क्या सिजेरियन डिलीवरी ही प्रसव का एकमात्र विकल्प है?

क्या सिजेरियन डिलीवरी ही प्रसव का एकमात्र विकल्प है?

नॉर्मल डिलीवरी और सिजेरियन डिलीवरी में क्या उचित है?

विज्ञान की उन्नति ने मानव के जीवन को बहुत आसान बना दिया है, विशेषकर चिकित्सा क्षेत्र में यह वरदान साबित हुई है. पहले जहां गंभीर बीमारियों का इलाज मुश्किल माना जाता था, वहीं आज विज्ञान और तकनीक के माध्यम से सात समंदर पार बैठे डॉक्टर आसानी से मरीज़ों का ऑपरेशन तक कर लेते हैं. विज्ञान की इतनी तरक्की के बावजूद कुछ अपवादों को छोड़कर आज भी प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देना ऑपरेशन की अपेक्षा सही माना जाता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में यह रुझान बदलता नज़र आ रहा है.

अगर बच्चे को जन्म देने की बात की जाए तो ऐसा लग रहा है कि आज के समय में मात्र ‘सिजेरियन डिलीवरी’ अर्थात c सेक्शन ही एक विकल्प रह गया है. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि बड़े पैमाने पर यह देखने को मिल रहा है कि प्रेगनेंसी के दौरान 9 माह के इलाज के बाद, जब महिला बच्चे को जन्म देने अस्पताल जाती है तो डॉक्टर प्राकृतिक रूप से प्रसव की जगह सिजेरियन डिलीवरी की सलाह देते हैं. 

पिछले पांच-सात वर्ष से तो मानो प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया ही लुप्त होती नज़र आ रही है.

भारत में लगातार बढ़ रहे हैं c सेक्शन के केस

वैसे बात करें भारत की, तो दिन प्रतिदिन ‘सिजेरियन डिलीवरी’ यानि c सेक्शन के केस बढ़ते ही जा रहे हैं.

वहीं बात की जाए जम्मू कश्मीर की, तो यह उत्तर भारत में इस मामले में पहले पायदान पर पहुंचता नज़र आ रहा है. इस केंद्र शासित प्रदेश में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत 41.7 तक पहुंच गया है. जबकि दूसरे नंबर पर राजस्थान है, जहां 10.4 प्रतिशत c section के मामले सामने आए हैं. 

इसका अर्थ यह हुआ कि पहले और दूसरे राज्य में लगभग 30 प्रतिशत का अंतर है, जो बहुत बड़ा अंतर है.

सी सेक्शन डिलीवरी के केस कितने होने चाहिए?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार सी सेक्शन डिलीवरी के केस 10 से 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होने चाहिए, जबकि इसी की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 26 प्रतिशत केस में लेबर पेन से पहले ही सी सेक्शन डिलीवरी कर दी जाती है.

रिपोर्ट के अनुसार अगर 10 से 15 प्रतिशत से अधिक सी सेक्शन डिलीवरी के केसों में बढ़ोतरी हो तो यह एक प्रकार से खतरे का संकेत है.

जम्मू कश्मीर के एक स्थानीय न्यूज़ चैनल ‘द स्टेट लाइन’ ने इस संबंध में स्थानीय डॉक्टरों और मेडिकल हेल्थ सेंटर के कर्मचारियों से बात कर यह जानने का प्रयास किया था कि क्यों सी सेक्शन डिलीवरी के ज्यादा केस बढ़ रहे हैं? परंतु चैनल के अनुसार हमें किसी के द्वारा इस संबंध में कोई संतोषजनक जानकारी नहीं मिली.

कहानी जम्मू डिवीज़न के जिला पुंछ के गांव मगनाड की

बात करे गांव मगनाड की, जो जम्मू डिवीज़न के जिला पुंछ से मात्र 6 किमी की दूरी पर बसा है. इस गांव की आबादी लगभग 5000 से कुछ अधिक है. पहाड़ी क्षेत्र में बसा होने के कारण हर व्यक्ति को प्रतिदिन ऊपर नीचे का रास्ता तय करना ही पड़ता है.

मगनाड गांव की लगभग सभी महिलाएं खेतों में भी काम करती हैं और माल मवेशी भी हर घर में देखने को मिल जाएंगे जिसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी भी महिलाओं के कंधे पर ही है. परंतु इस छोटे से गांव में यह बात बहुत गहरा असर डालती है कि बच्चे की डिलीवरी का जब समय आता है, तब डॉक्टर बिना किसी जटिलताओं के बावजूद हर स्त्री को सेज़रियन की सलाह क्यों देने लगती है?

आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो पिछले 2 से 3 वर्षो मे इस गांव की तक़रीबन हर दूसरी महिला ने सेज़रियन डिलीवरी के माध्यम से ही बच्चे को जन्म दिया है.

प्रश्न उठता है कि क्या मात्र सी सेक्शन ही बच्चे को जन्म देने का विकल्प रह गया है?

क्या हर महिला को कोई न कोई ऐसी जटिल समस्या है जिससे वह प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने में सक्षम नहीं हो सकती है?

क्या आने वाले समय में हर स्त्री के सामने ऑपरेशन ही विकल्प रह जाएगा?

यदि ऑपरेशन होना तय है तो यह जानना भी बहुत ज़रूरी है कि जिन महिलाओं के ऑपरेशन हुए हैं, उन्हें शारीरिक रूप से किस प्रकार के फायदे या नुकसान हुए हैं? यह जानने के लिए सबसे पहले हमारी बात भारती वर्मा से हुई, जिन्होंने सिजेरियन डिलीवरी के माध्यम से बच्चे को जन्म दिया है. 

भारती का कहना है कि ‘ऑपरेशन से मुझे कोई लाभ तो नहीं हुआ, परंतु नुकसान ज़रूर हुआ है. ऑपरेशन के दो हफ्तों तक तो सब कुछ ठीक रहा, उस के बाद से पेट में ‘स्टीचेस’ की जगह से एक सुराख़ हो जाने पर मुझे कई बार डॉक्टर के चक्कर काटने पड़े और कम से कम बीस हज़ार रूपए की दवाईयां खानी पड़ीं.

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन हुए 8 महीने हो चुके हैं, परंतु अभी भी वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो सकी हैं.

 एक अन्य महिला परवीन भी इसी तरह की परेशानियों से गुज़र रही हैं. वह बताती हैं कि उनके भी 3 बड़े ऑपरेशन हो चुके हैं. पहले दो ऑपरेशन तो ठीक रहे परन्तु उसके बाद टांकों में खराबी आने की वजह से बहुत समस्याएं समस्या झेलनी पड़ी, ख़र्च भी बहुत हुआ.

परवीन कहती हैं कि ‘ऑपरेशन के बाद, मैं ऐसा महसूस करती हूं कि अब पहले की अपेक्षा घर के बहुत सारे काम कर पाने में सक्षम नहीं हूं’.

एक अन्य महिला साक्षी वर्मा कहती हैं कि बिना किसी जटिलताओं के बावजूद डॉक्टरों ने मेरा ऑपरेशन किया.

सिलसिला यहीं नहीं रुकता है. हमें अनगिनत महिलाएं मिली जिन्होंने बताया कि बिना किसी जटिलताओं के बावजूद उन्हें ऑपरेशन के दौर से गुज़रना पड़ा.

क्यों बढ़ रही हैं सिजेरियन डिलीवरी?

सिजेरियन डिलीवरी के बढ़ते कारणों के संबंध में जब हमने श्री महाराजा सुखदेव सिंह हॉस्पिटल, पुंछ के डॉक्टरों से बात करने का प्रयास किया तो किसी ने भी इस पर बोलने से मना कर दिया.

हालांकि महिला स्वास्थ्य से जुड़ी वेबसाइट को खंगालने पर इसके पीछे तीन महत्वपूर्ण कारणें सामने आती हैं.

पहली वजह जहां उनमें बढ़ता मोटापा है, वहीं लग्ज़री लाइफस्टाइल भी एक कारण है.

तीसरी महत्वपूर्ण बात, आजकल हर दूसरी या तीसरी महिलाओं में थायराइड, यूरिक प्रॉब्लम और शुगर जैसी कई समस्याएं मिलने लगी हैं, जो नॉर्मल डिलीवरी के समय संकट उत्पन्न कर सकती हैं. यही कारण है कि डॉक्टर भी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि जिन महिलाओं में ऐसी कोई जटिलता नहीं है, उनका प्रसव भी क्यों और किस आधार पर सिजेरियन डिलीवरी के माध्यम से कराया जाता है?

बहरहाल, यह बता पाना मुश्किल है कि सी सेक्शन डिलीवरी कितनी सेफ और कितनी घातक है?

लेकिन इस विषय पर सरकार को एक ऐसी ठोस कार्यनीति बनाने की ज़रूरत है जिससे प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं को सिजेरियन डिलीवरी के लिए कोई बाध्य न कर सके.

भारती डोगरा

पुंछ, जम्मू

(चरखा फीचर)

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