नये कृषि कानून किसान के हित में नहीं बल्कि सरकार के चहेते गिरोही पूंजीपतियों के हित में हैं

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नये कृषि कानूनों का विरोध देश की कृषि संस्कृति को बचाये रखने के लिये आवश्यक है।

यह कहना एक छलावा है कि, नये कृषि कानूनों से किसानों की आय बढ़ेगी

20 सितंबर 2020 को जब राज्यसभा ने बेहद अलोकतांत्रिक तरीके से सदन की समस्त संसदीय मर्यादाओं को ताख पर रख कर, तीनों किसान विधेयकों को उपसभापति हरिवंश जी ने पारित घोषित किया तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि वे किसी विधायी सदन का संचालन कर रहे हैं। आप तब के वीडियो (जो यूट्यूब पर अब भी मौजूद हैं) को देखे और उपसभापति की की देहभाषा पर गौर करें तो यही लगता है कि वे यह संकल्प लेकर उस दिन आये थे कि आज यह तीनों बिल सदन से पारित कराना ही है। यह संकल्प उनका था, या किसी का थोपा हुआ, यह बस कयास लगाया जा सकता है।

भले ही बिल अब कानून बन गया हो, पर राज्यसभा में उस दिन की कार्यवाही, देश के विधायी इतिहास का एक विवादित पृष्ठ के रूप में याद किया जाएगा और, हरिवंश जी की भूमिका पर, जब जब इस कानून पर चर्चा होगी, सवाल उठेंगे और उन्हें उठने भी चाहिए।

अब बात उस कानून की, जिस पर सरकार लगातार ऐसे दावे कर रही है कि यह कानून, किसानों के हित में है, जबकि देश के लगभग सभी किसान संगठन इसके विरोध में हैं। लेकिन सरकार के दावे वैसे ही हैं जैसे सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन के समय किये थे और इन तीन मास्टरस्ट्रोक के लाभ भी गिनाए थे। पर आज तक न तो नोटबंदी का लाभ मिला, न जीएसटी का और न लॉकडाउन का। काऱण इन तीनों का मूर्खतापूर्ण क्रियान्वयन और बिना सोचे समझे इनको लागू करना रहा है।

अब फिर से यही कहा जा रहा है कि यह तीनों बिल गेम चेंजर, मास्टरस्ट्रोक और न भूतों प्रकार के कानून हैं जिससे देश का कृषि परिदृश्य ही बदल जायेगा। पर यह सब बदलेगा कैसे, यह न तो सरकार बता पा रही है और न ही इस कानून के पैरोकार।

सरकार का कहना है कि इन कानूनों का उद्देश्य है, कि

● किसान की आमदनी और उनकी समृद्धि में वृद्धि हो।

● कृषि क्षेत्र में निजी निवेश आए, नई टेक्नोलॉजी आए।

● प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में अधिक से अधिक निवेश करे।

● निजी क्षेत्र खेती में उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक में न केवल निवेश बढ़ाए, बल्कि नई तकनीक का भी इस्तेमाल करे।

● इससे किसानों को अपनी उपज की ऊंची कीमत मिलेगी और उनकी आमदनी बढ़ेगी।

भला इन सब बातों और ऐसे पावन उद्देश्य से किसे आपत्ति हो सकती है ?

यह तो हम सब चाहेंगे कि यह सारे उद्देश्य पूरे हों। किसान तो अपनी बेहतरी के लिये लम्बे समय से सरकारों से भिड़ता रहा है कि, उसकी आमदनी बढ़े और उसे उपज का उचित मूल्य मिले। पर यह आज तक नहीं हो सका। आश्वासन, दावों और छलावे के बीच वह तब भी फंसा था, जब ज़मींदारी प्रथा थी और अब भी फंसा है जब अनेक प्रगतिशील भूमि सुधार हो चुके हैं।

आय कैसे बढ़े, इस बिन्दु पर एक नयी थ्योरी आयी है कि, निजी क्षेत्र यानी निजी व्यापारी ही, किसान को उनके उत्पाद की उचित कीमत दे सकता है, और उपज खरीदने के लिये किसी भी पैन कार्ड धारक या व्यापारी या कम्पनी या कॉरपोरेट को कानूनन अधिकृत करने के बाद, इसका लाभ किसानों को मिलेगा। लेकिन कृषि अर्थविशेषज्ञों को इस बिन्दु पर अनेक आशंकाएं हैं।

देश के अग्रणी कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने इस बिन्दु पर अनेक लेख लिखे हैं और अब भी वे इस विषय पर नियमित अपने विचार रख रहे हैं तो उनके अनुसार, इस उम्मीद के दो तीन पहलुओं पर कुछ गम्भीर शंकायें हैं, जिनका समाधान किया जाना जरूरी है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक, 2020 पर चर्चा करते समय, डॉ देविंदर शर्मा कहते हैं कि,

“अगर हम दुनिया भर में देखें तो ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मार्केट रिफॉर्म्स की वजह से किसानों को फायदा हुआ हो। क्योंकि अमेरिका और यूरोप में कई दशकों पहले ओपन मार्केट के लिए कृषि उत्पादों को खोल दिया गया था। और अगर ओपन मार्केट इतना अच्छा होता और किसानों को उसका लाभ मिला होता तो विकसित देश अपने यहां कृषि को जीवित रखने के लिए भारी सब्सिडी क्यों देते हैं?”

वे अमेरिका का उल्लेख करते हुए कहते हैं, जो आजकल हमारे थिंकटैंक, नीति आयोग का थिंकटैंक बना हुआ है,

“2018 की बात करें तो अमेरिका और यूरोप में 246 बिलियन डॉलर की सब्सिडी किसानों को दी गई। अकेले यूरोप में देखें तो 100 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी गई। जिसमें तकरीबन 50 फीसदी डायरेक्ट इनकम सपोर्ट थी। और अमेरिका की बात की जाए तो अध्ययन बताते हैं कि अमेरिका के एक किसान को औसतन लगभग 60 हजार डॉलर सालाना सब्सिडी दी जाती है। यह सिर्फ औसत है, जबकि वैसे देखा जाए तो यह इससे भी अधिक हो सकती है। इसके बावजूद भी अमेरिका के किसान बैंकों के दिवालिया हैं, किसानों पर बैंकों की दिवालिया राशि लगभग 425 बिलियन डॉलर है।”

यह स्थिति अमेरिका की है, जहाँ की सरकार किसानों को सब्सिडी देकर कृषि को ज़िंदा रखे हुए हैं जबकि वहां कृषि कोई संस्कृति में रची बसी चीज है ही नहीं है। इससे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि, कृषि को पालने पोसने के लिये जिलाना पड़ता है और उसे सरकार द्वारा हर प्रकार की सहायता दी जानी चाहिए।

The number of suicides committed by farmers in India is frightening

भारत में किसानों द्वारा की गयी आत्महत्याओं का आंकड़ा भयावह है और यह लम्बे समय से चल रहा है। लेकिन अमेरिका के ग्रामीण क्षेत्रों में आत्महत्यायें होती है, पर उनकी संख्या भारत की तुलना में कम है। भारत में शहरी क्षेत्रों की तुलना में, ग्रामीण क्षेत्रों में आत्महत्याओं का प्रतिशत 45 % है। जिस खुलेपन के कानून पर सरकार आज यह कह रही है कि किसानों की दुनिया बदल जाएगी, उसी खुलेपन के कारण, अमेरिका में धीरे-धीरे कृषि खत्म होती जा रही है। खेत बड़े बड़े कॉरपोरेट के हाथों में इकट्ठे होते जा रहे हैं। मशीनीकरण ने खेती पर आश्रित आबादी को शहर में फेंकना शुरू कर दिया और अब अमेरिका में ओपन मार्केट के 6-7 दशक बाद कृषि पर निर्भर आबादी घटकर 1.5 फीसदी रह गई है। क्या हम भी अगले कुछ दशकों के बाद, इसी अमेरिकी मॉडल को अपनाने जा रहे हैं ? इसी को रेखांकित करते हुए, डॉ. देविंदर शर्मा कह रहे हैं कि,

“इस पर दोबारा चिंतन करना चाहिए कि क्या वह मॉडल, जो अमेरिका और यूरोप में फेल हो चुका है, भारत के लिए उपयोगी रहेगा और भारत के किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा?”

हमारी सरकार, इन कानूनों द्वारा किसानों की आमदनी बढ़ाने के दावे कर रही है, पर जब इसी मॉडल पर हम अमेरिकी किसानों की हालत का जायजा लेते हैं तो एक दिलचस्प आंकड़ा सामने आता है। अमेरिका के, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के चीफ इकोनॉमिस्ट का कहना है कि,

“1960 के दशक के बाद से अमेरिका के किसानों की आमदनी लगातार घट रही है। इसलिए किसानों को सब्सिडी देनी पड़ रही है।”

यही ओपन मार्केट, अमेरिकी किसानों की आय में कोई वृद्धि नहीं कर सका, जिसके सपने दिखा कर भारत सरकार किसानों की आय बढ़ाने के दावे कर रही है, तो यह मॉडल कैसे भारत के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है ?

इसी पर टिप्पणी करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं कि

“इतना ही नहीं, अगर एक्स्पोर्ट की बात की जाए और अगर सब्सिडी हटा दी जाए तो अमेरिका, यूरोप और कनाडा का एक्सपोर्ट 40 फीसदी तक घट जाएगा।”

इसका मतलब यह हुआ कि, केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट भी गिर जाएगा। और जब उत्पादन और एक्सपोर्ट दोनों ही गिर जाएगा तो फिर आय कहाँ से बढ़ेगी ? यह तब की स्थिति है जब सरकार कृषि सब्सिडी कम करती जा रही है और उसका उद्देश्य ही यह है कि धीरे-धीरे सब्सिडी कम कर दी जाय। यह दबाव अमेरिकी थिंकटैंक का है जो भारत के कृषि को तोड़कर देश के आर्थिकी के सबसे मजबूत आधार को ध्वस्त कर देना चाहती है।

किसान संगठन के नेतागण इस खुली बाजार प्रणाली का सारा रागमाला समझ गए हैं। वे साफ-साफ कह रहे हैं कि, किसानों को बाजार के हवाले करने से खेती मजबूत नहीं होगी। लेकिन सरकार इसी राह से किसानों की आय दुगुनी करने के हठ पर अड़ी है।

Today there is a shortage of 34 thousand mandis in the country. After all, where should farmers sell their produce?

आज देश में 34 हजार मंडियों की कमी है। आखिर किसान अपने किसान कहां बेचे अपने उत्पाद ? कहने को तो सरकार कह रही है अब तो बंधन मुक्त हो, कश्मीर से केरल तक मंडी ढूंढो और जहां अच्छा भाव मिले अपनी उपज बेचो। सुनने में यह मुक्त व्यापार और ओपन मार्केट सिस्टम बहुत मोहक है पर किसानों के लिये किसी मोह पाश से कम नहीं है।

अमेरिका की चर्चा को थोड़ा दरकिनार कर के आइये बिहार की ओर चलें। आजकल बिहार में विधानसभा के आमचुनाव भी हैं। सभी दल अपने अपने जुगाड़ में लगे हैं। इसी बिहार में 2006 में इस मुक्त बाजार का एक प्रयोग किया गया था। सन् 2006 में बिहार में एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केट कमेटी), जो किसानों के उपज के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य एमरसपी तय करती है को, भंग कर दिया गया था और कमेटी की मंडियों को यानी सरकारी मंडी सिस्टम को हटा दिया गया था। तब ओपन मार्केट के पैरोकारों ने यह तर्क दिया था कि, इससे प्राइवेट इंवेस्टमेंट आएगा और खेती का चतुर्दिक विकास होने लगेगा। फिर किसानों को उनकी उपज का इतना पैसा मिलने लगेगा कि सरकार की ज़रूरत ही बीच से हट जाएगी और इस प्रकार एक मुक्त कृषि व्यवस्था का विकास खुद-ब-खुद हो जाएगा।

इससे पब्लिक सेक्टर बिल्कुल हट जाएगा। प्राइवेट मंडियां आएंगी और उससे प्राइस रिकवरी होगी (यह टर्म अकसर देश के अर्थशास्त्री इस्तेमाल करते हैं)। प्राइस रिकवरी का मतलब (Meaning of price recovery) है कि किसानों को ज्यादा दाम मिलेगा। यानी किसानों को अपनी उपज के उचित मूल्य के लिये किसी की दया और कृपा पर निर्भर नहीं रहना होगा। उस समय यह कहा जा रहा था कि बिहार में एक नयी कृषि क्रांति आ जाएगी और बिहार पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन जाएगा।

यह भी कहा गया था कि अब पंजाब भूल जाएंगे और कृषि क्षेत्र के लिए बिहार देश का एक नया मॉडल साबित होगा। 14 साल हो चुके हैं, क्या ऐसा हुआ? जिन अर्थशास्त्रियों ने उस समय इस बात को प्रमोट किया था, वो आज आकर क्यों नहीं बताते कि इस रिफॉर्म से बिहार को क्या फायदा पहुंचा ? ऐसा नहीं है कि बिहार के खेत और ज़मीन कम उर्वर हैं, या वे मेहनती कम हैं, सरकार ने अपने शासन नीति में खेत, खलिहान और किसान को रखा ही नहीं। आज स्थिति यह है कि, बिहार के किसान पंजाब जाकर काम करते हैं।

कहने का आशय है कि 2006 में अगर एपीएमसी मंडियां न हटाई गयी होतीं और इसके विपरीत, बिहार में मंडियों का नेटवर्क उसी तरह विकसित किया जाता, जिस तरह पंजाब में किया गया तो आज बिहार के हालात ऐसे नहीं होते।

Government considers mandis a loss deal

सरकार मंडियों को घाटे का सौदा समझती है और धीरे-धीरे उपज की कीमत और मंडियां, सब कुछ कॉरपोरेट के हवाले कर के कृषि बाजार से ही हट जाना चाहती है। यह तो सरकार के नागरिक दायित्व से भागना हुआ। बात अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य की की जाती है, और सरकार इसे कह रही है कि यह जारी रहेगा, पर कैसे, कब तक, और किस तरह, इसका कोई उल्लेख नए कृषि क़ानून में नहीं है।

MSP is not a fair value of the crop. This is the minimum support price.

एक बात हमें यह समझ लेनी चाहिए कि, एमएसपी फसल का उचित मूल्य नहीं है। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य है। इससे कम कीमत पर की गयी खरीददारी पर रोक लगानी ही होगी अगर कृषि संस्कृति को जीवित रखना है तो।

Yogendra Yadav’s statement of Swaraj campaign about MSP

अब एमएसपी के बारे स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव जो कहते हैं उसे एक बार पढ़ा जाना चाहिए। उनके अनुसार,

एमएसपी के बारे में पहला सच यह है कि, किसान की फसल का वाजिब दाम नहीं है, जैसे सरकार स्वयं कहती है, यह न्यूनतम मूल्य है। किसान को मेहनत का जितना कम से कम मेहनताना मिलना ही चाहिए, उसका सूचकांक है। यह देश का दुर्भाग्य है कि यह न्यूनतम भी किसान के लिए एक सपना बन गया है।

● दूसरा सच यह है कि इस न्यूनतम दाम की गिनती भी ठीक ढंग से नहीं होती। आज से 15 साल पहले स्वामीनाथन आयोग ने एमएसपी की सही गिनती का फार्मूला बताया था। आयोग का सुझाव था कि किसी किसान की संपूर्ण लागत पर 50% बचत जोड़कर एमएसपी तय होनी चाहिए। यानी कि अगर गेहूं की लागत ₹1600 प्रति क्विंटल है तो उसकी एमएसपी ₹2400 प्रति क्विंटल होनी चाहिए।

● तीसरा सच यह है कि यह एमएसपी भी देश के अधिकांश किसानों को नसीब नहीं होती। सरकार सिर्फ 23 फसलों में एमएसपी घोषित करती है। फल सब्जियों की एमएसपी घोषित ही नहीं होती। घोषणा के बाद सरकार सिर्फ दो-ढाई फसल में सचमुच न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देती है।

● चौथा सच यह है कि इस आधी अधूरी व्यवस्था को भी खतरा है। मोदी सरकार शुरू से ही एमएसपी से पिंड छुड़ाने के चक्कर में है। 2015 में शांताकुमार कमेटी सिफारिश कर चुकी है कि एफसीआई को सरकारी खरीद बंद कर देनी चाहिए।

● पांचवां बड़ा सच यह है कि सरकार चाहे तो इस व्यवस्था को दुरुस्त कर सकती है। किसान आंदोलन की मांग है कि सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा दे। यानी कि कॉन्ट्रैक्ट खेती और सरकारी मंडी के कानूनों में यह लिख दिया जाए कि कोई भी खरीद एमएसपी से नीचे मान्य नहीं होगी।

The truth is that the government is not willing to spend out of pocket to guarantee the minimum price to the farmer

एमएसपी की गारंटी को सरकारी खरीद के अलावा अन्य कई व्यवस्थाओं से भी सुनिश्चित किया जा सकता है। सरकार बाजार में सीमित दखल देकर दाम बढ़ा सकती है, या किसान के घाटे की भरपाई कर सकती है। लेकिन ऐसी किसी भी व्यवस्था में सरकार का खर्चा होगा। सच यह है कि सरकार किसान को न्यूनतम दाम की गारंटी देने के लिए जेब से खर्च करने को तैयार नहीं है। और जबानी जमा खर्च से किसान को दाम मिल नहीं सकता। इन नए कृषि कानूनों से, किसानों की आय और खुशहाली उसी प्रकार बढ़ जाएगी, जैसे, नोटबंदी से काला धन, और आतंकवाद खत्म हो गया है, जीएसटी से कर व्यवस्था सुधर गयी है और ताली थाली दीया बाती मार्का लॉकडाउन से कोरोना महामारी नियंत्रित हो गयी है।

यह कानून किसी किसान के हित में नहीं बल्कि सरकार के चहेते और गिरोही पूंजीपतियों के हित में है, और इसका विरोध देश की कृषि संस्कृति को बचाये रखने के लिये आवश्यक है।

विजय शंकर सिंह

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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