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क्या गुजरात के बाद शाहीनबाग आरएसएस का दूसरा”प्रयोग” ही है?

Is Shaheen Bagh the second “experiment” of RSS after Gujarat?

जिन प्रगतिशील विचार के पत्रकारों बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल के”शाहीनबाग और पुलिस” के संदर्भ में दिए गए बयान को अराजनीतिक और शाहीनबाग के खिलाफ मानकर ”आप” को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की, उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि केजरीवाल ने अन्ततः ”शाहीनबाग को 2 घन्टे में खाली कराने” वाला वक्तव्य क्यों जारी किया?

मेरी जानकारी में केजरीवाल ने अपने सम्पूर्ण मुख्यमंत्री काल में कभी कोई ऐसा वक्तव्य नहीं दिया, जो किसी धर्म, किसी जाति या किसी खास प्रदेश के खिलाफ हो। आम आदमी पार्टी की सरकार ने कोई ऐसे कार्यक्रम नहीं चलाए, जिससे अल्पसंख्यक विशेष के प्रति भेदभाव किया गया हो। फिर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवा से सत्ता प्राप्त करने वाले केजरीवाल शाहीनबाग आंदोलन के खिलाफ वक्तव्य क्यों देंगे?

जाहिर है कि केजरीवाल ने शाहीनबाग के नेपथ्य से जिस तरह की प्रमाणिक जानकारी हासिल की, वह जानकारी मीडिया के पास नहीं है या मीडिया के खास प्रगतिशील समूह या पत्रकारों ने उस जानकारी को हासिल करने की कोशिश नहीं की।

”अगर दिल्ली पुलिस हमारे हाथ में होती तो हम शाहीनबाग को 2 घंटा में खाली करा देते” केजरीवाल का यह बयान पूरी तरह से तथ्यपरक और राजनीतिक वक्तव्य है। जिन्हें यह लगता है कि केजरीवाल के वक्तव्य से शाहीनबाग आंदोलन और NRC/CAA के खिलाफ इंकलाब के प्रतीक ”शाहीनबाग” का अपमान हुआ है, वे भावनावश ऐसा सोच रहे हैं।

मैं केजरीवाल के इस वक्तव्य को स्पष्ट करना चाहता हूँ।

1.दिल्ली पुलिस ने कालिंदी-कुंज हाइवे की 6 लेन सड़क पर जारी जाम को अब तक 54 दिनों से हटाने की एक बार भी कोशिश क्यों नहीं की। मैंने पुलिस के आला अधिकारियों से इस संदर्भ में जानकारी जुटाने की कोशिश की। भारत की राजधानी दिल्ली की किसी एक सड़क को क्या दिल्ली पुलिस ने दो घन्टे के लिए कभी जाम छोड़ा था? दिल्ली पुलिस ने कालिंदी-कुंज की 6 लेन हाईवे के जाम को 15 दिसम्बर की रात के बाद जाम खाली कराने के लिए अगर किसी तरह के प्रयास नहीं किए तो क्यों? पुलिस को जाम कायम रहने देने के लिए किसने निर्देश दिया? कानून व्यवस्था की सख्ती के लिए प्रसिद्ध दिल्ली पुलिस के सबसे बड़े माई-बाप गृहमंत्री अमित शाह ने पुलिस को जाम हटाने का निर्देश क्यों नहीं दिया?

भारतीय पुलिस सेवा के एक चर्चित अवकाश प्राप्त पुलिस महानिदेशक ने मुझसे बताया कि ”दिल्ली पुलिस के डेली रूटीन वर्क स्टाईल में दिल्ली की हर सड़क 7 रेसकोर्स और पार्लियामेंट स्ट्रीट के समतुल्य है और किसी तरह के बलप्रयोग के बिना कुछ घंटे में जाम खाली कराने की युक्ति दिल्ली पुलिस को मालूम है।”

शाहीनबाग के आंदोलन में शामिल परदानशीं माँ-बहनों के बटुए की पड़ताल करने वाली खोजी पत्रकारिता ने अब तक दिल्ली पुलिस से यह सवाल क्यों नहीं पूछा कि दिल्ली पुलिस ने शाहीनबाग के जाम को हटाने का स्वाभाविक प्रयास किसके निर्देश से रोक दिया? अगर दिल्ली पुलिस ने शाहीनबाग के जाम को नहीं हटाकर 54 दिनों से शाहीनबाग आंदोलन को अनवरत जारी रहने देने में सहायता की तो क्या शाहीनबाग आंदोलन के लाखों-करोड़ों समर्थक दिल्ली पुलिस को इसके एवज में धन्यवाद कहना चाहेंगे? अगर यह सच है कि दिल्ली पुलिस को कालिंदी-कुंज 6 लेन हाईवेज का जाम नहीं हटाने के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने ही हुक्म दिया तो क्या शाहीनबाग आंदोलन के लाखों-करोड़ों समर्थक आज गृहमंत्री अमित शाह के प्रति कृतज्ञता सार्वजनिक करना चाहेंगे?

अगर केजरीवाल को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि शाहीनबाग का ”प्रयोग” (प्रधानमंत्री के मुख से प्रयोग) आरएसएस की ”प्रयोग थ्योरी” की पुनरावृत्ति है और आम आदमी पार्टी सरकार की ”डेवलपमेंट थ्योरी” को खंडित करने के लिए इस खतरनाक ”प्रयोग” को अंजाम दिया गया है तो आप प्रगतिशील बुद्धिजीवी, प्रगतिशील पत्रकार केजरीवाल के मुख से निकले स्वाभाविक उदबोद्धन के लिए उन्हें कोसने में शक्ति क्यों जाया कर रहे हैं?

आधुनिक भारत में आरएसएस ने अब तक कई प्रयोग किए हैं। फर्क यह है कि हर बार वे ”प्रयोग” घोषित नहीं करते हैं।

2002 में पहली बार एक मुख्यमंत्री ने राज्य पोषित जनसंहार को ”न्यूटन के गति के नियम से तुलना कर” आरएसएस की राजनीति में वैज्ञानिक ”प्रयोगशाला” और ”प्रयोग” की महत्ता को दुनियाँ में चर्चित किया था। अब वही भूतपूर्व मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के मुख से शाहीनबाग के इंकलाब को आतंकवाद ना कहकर ”प्रयोग” घोषित कर रहा हो तो आप इस प्रयोग की गुजरात के प्रयोग से इसलिए तुलना नहीं कर रहे कि इस प्रयोग में गुजरात सदृश का रक्तपात नहीं हुआ?

19 जनवरी के जन सैलाब के इंकलाबी जुनून को देखकर मैंने भारत में विप्लव का आगाज की कल्पना की थी। मैंने भी तब ”वसंत के वज्रनाद” का स्वप्न देखा था पर मुझे भी अपने भावनात्मक आवेग को वैज्ञानिक परख के साथ संतुलित करने की दरकार थी। प्रधानमंत्री जी के उदबोधन से निकले ”प्रयोग” ने मुझे सचेत कर दिया। मैंने भारत के सशस्त्र एवं निःशस्त्र आंदोलनों को दो दशक से जिस तरह अपनी आँखों के सामने घटित होते देखा है। मेरा तजुर्बा है कि हर तरह के आंदोलन सरकार से अपनी माँगों को मान लेने की अपेक्षा पर टिका होता है। अपनी माँगों का माँगपत्र सरकार के पास भेजते हैं और माँगें पूरी करवाने के लिए हर तरह से दवाब बनाना चाहते हैं।

शाहीनबाग आंदोलन की खासियत है कि अब तक इस आंदोलन की ओर से कोई स्मारपत्र क्या कोई पर्चा तक जारी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री विश्वास खो चुके हैं तो राष्ट्रपति हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं। शाहीनबाग की ओर से अब तक अपनी माँगों पर अमल के लिए वार्ता के लोकतांत्रिक मार्ग को महत्व क्यों नहीं दिया गया? अगर शाहीनबाग के आंदोलन को इन लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा ही नहीं है तो पूरी रात लाख-लाख लोगों के इंकलाबी जन-सैलाब ने 15 – 20 किलोमीटर के दायरे में स्थित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री निवास को चारों तरफ से घेर कर संघसत्ता को सुबह होने से पहले घुटने टेकने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया?

आप चुनाव के नतीजे में उलझ जाएंगे और शाहीनबाग के लोग दिल्ली की तख्त का फैसला होते ही अपने घरों में लौट आएंगे। हम भारत की पत्रकारिता के पैगम्बरों से सवाल पूछते हैं कि आखिर इस देश में पत्रकारिता की कोई छोटी सी संभावना बचेगी या नहीं? भीड़ के नेपथ्य की हकीकत को जानना क्या पत्रकारिता का धर्म नहीं है? क्या भारत की पत्रकारिता में चीजों को परखने पड़ताल करने की स्वाभाविक इच्छा शक्ति समाप्त होती जा रही है?

शाहीनबाग में शामिल हुए अब तक लाखों लोगों के इंकलाबी जुनून और उनके समर्थन में पूरे देश -दुनियाँ में खड़े हुए इंकलाबी मुट्ठियों का इस्तकबाल करते हुए हम जानना चाहते हैं। क्या प्रधानमंत्री के ”प्रयोग” ने भारत में इंकलाब की संभावना को एक बार फिर आघातित किया है।

अगर यह साबित हो गया कि शाहीनबाग के इंकलाब के नेपथ्य में प्रधानमंत्री जी के ”प्रयोग” का सदुपयोग हुआ तो क्या वर्षों-वर्ष तक लोग घरों के बाहर इंकलाब कहने नहीं निकलेंगे? आंदोलनों के इतिहास-भूगोल की वैज्ञानिक परख करने वाले जानते हैं कि आंदोलन भावना से नहीं एक मजबूत राजनीतिक सिद्धान्त के साथ ही मुकाम पा सकते हैं। फासीवादी हुकूमत धार्मिक कट्टरता की शक्ति को अपने ”प्रयोग” के निहितार्थ इस्तेमाल कर ले, इसमें कौन सा आश्चर्य है। शाहीनबाग आंदोलनों के पीछे मस्जिद और मौलानाओं की भूमिका को जानने-परखने और उसके तफ्तीश की अब बहुत जरूरत नहीं है। आप जानते हैं कि मस्जिद के ईमाम होते हैं और ईमामों के कोई शाह होते हैं। ईमामों के शाह के मोबाईल पर मैंने घन्टी बजाई और सवाल पूछा कि भारत के बादशाह से शाह ईमाम की आखिरी मुलाकात और बातचीत क्या है? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जाहिर है कि इन शाही ईमाम ने शाहीनबाग की शुरूआत के साथ कहा था कि NRC भारत के मुसलमानों के खिलाफ नहीं है।

आप शाही ईमाम के धारा 370, बाबरी मस्जिद और वर्तमान प्रधानमंत्री के बारे में हाल के वर्षों के वक्तव्य गूगल की सहायता से देख लीजिए और अपने सर पर हाथ रखकर थोड़ा विश्राम करिए।

उम्मीद करिए कि अगली बार ऐसी चूक नहीं होगी और आप घरों से निकलेंगे तो दिल्ली को घेरने की मजबूत ईच्छा शक्ति के साथ ही घरों से निकलेंगे। आग बुझेगी नहीं, जलती रहेगी। मेरे सीने में ना सही तो उनके सीने में ही सही।ये आग सुलगती रहेगी। आग इंकलाब की सुलगेगी, असमय नहीं। वसंत का वज्रनाद, इस वसंत में ना सही तो अगले वसंत में ही सही, होगा जरूर।

पुष्पराज

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