मोदी को हराना मुमकिन है, मुश्किल नहीं

मोदी को हराना मुमकिन है, मुश्किल नहीं

पिछले दो लोकसभा चुनावों से मौजूदा पीएम का ज़लवा कायम है. इतना ही नहीं उनके नाम पर भाजपा विधानसभा चुनाव भी जीतती जा रही है. ऐसा नहीं कि विधानसभा चुनावों में राज्यों के नेताओं का योगदान नहीं है. मगर उसके साथ मोदी नाम संजीवनी की तरह काम कर रहा है. कई चुनावी विश्लेषण में उनका रसूख कम होता बताया जाता रहा पर परिणाम फिर भी उनके पक्ष में जाता रहा है. हालांकि अब ईवीएम मशीनों के ऊपर हार का ठीकरा फोड़े जाना लगा है. विपक्षी दलों के इस सवालों से उनके बढ़े वोटरों में इस दुराग्रह के प्रति अब स्वीकारता की दर बढ़ रही है.

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में दुबारा योगी की वो भी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन गयी. इस जीत के पीछे हालांकि ये कहा जा सकता है कि ये जीत मोदी की कम योगी की ज्यादा है. पर इसी चुनावों में ज़ब योगी अपनी सरकार की वापसी की गुहार वोटरों से करते दिखे, तब ये कहने से भी नहीं चूके, कि उप्र के विकास के लिए केंद्र में भी भाजपा की सरकार जरूरी है.

सवाल ये है कि क्या मोदी वाकई अजेय है?

चुनावी परिणाम भले उनके पक्ष में जाते दिख रहे हैं, मगर इशारे ये भी कर रहे हैं कि मोदी को हराना भी मुमकिन है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की जहां वापसी हुई, वहीं सपा ने भी उतने वोट पाए जितना आज तक उसे किसी चुनाव में नहीं मिलें.

दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार भी यही बताती है कि जनता भाजपा का विकल्प उससे कम दमखम वाली पार्टियों को नहीं बनाएगी. यहां ये समझने की ज्यादा जरूरत है कि दमखम का मतलब सिर्फ वोटों का तेजी से गैर भाजपा दलों की तरफ पोल होने से नहीं है. अब जनता कथनी करनी में फर्क नहीं देखना चाहती. उसे वहीं लोग पसंद है जिन्हें उनका काम, नाम और काम करने का तरीका सब कुछ दुरुस्त लगता है. यहीं विपक्ष मोदी से मात खाता नजर आता है.

इस समय देश की आबादी का छियासठ फीसद हिस्सा पचीस से तीस आयु वर्ग का है, जो किसी की सरकार बनवाने और पलटने की कूवत रखता है. आप बिहार के जहानाबाद, गया उत्तर प्रदेश के बनारस, आजमगढ़, मध्य प्रदेश के बालाघाट, डिंडोरी जिले जैसी जगहों पर रहने वालों युवाओं से बात करके देखिए, आपको सब कुछ समझ आ जाएगा.

देश के सुदूर हिस्सों में रहने वाले युवा सीधे तौर पर मोदी को हराने वाले नेता का नाम और उस पर विश्वास करने की वजह पूछने लगते है. इससे एक चीज साफ हो जाती है कि सिर्फ मोदी का हव्वा खड़ा कर कुछ नहीं किया जा सकता है, बल्कि उनके समक्ष खड़े होने वाले नेता को मज़बूत दावेदारी दिखानी होगी.

मोदी को हराने का दमखम फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद कांग्रेस पार्टी में नहीं दिख रहा है. यूं लग रहा है जैसे भाजपा का देश से कांग्रेस का सफाया करने का अभियान सफल नहीं तो कम से कम राजनैतिक रूप से उसके अनुरूप ही  होता जा रहा है. देश की सबसे महत्वपूर्ण और एक बेहतरीन विज़न रखने वाली पार्टी फिलहाल अपने अंतर्कलह से जूझ रहीं है. उसके नेतृत्व को लेकर पार्टी में मची उहापोह से जनता के बीच गलत सन्देश जा चुका है. कम से कम युवा वर्ग मानता है कि काँग्रेस में पीएम पद के लायक़ अब नेता नहीं है. ये काफ़ी हद तक सही भी है. मनमोहन सिंह की काबिलियत से सभी वाकिफ है. युवा बेधड़क उनको एक बेहतरीन अर्थशास्त्री, प्रधानमंत्री और मौजूदा समय से ज्यादा रोजगार देना वाले मानते है. लेकिन साथ ही ये भी कहने से नहीं चूकते कि मोदी सरकार अपने रोजगार देने के वादे में बुरी तरह फ्लॉप है.

मोदी सरकार की विशेषता पूछने पर युवकों का मानना है कि इस सरकार में विदेश में भारत का मान बढ़ा है. पहले भारत को इतना सम्मान और कद्दावर स्थान नहीं हासिल था. आज अमरीका हो या रूस, जर्मनी हो या ब्रिटेन, फ्रांस, सब के नजर में भारत दुनिया का महत्वपूर्ण देश है. इसे अभी हाल ही के रूस और उक्रेन के मामले में इसे देखा समझा जा सकता है. जबकि ठीक इसके उलट मोदी सरकार घरेलू मोर्चे पर फेल हैं. न रोजगार, न महंगाई पर कंट्रोल और न ही बहुत बढ़िया व्यापार और औद्योगिक स्थिति. क्योंकि सब ठीक था तब सरकार को जीएसटी की मौजूदा दर को बढ़ाने का क्या मतलब था? इसलिए मोदी सरकार आर्थिक रूप से बेहतरी की जगह बदहाली की तरफ ले जा रही है.

बिहार के मुखर्जी नगर दिल्ली में रहकर तैयारी करने वाले विवेक कुमार आयुष्मान योजना से बेहतर दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य योजना को देते है. ऐसे में सीधा सवाल ये है कि जनता विकल्प तलाश कर रखी है, फिर मोदी को हराना मुश्किल क्यों है? मुश्किल इसलिए है कि लगभग हर विपक्षी क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के तमाम मुक़दमे चल रहे हैं. कई के तो सीबीआई जांच में मामला फाइनल भी है. रही बात केजरीवाल की, तब उनके एक मंत्री इस मामले में जेल में हैं और एक जेल जाने वाले हैं. इसका जिक्र प्रायः वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में करते हैं. इस मसले को एक बार दरकिनार भी कर दिया जाय, तब भी आप के पास अभी राष्ट्रीय स्तर पर हर राज्य में मज़बूत सांगठनिक ढांचा मौजूद नहीं है. जिस तरह से विपक्ष आजकल एकता दिखा रहा है उससे तो नहीं लग रहा कि विपक्ष आगामी आम चुनाव को लेकर गंभीर है, क्योंकि साल भर आम चुनाव को है और अभी विपक्ष उस तरह का एका नहीं दिखा पा रहा है, जिस तरह की दरकार है.

वैसे भी डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर मानते थे कि किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक ही दल को बहुमत नहीं मिलना चाहिए क्योंकि इससे देश को नुकसान होता है. विकास की गति धीमी हो जाती है. फिर, बहुमत पाने वाले दल बेलगाम हो जाते है, जिससे तानाशाही का प्रादुर्भाव होता है. इससे एक बात साफ़ है कि जनता के पास अगर 2024 में कोई मोदी का विकल्प उनके समकक्ष मौजूद रहेगा तब मोदी को हराना मुमकिन है, मुश्किल नहीं.

संजय दुबे ( वरिष्ठ पत्रकार )

संजय दुबे (Sanjay Dubey alis Bittoo Baba), लेखक उप्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। पिछले 25 सालों से लेखन क्षेत्र में सक्रिय।वर्तमान में हर मुख्य हिंदी समाचार पत्रों में नियमित रूप से राजनीति, सामयिक मुद्दे, व्यंग्य पर लेखन यात्रा जारी।
संजय दुबे (Sanjay Dubey alis Bittoo Baba), लेखक उप्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। पिछले 25 सालों से लेखन क्षेत्र में सक्रिय। वर्तमान में हर मुख्य हिंदी समाचार पत्रों में नियमित रूप से राजनीति, सामयिक मुद्दे, व्यंग्य पर लेखन यात्रा जारी।
भाजपा के लिए सिरदर्द बनी भारत जोड़ो यात्रा hastakshep | हस्तक्षेप

It is possible to defeat Modi, not difficult

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