मैं बांग्ला भाषा बोलता हूँ, इसलिए बंगाली हूँ : विवेकानन्द विश्वास

Vivekananda Vishwas

साक्षात्कार – विवेकानन्द विश्वास | Interview – Vivekananda Vishwas

पूर्वी पाकिस्तान के खुलना, बरिशाल, फरीदपुर और जैसोर जनपदों से आने वाले हिन्दू बंगाली शरणार्थियों (Hindu Bengali Refugees) ने आखिर तक अपने देश में ही बसे रहने की कोशिश की। हालात सुधर जायेंगे, हिन्दू-मुसलमान दंगे रुक जायेंगे, इस उम्मीद में लाखों बंगाली 1947 से 1964 तक पूर्वी पाकिस्तान में अपने-अपने गाँव में संघर्ष करते रहे। जिन्दगी से जूझते रहे। मुसलमानों और पाकिस्तानी सरकार का अत्याचार सहन करते रहे और मरते-खपते रहे। बावजूद इसके ज्यादातर लोगों ने अपनी माटी (जमीन) नहीं छोड़ी। 1964 में हज़रतबल (कश्मीर) काण्ड के बाद हालात बेकाबू हो गये। साम्प्रदायिकता की चिंगारी ने पूर्वी पाकिस्तान को जलाकर रख दिया। जितने लोग 1947 से 1963 तक शरणार्थी बनकर भारत नहीं आये थे, उससे चार गुना ज्यादा लोग 1964 से 1971 तक रिफ्यूजी बने।

इस अवधि में आने वाले शरणार्थियों को डेढ़ दशक तक पुनर्वास नहीं मिला। पहले  आये लोगों के मुताबिक न तो जमीन मिली और न ही सम्मान।

बंगाली शरणार्थी खुद दाउट (अलाटी) विदाउट (भूमिहीन) की खेमेबंदी में बँट गये। एक जगह से, समान परेशानी लेकर अपनी मातृभूमि छोड़ने वाले बंगाली शरणार्थी भारत में आकर दो फाड़ हो गये। एक-दूसरे को हीनता से देखने लगे। आलम यह है कि दोनों खेमों में बँटे बंगाली शरणार्थियों के बीच का तनाव और मनभेद आज तक दूर नहीं हो पाया है।

25 मार्च, 1971 को बांग्ला देश की आजादी के बाद भी हजारों बंगाली शरणार्थी छुप-छुपा कर, बॉर्डर पर कँटीले तारों के नीचे से भारत में आते रहे। उन्होंने देश के तमाम राज्यों में अपने परिचितों को खोजकर रहने का ढिया बना लिया। वोटर भी बन गये और राशन कार्ड भी पा गये। लेकिन सरकारी नजरिये से ये सभी घुसपैठिया ही माने जाते रहे हैं। अलबत्ता सरकारी कार्यवाही तो नहीं हुई, लेकिन इनके साथ सभी बंगाली शरणार्थी शक के दायरे में बने हुए हैं और अनिश्चितता का जीवन जी रहे हैं।

1940 में खुलना जनपद की बागेरहाट तहसील के रामपाल थाना के अन्तर्गत ग्राम हुड़का में सुरेन्द्र नाथ विश्वास के घर पर विवेकानन्द विश्वास का जन्म हुआ था। परिवार सामाजिक आन्दोलन से जुड़ा था। इनके दादा जी नीलाम्बर विश्वास और उनके भाई रमनीकान्त विश्वास मतुआ संत थे। मनुवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए दलितों के हकहकूक के लिए आन्दोलित थे। परिवार पूर्वी पाकिस्तान छोड़ने को कतई तैयार नहीं था। लेकिन 1964 की घटना के बाद विवेक विश्वास अपनी पत्नी और तीन माह की बेटी बुला के साथ भारत आ गये, लेकिन शेष परिवार वहीं रहा। यहाँ आकर विवेक विश्वास शरणार्थी नेता पुलिन विश्वास के साथ मिलकर सही सेटलमेंट और रिफ्यूजी समाज को न्याय और सम्मान दिलाने के लिए आन्दोलन से जुड़ गये। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें सबसे बाद में 1981 में ट्राँजिट कैम्प में तीन एकड़ जमीन पर तीस साल का पट्टा मिला। इनकी आपबीती बाकी शरणार्थियों से जुदा है।

इस साक्षात्कार में हम उनके जीवन संघर्ष से 1964 के बाद आने वाले बंगाली शरणार्थियों की पीड़ा को समझने की कोशिश करेंगे।

विवेक विश्वास बताते हैं,

‘‘गाँवों में भारत की आजादी के स्वदेशी आन्दोलन का तो जोर नहीं था, लेकिन मनुवाद के खिलाफ मतुआ आन्दोलन चरम पर था। मतुआ मिशन से लोगों को जोड़ने के लिए घर पर अक्सर बैठकें होती थीं। जमीन जोतने वाले की, भूमि सुधार लागू हो, जमींदारी प्रभा का अन्त हो, मानव-मानव एक समान जैसे नारों के बीच जीवन साल दर साल बढ़ रहा था। दलितों की मुक्ति और समानता के लिए गुरूचाँद ठाकुर द्वारा संचालित ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डी हिन्दुत्व के खिलाफ आन्दोलन में जन उभार था। अस्पृश्यता के खिलाफ चंडाल आन्दोलन का इतिहास भी हम सुनते थे। चंडाल आन्दोलन के बाद बंगाल में 1911 में अस्पृश्यता निषेध कानून लागू हुआ था, देश में सबसे पहले। इसके संचालक भी गुरूचाँद ठाकुर थे। पूर्वी पाकिस्तान के ब्राह्मण लोग इसके खिलाफ थे। जबकि बांग्लाभाषी मुसलमान मतुआ मिशन के साथ थे। ईसाई और आदिवासी भी समर्थन में थे। तब गाँवों में पंडितों का वर्चस्व था। जमींदार भी ब्राह्मण और कायस्थ थे। खेत जोतने वाले दलित और मुसलमान। लोगों के बीच उनका खौफ भी था। पंड़ितों की शह पर गाँव के संपन्न मातब्बरों ने दादा जी को एकघरे (गाँव-समाज से बहिष्कृत) कर दिया।’’

एक दिन पता चला कि हिन्दुस्तान आजाद हो गया है। अंग्रेज देश से जा रहे हैं। लेकिन मुल्क भारत-पाकिस्तान दो भाग में बँट गया है। भारत में हिन्दू रहेंगे और पाकिस्तान में मुसलमान। गाँव की चैपाल में चर्चा आम थी, ‘‘अब पूर्वी पाकिस्तान में रह पाना मुश्किल होगा। यहाँ मुसलमानों का राज होगा। जल्दी ही हमें देश छोड़कर हिन्दुस्तान जाना होगा।’’

बच्चों और महिलाओं का चैपाल में बैठना प्रतिबंधित था। बड़ों से सवाल पूछने को भी बेअदबी माना जाता था। फिर भी शाम को मैंने बाबा (पिता) से पूछा, ‘‘बाबा, क्या हम लोग इस गाँव में नहीं रहेंगे? हम लोग कहाँ जायेंगे? सब लोग कह रहे हैं कि मुसलमान बंगालियों को मार देंगे?’’

बाबा ने जवाब दिया,

‘‘कोई अपनी जमीन ऐसे ही थोड़े छोड़ता है! यह हमारा देश है। हमारा जय बांग्ला है। हम बंगाली यहीं रहेंगे, जैसे पहले रहते थे, बंगाली-मुसलमान साथ-साथ।’’

आस-पास, दूर-दराज के गाँवों और शहरों से अप्रिय घटनाएं सुनने को अक्सर मिलती थीं। दिल दहल सा जाता था। घर और गाँव में लोग भयभीत होकर जी रहे थे। बंगाली पूर्वी पाकिस्तान छोड़कर भारत जा रहे हैं, यह समाचार भी मिलता था। हमारे गाँव में 1956 से पहले पलायन नहीं हुआ। हालांकि हालात लगातार बिगड़ रहे थे। विवेक विश्वास बताते हैं,

‘‘जोगेन्द्र मण्डल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे। वहाँ का संविधान बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। वे पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दू बंगाली बहुल क्षेत्र को लेकर अलग प्रान्त (होमलैण्ड) बनाने के पक्षधर थे। इस वजह से वे लम्बे समय तक बंगालियों से पलायन न करने का आग्रह करते रहे। लेकिन स्थिति उनके पक्ष में नहीं बन सकी। 1948 में पूर्वी पाकिस्तान में भी उर्दू अनिवार्य कर दी गयी। जिसके खिलाफ बंगालियों और बांग्लाभाषी मुसलमानों ने भी आवाज बुलंद की। लम्बा आन्दोलन चला। ढाका यूनिवर्सिटी भाषा आन्दोलन का गढ़ था। 21 फरवरी, 1952 को यूनिवर्सिटी के छात्रों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें आठ छात्रों की मौत हुई। अब इस दिन हर साल बांग्ला देश में शहीदी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता के बाद 21 फरवरी को पूरे विश्व में ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ मनाया जाता है। यही आन्दोलन आगे चलकर बांग्ला देश की आजादी का द्योतक बना। भाषा आन्दोलन का व्यापक असर था। सरकार का दमन भी चरम पर था। मैं तब पढ़ाई छोड़ चुका था और 13-14 साल का था।’’

बांग्ला भाषा में नजरूल इस्लाम, रवीन्द्र नाथ टैगोर, रजनी कान्त सेन, डी. एल. राय, शरत चन्द्र, बंकिंम चन्द्र, हुमायूँ कबीर, शमसुर रहमान, मुस्तफा अली, मीर मुशर्रफ की रचनाओं को पढ़ाया जाता था। विज्ञान विषय में जगदीश चन्द्र बोस और प्रफुल्ल चन्द्र राय के सिद्धान्त पढ़ाये जाते थे। छोटी क्लास में अंग्रेजी विषय नहीं था। ईसाई मिशनरी दलितों के बीच बालिका शिक्षा पर जोर दे रही थी। इसकी आड़ में दलितों को ईसाई बनाने की कोशिश हुई। लेकिन दवाब या लालच में नहीं, बल्कि स्वैच्छिक था धर्मान्तरण।

नमोः शूद्र बंगालियों को ईसाई मिशनरी के लोग सम्मान देते थे। उनके यहाँ छुआछूत और गैर बराबरी नहीं थी, जिस कारण भी मतुआ लोग उनकी और आकर्षित थे। गुरूचाँद ठाकुर ने ईसाई धर्मान्तरण का विरोध करते हुए शिक्षा आन्दोलन पर जोर दिया, तो डॉ. मीड के नेतृत्व में मिशनरी के लोग उनके साथ हो गये। जिससे पूर्वी पाकिस्तान के दलितों में शिक्षा का प्रसार बाकी देश के मुकाबले ज्यादा तेज हो गया।

1964 के दंगों की एक घटना बताते हुए विवेक कहते हैं,

‘‘रूपसा नदी के किनारे माथाभांगा गाँव था। वहाँ रूप चाँद धानी बड़े जमींदार थे। तत्कालीन संचार मंत्री सबूर खान ने उनकी जमीन कब्जा ली। न्यायालय का फैसला भी सबूर खान के खिलाफ गया। खुन्दक में उसने जनवरी 1964 को रूप चाँद की हत्या करा दी। इधर हज़रतबल काण्ड हो चुका था। दोनों घटनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान को साम्प्रदायिक हिंसा में झोंक दिया। दंगाई एक के बाद एक गाँव और शहर को निशाना बना रहे थे। लूट-पाट, मार-काट, महिलाओं की इज्जत से खिलबाड़ आम हो गया था।’’ लेकिन धर्मनिरपेक्ष बंगाली मुसलमानों ने भी दंगाइयों का जमकर प्रतिरोध किया। इसी बीच बामनमार, मालागाछी और चांद पाई में मुस्लिम हमलावरों को स्थानीय जमींदार युनूस अली जरदारी और उनके बेटे ने बाहर खदेड़ दिया था। उनकी गोलीबारी में कई मुस्लिम दंगाई मारे गये। इसका उल्टा प्रचार हो गया। क्षेत्र में अफवाह फैला दी गयी कि बंगालियों (हिन्दुओं) ने मुसलमानों को मारा है। इस घटना ने आग में घी का काम किया। बड़ी तादाद में घटनाएं होने लगीं।

विवेक विश्वास का गाँव पश्चिम में पसरा नदी और पूरव में मंगला नदी के संगम स्थल मंगला बंदरगाह से 4 मील पहले था। नदी के रास्ते ही दंगाई नाव या लाँच से हमला बोलते थे। नौजवानों और पुरूषों ने गाँव की घेराबंदी कर दी थी। हाथ में भाला, तलवार, दाँव (धारदार हथियार), ढाल आदि परम्परागत हथियार लेकर पहरा देते थे। विवेक साहसी थे और संघर्ष करने का जज्बा उन्हें विरासत में परिवार से मिला था। वे मुस्तैदी से पहरा देते थे। अपने आक्रामक स्वभाव के कारण वे असरदार लोगों की आँख में खटकते रहते थे। आये दिन विवाद होता रहता था। 1962 में गाँव की ही सुशीला से विवाह हुआ। हालात लगातार बिगड़ रहे थे। विवेक के लिए वहाँ रुक पाना अब संभव न था। दुश्मन उन्हें खोज रहे थे।

विवेक बताते हैं कि पत्नी के साथ 23 दिन की बेटी बुला को लेकर भारी मन से उन्होंने अपने गाँव को अलविदा कहा। अप्रैल 1964 की कोई काली रात रही होगी। गाँव के ही हरिदास विश्वास, नारद मण्डल और भवनाथ मण्डल के साथ उन्होंने नाव से नदी को पार किये।

आगे क्या होगा? कहाँ तक और कैसे जाना है, कुछ पता नहीं था। जैसे-तैसे आशासूनी थाना इलाके में पहुँचे। वहाँ भारत के बॉर्डर की ओर जाने वालों की भीड़ जमा थी। 8-10 मील पैदल चलकर बदरपुर बॉर्डर पहुँचना था। बच्चे रो रहे हैं। बुजुर्ग लाठी के सहारे घिसट रहे हैं। महिलाएं नंगे पैर ही चल रही हैं। पुरूष कुछ न कुछ सामान हाथ में लिए आगे बढ़ रहे हैं। कोई थक कर बेसुध पड़ा है। कोई चीड़े-गुड़ खा रहा है। खेत की पगडंडियों पर एक तरफ महिलाएं तो एक तरफ पुरूष हग रहे हैं। बीमार लोग मर भी रहे हैं। रास्ते में मरने वालों को जल्दी-जल्दी फूँक-फाँक कर लोग आगे बढ़ रहे हैं। खाने-पीने का कोई इंतजाम नहीं है। जहाँ जा रहे हैं, वहाँ के हालात कैसे होंगे, कुछ पता नहीं है। बस एक भयभीत भीड़ है जो जान बचाने के लिए तेजी से दौड़ रही है।

विवेक विश्वास आज भी वो मंजर याद करके भावुक हो उठते हैं। ऐसे दौर में भी पुलिस और मौकापरस्त लोग अवैध वसूली कर रहे थे। बिना पैसे दिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाना असंभव था।

रास्ता था नहीं। लोग खेत-खेत ही बॉर्डर की तरफ बढ़ रहे थे। दो-तीन मील चले होंगे, पाकिस्तानी सेना की जीप ने रोक लिया। पर्ची बनेगी, तभी आगे जाओगे, ऐसा बोल के लोगों को लाइन लगाने को कहा। वयस्क व्यक्ति से चार रुपये प्रति व्यक्ति और नाबालिग से दो रुपये लेने का आदेश दे दिया।

विवेक बताते हैं कि उन्हें पैसा जमा करने और पर्ची बनाने के काम में लगा दिया। यह अवैध वसूली थी, लेकिन कोई कुछ नहीं कर सकता था। पत्नी और बेटी को और लोगों के साथ आगे निकाल दिया और खुद वहाँ रहकर सेना के कहे मुताबिक काम करने लगे। बहुत सारे ऐसे थे, जिनके पास देने को पैसे नहीं थे, उन्हें मौका देखकर विवेक ने ऐसे ही आगे निकाल दिया।

वह बताते हैं कि दस हजार से ज्यादा लोगों का काफिला उस दिन 24परगना जनपद के बशीरहाट के उत्तर में बने भारतीय बॉर्डर घोघाडांगा पहुँचे। यहाँ से दो दिन में बशीरघाट अस्थाई कैम्प आये। साथ आये अन्य परिवार  बिछुड़ चुके थे। सिर्फ नारद का परिवार साथ बचा था।

पता चला कि रिफ्यूजियों को लेकर ट्रेन जाने वाली है। कहाँ जाने वाली है, इसका कुछ पता नहीं था। बशीरहाट कैम्प के हालात बहुत दयनीय थे। इसलिए ट्रेन के साथ आगे चलना ही उचित लगा। हम लोग ट्रेन में बैठ गये। कई दिन रुकते-रुकाते ट्रेन मन्दिर हुसाउद (रायपुर) पहुँची। रास्ते में स्थानीय लोगों ने रेलवे स्टेशनों पर हमें खाना खिलाया और अन्य सामान भी दिया। तब भारतीय लोगों में बंगाली शरणार्थियों के प्रति उदारता और सहानुभूति थी। नफरत तो 1971 के बाद पैदा हुई। आस-पास में माणा, कुरूद, बड़दाभाटा, नौगाँ और माणाभाटा पाँच शरणार्थी कैम्प थे। हम नौगाँ कैम्प आ गये। एक टेन्ट में चार-पाँच परिवार साथ रहते थे। कुछ दिन यहाँ रखकर शरणार्थियों को कहीं और सेटलमेंट के लिए भेज दिया जाता था। हमें भी अपने सेटलमेंट का इंतजार था। कैम्प में कार्यरत सरकारी कर्मचारी कमलकान्त कर्मकार ने मुझे पहचान लिया। उसके पिता जी मेरे साथ मतुआ आन्दोलन में थे।

उसने कहा,

‘‘काका, कल बरेली ट्रेन जा रही है। कुछ परिवार नैनीताल भेजे जायेंगे। आप लोग वहीं चले जाओ। उधर के कैम्प यहाँ से अच्छे हैं। जमीन भी उपजाऊ है।’’

मैं 1960 में मामा को खोजते हुए एक बार नैनीताल के शरणार्थी क्षेत्र में आया था। तब से ही मुझे नैनीताल पसंद था। मैं फौरन तैयार हो गया। साथ में नारद, अनादि ठाकुर और मनी ठाकुर के परिवार भी साथ चलने को राजी हो गये। लखनऊ से ट्रेन बदलनी पड़ी। छोटी लाइन से बरेली पहुँचे। अगले दिन बस से हम लोग किच्छा आये। यहाँ से 50 पैसे प्रति व्यक्ति भाड़ा देकर हम लोग रुद्रपुर के ट्राँजिट कैम्प पहुँचे।

विवेक विश्वास बताते हैं,

‘‘1959 में पीएसी 31वाहिनी के जवानों के लिए आवासीय कॉलोनी बनायी गयी थी। बाद में पीएसी को दूसरी जगह बसाया गया। जिससे ट्राँजिट कैम्प के कमरे और जगह खाली थी। 1960 में पुनर्वास विभाग ने इस आवासीय परिसर और जमीन को अपने कब्जे में ले लिया और बंगाली शरणार्थियों के लिए अस्थाई कैम्प बना दिया। पी0 एस0 एन0 गांगुली डीआरओ थे। उनकी निगरानी में विस्थापित बंगाली यहाँ पंजीकृत हो रहे थे। 1960 से 1964 तक आये लोगों का स्वर्गफार्म (बिलासपुर), रतनफार्म (शक्तिफार्म), पीलीभीत के लखीमपुर खीरी, हाजरा चाँदुआ में सेटलमेंट किया गया।’’

वे बताते हैं कि 31 मई, 1964 को वे ट्राँजिट कैम्प आये। तम्बू मिले रहने को। तब 1735 परिवारों का पंजीकरण हुआ था। कुछ साल अफरा-तफरी में गुजरे। पुनर्वास विभाग ने भी सेटलमेंट की प्रक्रिया धीमी कर दी थी। 1952 से ही पुलिन बाबू, राधाकान्त राय, हरिपद विश्वास, सुरेन सरकार आदि के नेतृत्व में तराई उद्वास्तु समिति के बैनर तले शरणाार्थियों को शीघ्र बसाने के लिए आन्दोलन शुरू हुआ।

1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी। वे मुख्यमंत्री थे। बंगाली शरणार्थियों के प्रति उनका रवैया उदासीन और कठोर था। वे तराई के बंगालियों को दण्डकारण्य और अंडमान निकोबार भेजना चाहते थे। एक बार चौधरी चरण सिंह से मिलने बंगाली शरणार्थियों का प्रतिनिधि मण्डल मिलने लखनऊ गया। उन्होंने पुलिन बाबू सहित हम सबका बहुत अपमान किया। धमकाकर बाहर निकाल दिया। विवेक बताते हैं कि उन्होंने इसका विरोध किया। बांग्ला में ही खूब भला-बुरा कहा। तब उन्हें हिन्दी ठीक से नहीं आती थी। बाहर आकर मैं पुलिन बाबू से उखड़ गया। बोला, ‘‘वे मुख्यमंत्री हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हमारा अपमान करेंगे। आप सब कुछ सुनते रहे, बोले क्यों नहीं? सेटलमेंट हमारा हक है।’’

पुलिन बाबू विनम्र होकर बोले,

‘‘बंगाली समाज की भलाई के लिए मैं हर पीड़ा सहन कर सकता हूँ। अपमानित भी हो गया तो क्या हुआ? मैं अगर वहाँ बिगड़ जाता तो तराई में रह रहे हजारों भूमिहीन बंगालियों का क्या होता? हमें संयम से ही काम लेना होगा।’’

इस घटना के बाद मुख्यमंत्री के आदेश पर ट्राँजिट कैम्प में रह रहे 177 परिवारों पर गाज गिरी, जिनमें मेरा परिवार भी शामिल था। सरकारी सुविधाओं पर रोक लगा दी गयी। डोल (सहायता राशि) बंद कर दी गयी। कैम्प से बाहर निकालने की कार्यवाही शुरू कर दी गयी। लगभग एक साल तक हम लोग बहुत परेशान रहे।
विवेक विश्वास ने बताया कि पुलिन बाबू हमें एन.डी. तिवारी के पास ले गये। उसके बाद तो जब तक तिवारी जी राजनीति में सक्रिय रहे, मेरे घर आते रहे।

उन्होंने कहा,

‘‘कुछ दिन रुक जाओ। चरण सिंह की सरकार ज्यादा चलेगी नहीं। उसके बाद मैं सब ठीक कर दूँगा। सेटलमेंट भी हो जाएगा।’’

इधर तत्कालीन सरकार में नैनीताल से मंत्री डूंगर सिंह बिष्ट ने भी हमारी मदद की। कैम्प से निकालने की प्रक्रिया रुकवा दी। 1968 में हमने ट्राँजिट कैम्प की 360 एकड़ जमीन पर बंगाली शरणार्थियों को बसाने का आन्दोलन शुरू किया। 1975 तक यह आन्दोलन चलता रहा। इस बीच वर्मा से 1500 परिवार भारत आये। इन्हें भी ट्राँजिट कैम्प में रखा गया। बाद में इन्हें दूसरे राज्यो में भेजा गया। कुछ परिवार यहीं रह गये, वो आज तक कैम्प में ही हैं।

पुलिन बाबू के साथ कुमुद रंजन सरकार, अमूल्य रंजन जोद्दार, मनोहर विश्वास और मैं मजबूती से शरणार्थियों के हक अधिकार के लिए लड़ते रहे। 1975 में 34 परिवारों को बाजार की तरफ व्यावसायिक पट्टा दिया गया। बाद में 100 परिवारों को सहकारिता की तर्ज पर खेती करने के लिए प्रति परिवार 2.5 एकड़ जमीन दी गयी। कुछ को बाहर अन्य जनपदों में भेजा गया। हम आन्दोलनकारी आठ परिवारों को 1983 में मात्र 1.5 एकड़ जमीन कैम्प के मैदान में दी गयी।

विवेक बताते हैं कि विस्थापितों के लिए आवाज उठाने वालों को सरकार ने न सिर्फ सख्ती से कुचला, बल्कि झूठे मुकदमे लगाकर जेल भेज दिया। उनका सेटलमेंट भी ठीक से नहीं होने दिया।

वे बताते हैं कि कैम्प आज वो कैम्प नहीं है। पट्टाधारी बंगाली परिवार 10 फीसदी भी यहाँ नहीं बचे हैं। ज्यादातर अपनी जमीन बेच गये हैं। शरणार्थियों  के पट्टे पर अन्य लोग काबिज हैं। पट्टे तीस साल के लिए थे। लीज समाप्त हो चुकी है। बहुत से बंगाली परिवारों पर तलवार लटकी हुई है। बहुत कम लोग ही जमीन फ्रीहोल्ड करा पाये हैं। सरकार की कोई स्पष्ट गाइड लाइन शरणार्थियों के लिए आज भी नहीं बनी है।

एक सवाल के जवाब में विवेक विश्वास कहते हैं,

‘‘मैं बांग्ला भाषा बोलता हूँ, इसलिए मैं बंगाली हूँ। पूर्वी पाकिस्तान मेरी मातृभूमि है, जिसे मैं नहीं भूल सकता। भारत की जमीन हमारी दूसारी माता है, जिसने हमें पाला-पोसा और मजबूत बनाया है। जो लोग पूर्वी पाकिस्तान शब्द से गुरेज करते हैं, उन्हें हकीकत नहीं पता है। पूर्वी पाकिस्तानी होने की वजह से ही भारत में हमें सेटलमेंट और अन्य सुविधाएं मिली हैं। इसलिए प्रमाण पत्र में इस शब्द के रहने से कोई दिक्कत नहीं है। तराई के बंगालियों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिलना चाहिए। जिसके लिए आम बंगाली समाज का एक होना जरूरी है। पार्टीगत राजनीति बंगालियों का भला नहीं होने देगी। सभी बंगाली भारत के नागरिक हैं, उनपर संदेह करना व अपमानित करना गैरकानूनी और अमानवीय है।’’

रूपेश कुमार सिंह

समाजोत्थान संस्थान

दिनेशपुर, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड

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