क्या सर्वोच्च न्यायालय किसानों पर मोदी के अन्याय को लाद देने की फ़िराक़ में है ?

भारत के किसानों के न्याय का मसला लड़ाई के मैदान के अलावा और कहीं तय नहीं होगा। लड़ाई के मैदान में हमेशा लक्ष्य के प्रति संशयहीन दृढ़ संकल्प चाहिए। इसमें पीछे हटने या कोई भी कमजोरी दिखाने का मतलब है, आततायी ताक़तों के इस सत्ता-नौकरशाही और न्यायपालिका के समूह के द्वारा पूरी तरह से कुचल दिया जाना।

Is the Supreme Court in favour of inflicting injustice of Modi on farmers?

क्या सर्वोच्च न्यायालय आरएसएस के किसान संगठनों से समझौता करके भारत के किसानों पर मोदी के अन्याय को लाद देने की फ़िराक़ में है ?

जिस सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक नोटबंदी पर चुप्पी साधे रखी, जीएसटी के आधे-अधूरेपन पर कुछ भी कहने से गुरेज़ किया, खुद से राम मंदिर के मसले पर संविधान की मूलभूत भावना के विरुद्ध राय दी और धारा 370 को हटाने के घनघोर असंवैधानिक क़दम पर मामले को दबा कर रख दिया, सीएए और एनआरसी के सवाल पर उसकी नग्न दमनमूलक कार्रवाइयों के बाद उस सर्वोच्च न्यायालय से कृषि क़ानूनों की तरह के पूँजीपतियों के स्वार्थों के ख़िलाफ़ व्यापक जनता के हितों से जुड़े किसी भी सवाल पर न्याय की उम्मीद करना शिखंडी को युद्ध की मर्यादा का पालन करने का सम्मान देने जैसा ही होगा।

मोदी ने आज यदि किसानों का विश्वास खो दिया है तो सर्वोच्च न्यायालय ने देश के न्यायप्रिय लोगों का विश्वास किसी से कम नहीं खोया है। इस मसले के समाधान के लिए उसके द्वारा बनाई गई कोई भी कमेटी सिर्फ एक महा धोखा होगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने आज की सुनवाई में सोलिसिटर जैनरल को कहा है कि वह ऐसे किसान संगठनों का उसे नाम बताए जो वास्तव में समझौता करने के इच्छुक हैं। ऐसे तथाकथित समझौतावादी संगठनों की सर्वोच्च न्यायालय की तलाश उसके इन्हीं संदिग्ध इरादों के का एक पूर्व संकेत की तरह है। इसी से पता चलता है कि सर्वोच्च न्यायालय के ज़ेहन में क्या चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के विचार का विषय होगा समझौता, न कि इन काले क़ानूनों का अंत।

The issue of justice of the farmers of India will not be decided anywhere other than on the battlefield.

जाहिर है कि भारत के किसानों के न्याय का मसला लड़ाई के मैदान के अलावा और कहीं तय नहीं होगा। लड़ाई के मैदान में हमेशा लक्ष्य के प्रति संशयहीन दृढ़ संकल्प चाहिए। इसमें पीछे हटने या कोई भी कमजोरी दिखाने का मतलब है, आततायी ताक़तों के इस सत्ता-नौकरशाही और न्यायपालिका के समूह के द्वारा पूरी तरह से कुचल दिया जाना।

-अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
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उपाध्याय अमलेन्दु:
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