हर पल चलती फिरती लाशों से टकरा रहे हैं, यह संवादहीनता का दौर है

हर पल चलती फिरती लाशों से टकरा रहे हैं, यह संवादहीनता का दौर है

डॉ सुनील हालदार दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके। उत्तर प्रदेश काल में हल्द्वानी से 50 हजार वोट मिले बीएसपी से। फिर माकपा से भी लड़े। साइकिल से भारत की परिक्रमा कर चुके हैं। हमारे घनिष्ठ मित्र हैं। इन दिनों कोलकाता गए हुए हैं, वहां एनआरएस अस्पताल में उनकी बेटी कार्यरत है।

असीमदा की मृत्यु के बाद उनके परिजनों से मिलने गया था। बगल वाला घर उनकी बड़ी बेटी का है। बिटिया से मैंने पूछा कि पापा कब आएंगे। वह बोली, मेरे श्वसुर की पुण्यतिथि पर लौटेंगे।

बिटिया के श्वसुर डॉ अमूल्य 60 के दशक में डॉ सन्त प्रकाश के कम्पाअंडर थे। बाद में डॉक्टर बन गए। अत्यंत सज्जन, अत्यंत लोकप्रिय। डॉ सन्त प्रकाश की डिस्पेंसरी में तब दिनेशपुर का पोस्ट ऑफिस चलता था। हमारे घर कोलकाता से दैनिक बसुमति डाक से आता था।

पिताजी पुलिन बाबू राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, सचिवों, मुख्यमंत्रियों, विपक्षी नेताओं को रोज देशभर के शरणार्थियों और किसानों की समस्याओं को लेकर रोज दर्जनों रजिस्टर्ड पावती पत्र लिखा करते थे। कक्षा दो से ये पत्र मुझे लिखने होते थे। बाद में इन्हें पोस्ट करने की जिम्मेदारी भी मेरी थी।

हमारी डाक रोज आती थी। पत्र पत्रिकाओं के अलावा भारत सरकार, राज्य सरकारों और देश भर की जनसमस्याओं को लेकर चिट्ठियां आती थीं। मैं लिफाफों से टिकट निकालकर खजाना जोड़ता था। दुनिया भर का साहित्य और डाकटिकट हमारे खजाने में थे।

स्कूल से घर वापसी से पहले पोस्ट ऑफिस जाना होता था।

पोस्ट ऑफिस में ही एक लम्बी सी ऊंची टेबिल थी। एक कोना अमूल्य बाबू का था। वहीं से वे मरीजों को दवा इंजेक्शन देते थे।

पोस्ट मास्टर की कुर्सी पर डॉ सन्त प्रकाश बैठते थे। मरीजों को ऊंची टेबिल पर बिठाकर, लिटाकर देखते थे।

हमेँ अक्सर खेलते हुए या साइकिल चलाते हुए चोट लगती थी तो वे उठाकर टेबिल पर बिठाकर मरहम पट्टी कर देते थे। उसी टेबिल पर अमूल्य बाबू जरूरत हुई तो इंजेक्शन भी ठोंक देते थे।

डॉ सन्त प्रकाश का बेटा पप्पू मेरा सहपाठी था। उनकी बेटी सावित्री बहुत सुंदर थी और हमसे दो कक्षा नीचे थी। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वह कभी सरस्वती तो कभी भारत माता बनती थी।

दिनेशपुर में तब आईटीआई, हाईस्कूल और अस्पताल के बाद पोस्ट ऑफिस ही उल्लेखनीय स्थान था। साप्ताहिक बाजार लगता था। सड़क के दोनों किनारे कुछ दुकानें थीं।

बचपन की इन समृतियाँ से गहरे जुड़े थे अमूल्य बाबू। डॉ सुनील हालदार मलकानगिरी से शायद अस्सी के दशक में दिनेशपुर आये। उन्हें दिनेशपुर के ये बिम्ब मालूम नहीं हैं। पिछले साल भर में दर्जनों बार उनके साथ लम्बी बातचीत हुई। जब भी मैं हमारे सहयोगी ज्योतिष राय को प्रेरणा अंशु का मैटर देने जाता, उनसे जरूर मिलता लेकिन उन्होंने अपने समधी के देहांत के बारे में नहीं बताया। साल भर में दिनेशपुर में किसी ने कुछ नहीं कहा।

बिटिया ने कहा कि कोरोना के कारण लोगों को सूचना नहीं मिली होगी। सही भी है। कोरोना काल में कितने अपने लोग मर खो गए, हमें कितनी जानकारी है?

डेढ़ महीने ही गए हमारे मित्र दीप्ति सुंदर को गए। दिनेशपुर के लोकप्रिय संगीतकार की मृत्यु की खबर अब भी दिनेशपुर के लोग ही नहीं जानती।

उस दिन टेम्पो में एक महिला अपने नन्हे से बेटे को लेकर मेरे साथ बैठी थी। छोटे बच्चों से संवाद का कोई मौका में नहीं खोता। उससे पूछा, घूमने गए थे? वह नहीं बोला, उसकी मम्मी बोली, मामा के घर गए थे राधाकांतपुर। मैंने पूछ लिया, कौन बाड़ी?

उन्होंने कहा, वैद्य बाड़ी। उनके वहां हमारा आना जाना है। लिहाजा अगला सवाल, ससुराल कहाँ है? उन्होंने कहा, शिवपुर। परितोष मण्डल मेरे श्वसुर थे। परितोष जी भी हमारे घनिष्ठ मित्र थे। अब उन्होंने बिना पूछे बताया, चंडीपुर के सन्यासी मण्डल मेरे दादाजी है। सन्यासी मण्डल मेरे पिताजी के मित्र और तराई बसाने वाले साथी थे। जिनसे मैं, रूपेश और विकास स्वर्णकार मिलने गए थे।

कोलकाता में भी आम लोगों से हमारी जमकर बात होती थी। सब्जी बाजार में किसी एक दुकान से दस मिनट में सब्जियां खरीद लेता था। उसके बाद सारे सब्जीवाले मछली वाले जमा होकर सवाल पूछते थे। जवाब देते-देते दो-दो घण्टे बीत जाते थे।

तराई लौटकर भी अपने बच्चों की खोज में हर व्यक्ति से, पुरुष स्त्री, बच्चे, रिक्शा वाला, ऑटो वाला, रेहड़ी वाले, सब्जी वाला, छात्र छात्राओं, नौजवानों, फेरीवाले, दुकानदार से बातचीत करता हूँ। पुरानी समृतियाँ जीवंत हो जाती है।

मेरे पिताजी और ताऊजी, मेरे गांव के लोग यही करते थे। तराई भाबर के बंगाली, सिख, पंजाबी, मारवाड़ी, मुसलमान, पहाड़ी, बक्सा, थारू हर गांव की खबर रखते थे। सबके सुख दुख में शामिल होते थे।

56 साल पहले सोने का भाव 67 रुपये थे। लोग गरीब थे। फिर भी सोने का चलन था। आज सोने का भाव 50 हजार पार है।

लोग अमीर हो गए हैं। पहले झोपड़ियां थीं। अब कोठियां हैं। चहारदीवारियाँ हैं।

हर घर लोहे के बड़े फाटक में बन्द है। जिसने मनुष्यता और संस्कृति दम तोड़ रही है। गांवों और खेतों में भी ऑक्सीजन नहीं है। हम अपने आने घरों में कैद है।

अब कहीं से कोई डाक नही आती। डिजिटल इंडिया क्रियोटिकरेंसी के शिकंजे में है। हर चीज बिकाऊ है। मनुष्य भी बिकाऊ है।

सोना चलन से बाहर है।

हम जैसे बूढ़े लोग किसी काम के नहीं रहे।

बूढ़ों के लिए यह दुनिया नहीं रही।

बूढ़ों को इस दुनिया से कुछ कर देना चाहिए।

कुछ अरब डॉलर होते तो नई दुनिया की खोज में अंतरिक्ष में चला जाता।

यह ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी हुई। हर पल चलती फिरती लाशों से टकरा रहे हैं।

यह संवादहीनता का दौर है।

पलाश विश्वास

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