किस का रास्ता बुहारेगी आप की झाडू? काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

किस का रास्ता बुहारेगी आप की झाडू? काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती

क्या इसे विडंबनापूर्ण ही नहीं कहा जाएगा कि आम आदमी पार्टी (आप), जिसका लोकसभा में प्रतिनिधित्व गुरुदासपुर उपचुनाव के बाद शून्य हो गया है, 2024 में होने वाले अगले आम चुनाव में अकेले और सभी सीटों पर लड़ने का एलान करने वाली पहली पार्टी बन गयी है।

आप के दिल्ली में पिछले सप्ताहांत पर आयोजित पहले निर्वाचित प्रतिनिधि राष्ट्रीय सम्मेलन में इस ‘‘एकला चलो’’ पर मोहर लगायी गयी, जबकि इस सम्मेलन की पूर्व-संध्या में ही गुजरात में अपनी पार्टी के एक आयोजन में, आप’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल इस नीतिगत दिशा का एलान भी कर चुके थे। वास्तव में उससे भी पहले से, खासतौर पर पंजाब में अपनी जबर्दस्त कामयाबी के बाद से ही, आप पार्टी ने बार-बार इसका दावा करना शुरू कर दिया था कि वह ‘कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प’ बन चुकी है।

बहरहाल, अब आप ने अपने इस दावे को फैलाकर, समूचे विपक्ष को इसके दायरे में समेट लिया है और वह अकेले ही देश के पैमाने पर भाजपा का मुकाबला करने का दावा कर रही है।

खबरों के अनुसार, आप सुप्रीमो ने किसी भी विपक्षी कतारबंदी का हिस्सा बनने के बजाए, सीधे ‘एक सौ तीस करोड़ भारतवासियों के साथ गठबंधन’ करने की बात कही है। इस पहलू से अगर देखा जाए और थोड़ा उदार हुआ जाए तो क्या केजरीवाल के ‘‘एकला चलो’’ के एलान को, वास्तव में अपनी पार्टी का विस्तार करने की कोशिश की आकांक्षा के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए?

बेशक, केजरीवाल ने अपनी पार्टी के उसी सम्मेलन में, जिसमें 156 विधायकों समेत, 20 राज्यों के कुल 1,446 निर्वाचित प्रतिनिधि उपस्थित थे (हालांकि पार्टी के दूसरे मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर भी अटकलें लगायी जाएंगी) अन्य सभी पार्टियों को यह कहकर खारिज करना भी जरूरी समझा था कि, 70-75 साल में इन पार्टियों ने जनता के लिए कुछ नहीं किया था और इसीलिए देश भर में जनता ‘बांहें खोलकर आप को गले लगा रही है’ आदि।

लेकिन, क्या इस सब को भी एक राजनीतिक पार्टी के अपने, दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों से न सिर्फ भिन्न बल्कि श्रेष्ठतर होने के स्वाभाविक दावे के हिस्से के तौर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए।

जाहिर है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अन्य चीजों के अलावा इसी विश्वास के आधार पर अपने समर्थकों को एकजुट रखने तथा अपने प्रभाव का विस्ता करने की उम्मीद कर सकती है कि वही सबसे श्रेष्ठ है। कोई राजनीतिक पार्टी इस श्रेष्ठता की क्या परिभाषा अपने अनुयाइयों तथा समर्थकों के सामने रखती है यह एक अलग प्रश्न है, लेकिन इतना तय है कि अपनी श्रेष्ठता या बाकी सब से अनोखेपन के किसी न किसी प्रकार के दावे के सहारे ही कोई राजनीतिक पार्टी, अपनी शक्ति को बनाए रखने तथा बढ़ाने की उम्मीद कर सकती है। वर्ना कोई उस खास पार्टी के ही साथ क्यों खड़ा होगा?

क्यों न यह माना जाए कि अरविंद केजरीवाल स्वाभाविक रूप से आप पार्टी के सुप्रीमो के तौर पर इसी लक्ष्य को साधने की कोशिश कर रहे होंगे?

इसके अलावा, अगले लोकसभा चुनाव की कार्यनीति के संबंध में आप ने उक्त सम्मेलन से जिस कार्यनीति की घोषणा की है, उसे पत्थर पर लकीर खींचने की तरह देखने की भी क्या जरूरत है?

अगला लोकसभा चुनाव अगर कोई विशेष कारण ही सामने नहीं आ जाए तो, 2024 की दूसरी तिमाही में ही होना है। यानी तब तक पूरा डेढ़ साल बाकी है। और संसदीय जनतंत्र की राजनीति में डेढ़ साल कोई कम नहीं होते हैं। अंतत: चुनाव के समय चाहे जो कार्यनीति अपनायी जाए, इस बीच की अवधि में क्या राजनीतिक पार्टियों का अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करना ही स्वाभाविक नहीं है? आखिरकार, वास्तविक चुनावी कार्य नीति भी तो पार्टियों की तुलनात्मक ताकत के तकाजों से भी तय हो रही होगी।

इतना ही नहीं, इस बीच की अवधि में कई महत्वपूर्ण विधानसभाई चुनाव होने हैं। इनमें से, हिमाचल और गुजरात विधानसभा के चुनाव तो चंद महीने में ही यानी इसी साल के अंत तक हो जाने हैं। दोनों राज्यों में परंपरागत रूप से जरूर कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला होता आया है। खासतौर पर गुजरात में पिछले विधानसभाई चुनाव में तो करीब पंद्रह साल बाद, भाजपा के हाथों से सत्ता फिसलते-फिसलते रह गयी थी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा के चुनावी बोलबाले के लिए, गुजरात सरकार पर भाजपा का कब्जा बनाए रखने का मनोवैज्ञानिक महत्व कितना ज्यादा है, यह स्वत:स्पष्ट है। और गुजरात समेत, जहां पिछले विधानसभाई चुनाव में कांग्रेस ने मोदी के नेतृत्ववाली संघ-भाजपा जोड़ी के पसीने छुड़वा दिए थे, कांग्रेस पार्टी कमजोर ही हुई है, जबकि आप के साथ नये समर्थक जुड़ रहे हैं। ऐसे में आप को अगर यह लगता है कि वह भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस से ज्यादा सक्षम है, तो क्यों नहीं वह अपना जोर आजमा कर देखे? कम से कम आप पार्टी के कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प होने के केजरीवाल के शुरूआती दावे का क्या यही संदर्भ नहीं माना जाना चाहिए, हालांकि देश के पैमाने पर ‘एकला चलो’ के नारे में अब उसका विस्तार कर दिया गया है।

आखिर, हो सकता है कि यह विस्तार कार्यनीतिक ही हो यानी विधानसभाई चुनावों के जरिए अपनी ताकत बढ़ाने के प्रयास को ज्यादा धारदार बनाने भर के लिए!

यह सब अगर सच भी मान लिया जाए, तब भी आप पार्टी के पहले राष्ट्रीय निर्वाचित प्रतिनिधि सम्मेलन में ‘एकला चलो’ की कार्यनीति का एलान जिस राजनीतिक संदर्भ में किया गया है, वह संदर्भ इसकी ऐसी हानिरहित व्याख्याओं को बलपूर्वक नकारता है।

इस संदर्भ के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, मोदी राज की जनविरोधी तथा जनतंत्रविरोधी नीतियों के चलते बेकारी, महंगाई, भूख तथा सांप्रदायिक अशांति के गहराते संकट की पृष्ठभूमि में, निम्र मध्य वर्ग समेत, मेहनतकश अवाम के बीच तेजी से बढ़ता असंतोष, जिसे अपनी आर्थिक व मीडियाई ताकत से लेकर राजकीय ताकत तक को पूरी तरह से झोंककर भी, मोदी राज ठंडा नहीं कर पा रहा है।

और दूसरा पहलू है, इस समग्र परिस्थिति के संदर्भ में, एक ओर विपक्षी पार्टियों का इस सचाई को ज्यादा से ज्यादा पहचानना कि वर्तमान संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, जिसमें तमाम विपक्षी पार्टियां भी शामिल हैं, देश की खुशहाली तथा जनता के कल्याण तक, सभी के लिए मोदी राज को एक कार्यकाल और मिलना, बहुत ही खतरनाक होगा। लेकिन, इसके लिए विपक्षी ताकतों को किसी न किसी प्रकार से एकजुट होना होगा क्योंकि कोई भी पार्टी या मौजूदा गठबंधन अकेले, इस खतरे से देश तथा जनतंत्र को नहीं बचा सकता है। विपक्ष में इसी सचाई के बढ़ते पैमाने पर पहचाने जाने के बीच, विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की अलग-अलग कोशिशें हो रही हैं, हालांकि ये कोशिशें आसानी से कामयाब होती नजर नहीं आती हैं।

बहरहाल, इन्हीं कोशिशों को एक प्रबल वेग देते हुए, बिहार की हाल की बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद, नयी बनी महागठबंधन-जदयू गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री तथा जदयू नेता, नीतीश कुमार ने मौजूदा मोदी निजाम के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के प्रयासों को नयी गति दी है। इसकी अभिव्यक्ति पहली ही बार, ‘‘यूपी+ बिहार= गयी मोदी सरकार’’ जैसे हौसला बढ़ाने वाले नारे में हुई है। और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, इसी प्रक्रिया के पूरक के रूप में, जनतंत्र की रक्षा समेत जनता के विभिन्न मुद्दों को लेकर, विभिन्न विपक्षी राजनीतिक ताकतें, मौजूदा निजाम के खिलाफ लगातार लड़ाई के मैदान में हैं और उसकी अजेयता की छवि पर चोटें कर रही हैं।

ठीक इसी संदर्भ में आप की ‘एकला चलो’ की घोषणा आयी है, जिसकी टाइमिंग को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। बहरहाल, टाइमिंग के सवाल को अगर फिलहाल छोड़ भी दिया जाए तब भी, इतना तो साफ ही है कि मौजूदा कठिन चुनौती और उसका मुकाबला करने की न्यूनतम कार्यनीति पर, संघ-भाजपा राज के विध्वंसक आठ साल के अनुभव के बाद विपक्षी ताकतों में जो आम सहमति बनी है, आम आदमी पार्टी उसके खिलाफ ही जा खड़ी हुई है। आप पार्टी के इस रुख को न तो विपक्ष को एकजुट करने में आ रही कठिनाइयों से व्याख्यायित किया जा सकता है और न अपना राजनीतिक विस्तार करने की उसकी वैध आकांक्षा से। इसे उसके इस बात के किसी जायज मुगालते से भी नहीं समझा जा सकता है कि वही जनता के सामने इतना आकर्षक विकल्प पेश कर रही है, देश के पैमाने पर उसका विकल्प देखते ही जनता संघ-भाजपा को छोडक़र, उसे अपना लेगी, जैसाकि नगर प्रदेश दिल्ली की जनता ने करीब आठ साल पहले किया था और इसी साल के शुरू में पंजाब की जनता ने किया था। आम आदमी पार्टी के इस रुख का गहरा संबंध, संघ-भाजपा के मौजूदा निजाम के उसके विरोध के और इसलिए, उसके तथाकथित ‘विकल्प’ के, मूल चरित्र से भी है।

अपने सारे मतभेदों तथा सीमाओं के बावजूद, विपक्ष की आम सहमति के केंद्र में मोदी राज में संसदीय जनतंत्र के क्षय तथा सबसे बढक़र राज्य की धर्मनिरपेक्षता तथा संघीय व्यवस्था के क्षय और जनता के जनतांत्रिक व नागरिक अधिकारों के क्षय के मुद्दे और कारपोरेटों के फायदे के लिए कल्याणकारी व्यवस्थाओं के कमजोर किए जाने के मुद्दे हैं, जिन्हें ये ताकतें मिलकर भी तथा अलग-अलग भी उठा रही हैं। लेकिन, आम आदमी पार्टी विशेष रूप से दिल्ली में भाजपायी केंद्रीय निजाम से तीखे टकराव के बावजूद, इनमें से ज्यादातर मुद्दों पर चुप्पी ही साधे रहती है।

शासन की धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न पर ही नहीं, संघवाद से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता की सुरक्षा तक के प्रश्नों पर, आम अदमी पार्टी, थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ, संघ-भाजपा की ही बोली बोलती और उसके जरिए उनसे होड़ लेती ही नजर आती है।

भारत को ‘दुनिया में नंबर वन बनाने’ के ताजातरीन मोदीनुमा नारे से लेकर, शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन के नाम पर ‘देशभक्ति की शिक्षा’ तक के उसके नारे, संघ-भाजपा के नारों से आप पार्टी के ऐसे ही साझे की गवाही देते हैं।

यह भी कोई संयोग ही नहीं है कि आप पार्टी के भाजपा का एकमात्र विकल्प होने का नारा देने वाले, आप के उसी निर्वाचित प्रतिनिधि सम्मेलन में अपने संबोधन में केजरीवाल ने इस लक्ष्य के लिए, अपने वाकई ईमानदार पार्टी होने और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के नारे पर ही भरोसा किया है। हां! साथ में मध्य वर्ग को आकर्षित करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार व सस्ती बिजली आदि कुछेक सुविधाओं के आश्वासन भी जोड़ दिए गए हैं। लेकिन, संघ-भाजपा निजाम की बुनियादी नीतियों से उनका कोई विरोध नहीं है, न धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र की नीतियों से और न आर्थिक क्षेत्र की नीतियों से। यानी आप पार्टी, संघ-भाजपा का जैसा विकल्प जनता से स्वीकार कराना चाहती है, वह तो कोई विकल्प ही नहीं है। और इसीलिए, भाजपा को ठुकराकर देश उसके इस गैर-विकल्प को स्वीकार कर ले, इसकी तो कोई तुक ही नहीं बनती है।

हां! अपने ऐसे गैर-विकल्प के सहारे ‘एकला चलो’ के नारे पर चलने जरिए आम अदमी पार्टी, विपक्ष की संभावनाओं को कमजोर करने के जरिए, संघ-भाजपा की कुछ न कुछ मदद जरूर सकती है।

याद रहे कि 2014 के आम चुनाव में भी अकेले और एकमात्र, भ्रष्टाचारविरोधी विकल्प होने के अपने दावे के साथ आम आदमी पार्टी ने, जाहिर है कि कारपोरेट नियंत्रित मीडिया की उदार मदद से, मोदी जी की ऐसी ही मदद की थी। लेकिन, काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है।                                                                     

राजेंद्र शर्मा

क्या केजरीवाल कांग्रेस के विकल्प हैं?

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