के स्थानीय लोगों के यहाँ, बाजार व अन्य जगह मजदूरी करने चले जाते थे। इस तरह अपने परिवार की अन्य जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करते थे।

उड़ीसा के चरबेटिया कैम्प या फिर नैनीताल की तराई (रुद्रपुर) भेजने को लेकर एक दिन कैम्प में चर्चा हो रही थी। मैं सुन रहा था। कुछ बोले,

‘‘नैनीताल तो पहाड़ी इलाका है। पत्थर और चट्टान वाला क्षेत्र है। जंगल ही जंगल हैं वहाँ। जमीन भी दलदली है। बाघ हैं। वहाँ हम लोग नहीं रह पायेंगे।’’

कुछ बोले,

‘‘उड़ीसा की पृष्ठभूमि हमारी मूल देश से मिलती-जुलती है। वहाँ का वातावरण हमारे हिसाब का है। उड़ीसा चलना ही उचित रहेगा।’’

भीड़ में किसी ने कहा,

‘‘एक हजार लोग नैनीताल भेजे जायेंगे और एक हजार उड़ीसा।’’

मुझे नैनीताल आने का मन था। मन ही मन सोचा,

‘‘एक हजार लोग, उनके दो हजार हाथ, जमीन कैसी भी हो, खेती के योग्य बना ली जाएगी।’’

ठंडी जगह देखने का मन तो था ही, खैर! मैं सुनता रहा।

इस बीच बहुत से लोग ट्रांजिट कैम्पों से परेशान होकर अपने देश वापस भी लौट रहे थे। हमारे काका भी रानाघाट से अपने परिवार को लेकर खुलना वापस चले गए थे।

जेठा कविराज (बैद्य) का काम जानते थे। रानाघाट में एक जमींदार की लड़की को साँप ने काट लिया। जेठा उनके खेत में मजदूरी करते थे। उन्होंने उसका इलाज किया और लड़की ठीक हो गयी।

जमींदार ने जेठा को अपने पास ही रहने के लिए जगह दे दी। वो वहीं रुक गए। अन्ततः हमारा परिवार उड़ीसा के चरबेटिया कैम्प पहुँच गया।

इस तरह जो परिवार खुलना में एक साथ रहता था, वो अब तीन जगह बंट गया। परिवार फिर कभी एक दूसरे से नहीं मिल पाया। यह कष्ट आज भी नासूर बना हुआ है।

बाबा बहुत बीमार पड़ गए थे। उनका शरीर लकड़ी की तरह दुबला हो गया था। मैं अब मजदूरी करने लगा था। परिवार को पालने के लिए मैंने जी तोड़ मेहनत करनी शुरू कर दी। कैम्प में जहाँ जगह दी गयी, वहाँ झोपड़ी बांध कर हम लोग रहने लगे थे। कई महीने बीत गए। अब लगता था कि यहीं स्थाई बसेरा होगा।

लेकिन इसी बीच नेहरू मंत्री मण्डल में भारत सरकार के मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी चरबेटिया के शरणार्थी कैम्प में आये। गर्मी बहुत थी।

मुखर्जी शरणार्थियों से बात कर रहे थे। मैं हाथ वाला पंखा डुला रहा था। उन्होंने बहुत देर बाद मुझसे कहा,

‘‘तुम्हारे बाबा कहाँ हैं? उन्हें बुला लाओ। तुम लोग नैनीताल चले जाओ, वहाँ आठ एकड़ जमीन, एक जोड़ा बैल, खेती के औजार और जरूरी सामान सरकार दे रही है। यहाँ से अच्छा होगा नैनीताल जाना।’’

गौरतलब है कि मुखर्जी और बंगाल के दूसरे नेता बंगाल से बाहर फिर शरणार्थियों के बीच नहीं पहुँचे।

हमारे साथ 27 और परिवार नैनीताल आने के लिए तैयार हुए। कुछ माह बाद ट्रेन से हम नैनीताल के किच्छा रेलवे स्टेशन पहुँचे। स्टेशन से कुछ दूर ही गोला नदी थी। वहाँ मछली देखकर बहुत कुछ अपना जैसा लगने लगा। 1952 में मोहनपुर न.1 में अस्थाई शरणार्थी कैम्प पहुँचे। यहाँ जिला पुनर्वास अधिकारी ए. के. मुखर्जी ने 27 परिवारों को बंगाली विस्थापितों की नयी बसी 36 कॉलोनियों में अलग-अलग भेज दिया। मानू मण्डल, बिहारी सरकार, वीरेन्द्रनाथ राय, कृष्णपद राय, और मेरे बाबा विश्वनाथ सरकार को दिनेशपुर गाँव में जमीन आवंटित की। तब दिनेशपुर का मौजूदा बाजार चंदायन के नाम से जाना जाता था। यहाँ बुक्सा जनजाति के लोग रहते थे। विस्थापित बंगालियों के आने के बाद बुक्सा परिवार और भीतर जंगल की ओर (आज के चंदायन गाँव में) चले गए।

Rupesh Kumar Singh Dineshpur
Rupesh Kumar Singh Dineshpur रूपेश कुमार सिंह
समाजोत्थान संस्थान
दिनेशपुर, ऊधम सिंह नगर

1954 में जमीन का चक मिला। पहली बार जोत तैयार करने में सरकार ने मदद की, लेकिन उसके बाद जो भी कुछ किया लोगों ने खुद मर खप के किया। जोत तैयार करने और सरकार की वादा खिलाफी के लिए आन्दोलन भी हुए, लेकिन सरकार ने शरणार्थियों पर कोई ध्यान नहीं दिया।

विजय सरकार बताते हैं कि 1960 में उनकी शादी हुई। बारात कई कोस दूर लक्खीपुर गाँव पैदल गयी। बहु को बहनोई और अन्य लोग गोद में उठाकर लाये।

विजय सरकार के दो पुत्र हैं। बड़े पुत्र डॉ. जे.एन. सरकार कांग्रेस के बड़े नेता हैं।

रूपेश कुमार सिंह

स्वतंत्र पत्रकार

दिनेशपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड

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