औपनिवेशिक लूट के नेता का रूप अपना चुके हैं प्रधानमंत्री मोदी, किसानों के संघर्ष से ही बचेगी अर्थव्यवस्था

किसानों का यह संघर्ष भारत की शहरी और ग्रामीण, पूरी आबादी की बेहतरी का संघर्ष है, इसमें देश के क्रांतिकारी रूपांतरण की संभावनाएँ निहित है। भारत की तक़दीर को बदलने के लिए इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं हो सकता है। यह सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ समूची जनता को एक क्रांतिकारी परिवर्तन की लड़ाई में एकजुट करने का रास्ता है।

किसानों का यह संघर्ष ही भारतीय अर्थ-व्यवस्था के तमाम संकटों के निदान की कुंजी है

भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ पूँजीवाद का संबंध (The relation of capitalism with rural economy in India) उपनिवेश और औपनिवेशिक शक्ति के बीच के संबंध का रूप ले चुका है। पिछले तमाम वर्षों में गाँवों में निवेश और गाँवों से धन की निकासी के बीच भारी फ़र्क़ के सारे तथ्य इस बात की ठोस रूप में पुष्टि करते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी इजारेदारों की औपनिवेशिक लिप्साओं के प्रतिनिधि की भूमिका में औपनिवेशिक लूट के नेता का रूप अपना चुके हैं। वे अब संघर्ष में उतरे हुए किसानों के प्रति गाली-गलौज की भाषा में बात करने लगे हैं। उन्हें ‘ज़मीन हड़पने वाला’ कहना शुद्ध रूप में खुले आम गालियाँ देना है।

It is also a conflict between agricultural culture and industrial culture.

लड़ाई का यह मसला कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट के प्रसार से, कृषि की जमीन पर उद्योगपतियों के कब्जे का रास्ता साफ़ करने से जुड़ा हुआ है। यह कृषि संस्कृति और औद्योगिक संस्कृति के बीच का भी संघर्ष है। इनमें एक प्रगतिशील और दूसरा प्रतिक्रियावादी है, इस बात को निर्णायक रूप में तय करने का दुनिया में कोई ठोस आधार नहीं है। कहीं पर भी लुटेरे उपनिवेशवादियों की विजय ही उनके जन-हितकारी या प्रगतिशील होने का प्रमाण नहीं होता है। तत्त्व मीमांसा में इस प्रकार के ऐतिहासिक नियतिवाद के लिए कोई जगह नहीं होती है।

औद्योगिक सभ्यता आज जितनी जटिल समस्याओं में उलझी हुई है, उसमें फँसे मनुष्यों की दुर्गति के नित नये जैसे डरावने दृश्य दिखाई देते हैं, उन्हें देखने-समझने के बाद तो तथाकथित औद्योगिक सभ्यता की प्रगतिशीलता के अंतिम निष्कर्षों तक पहुँचने का कोई ठोस आधार ही नहीं बचता है।

ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था पर इजारेदाराना पूंजीवाद के इस औपनिवेशिक एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई में गांव की समूची जनता की एकजुटता का पहलू सबसे अधिक महत्वपूर्ण पहलू है। इसमें कृषि क्षेत्र के उन्नत तबकों का नेतृत्व बिल्कुल स्वाभाविक है। इसकी सफलता की गारंटी ही इस बात में है कि ग्रामीण क्षेत्र के नेतृत्वकारी सभी तबके पूरी ताक़त के साथ इसमें सामने आएं। इसी लड़ाई की प्रक्रिया में ग्रामीण जीवन की वे जड़ताएँ भी टूटेगी जो अन्यथा ग्रामीण जीवन को पुरातनपंथी सोच से जकड़े रहती है। किसी भी प्रकार की सैद्धांतिक जुगाली अथवा नासमझी के चलते गाँव के लोगों की इस सार्विक एकता के महत्व को कमतर बताने या इसमें दरार डालने की कोशिश करने वाली ताक़तों को बल पहुँचाने के उपक्रमों का पूरी घृणा के साथ तिरस्कार किया जाना चाहिए।

इसमें अभी किसानों, खेत मज़दूरों या बटाईदारों के विषय अलग-अलग नहीं रह गए हैं। सभी किसानों को खेत मज़दूर बना देने से किसानों और खेत मज़दूरों किसी की भी किसी समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता है। इसलिए उनके नाम पर किसानों की कृषि क्षेत्र की रक्षा की व्यापक लड़ाई का विरोध करना एक कोरा वितंडा है, बेतुका और विषय को जानबूझकर कर गड्ड-मड्ड करना है।

यहां ग़ौर करने लायक़ बात है कि किसान सभा की पश्चिम बंगाल इकाई ने अपने आंदोलनों के व्यापक अनुभव के आधार पर ही बहुत सालों तक किसान सभा के अतिरिक्त खेत मज़दूरों के अलग संगठन के गठन को नहीं स्वीकारा था। उसके पीछे भी कृषि क्षेत्र के साथ पूँजीवाद के अन्तर्विरोधों की मूलभूत सच्चाई काम कर रही थी।

आज के किसान संघर्ष से भी यह साफ है कि इस लड़ाई में किसान पूरे कृषि क्षेत्र की जनता की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। लड़ाई के इस मंच से किसान-मज़दूर एकता के नारे कम तात्पर्यपूर्ण नहीं है।

भारत की जनता के लिए इस लड़ाई की अहमियत को समझने के लिए यह अकेला तथ्य ही काफ़ी है कि आज भी कृषि क्षेत्र ही देश के 60 प्रतिशत लोगों को रोज़गार दे रहा है। बेरोज़गारी के वर्तमान भयावह स्वरूप को देखते हुए कोई सामान्य बुद्धि का आदमी भी यह जान सकता है कि भारत के औद्योगिक क्षेत्र के पास यहाँ की आधी आबादी को भी रोज़गार देने की ताक़त नहीं है। सारे आँकड़े बताते हैं कि मोदी के कार्यकाल में ही गाँवों से नए सिरे से उजड़ चुके लगभग एक करोड़ लोग रोज़गार न मिलने के कारण दर-दर भटक रहे हैं। उन्हें किसी भी काम में लगाना संभव नहीं हो पा रहा है।

इसीलिए इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश की सभी समस्याओं का समाधान कृषि क्षेत्र के सशक्तिकरण में है। गाँवों में ही अधिक से अधिक लोगों के लिए रोज़गार पैदा करने में है। किसानों की एमएसपी की माँग इस सशक्तिकरण का एक सबसे कारगर उपाय है। किसानों को एमएसपी, खेत मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी में वृद्धि और व्यापक रोज़गार पैदा करने वाले मनरेगा तथा कुटीर उद्योगों की तरह के सरकारी-ग़ैर सरकारी उद्यम, इस तीन-तरफ़ा नीति से ही भारत के गाँवों का स्वरूप बदला जा सकता है। किसानों को ऋण ग्रस्तता के स्थायी रोग से मुक्त कराया जा सकता है, खेत मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाई जा सकती है और गाँवों में रोज़गार पैदा किये जा सकते हैं। और, कृषि क्षेत्र की उन्नति का अर्थ होगा पूरे भारत की उन्नति।

इस प्रक्रिया में कॉरपोरेट का प्रवेश इस प्रकार के सशक्तिकरण की संभावना को ही ख़त्म कर देगा। उसकी भूमिका ग्रामीण बेरोज़गारी के सबसे बड़े इंजन के अलावा दूसरी कुछ नहीं हो सकती है। सारी दुनिया में कॉरपोरेट ने कृषि क्षेत्र में रोज़गारों का सिर्फ़ नाश किया है, अंधाधुंध आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया है। कम आबादियों वाले देशों में इसके ज़रिये औद्योगिक क्षेत्र में मज़दूरों की आपूर्ति को संभव बनाया गया है। लेकिन हमारे यहाँ तो शहरी बेरोज़गारी पहले से ही अपने चरम पर पहुंच है।

इसीलिये मोदी की तरह के जो लोग किसानों की इस लड़ाई को बिचौलियों की लड़ाई कहते हैं, उनकी समझ पर सिर्फ़ तरस खाई जा सकती है। वे उलझनें पैदा करके मोदी के कॉरपोरेट के दलाल के रूप में काम करने के फ़ैसले के समर्थन के अलावा कुछ नहीं है।

किसानों का यह संघर्ष भारत की शहरी और ग्रामीण, पूरी आबादी की बेहतरी का संघर्ष है, इसमें देश के क्रांतिकारी रूपांतरण की संभावनाएँ निहित है। भारत की तक़दीर को बदलने के लिए इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं हो सकता है। यह सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ समूची जनता को एक क्रांतिकारी परिवर्तन की लड़ाई में एकजुट करने का रास्ता है।

-अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
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उपाध्याय अमलेन्दु:
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