बड़ी खबर : मरकज़ निज़ामुद्दीन के मीडिया ट्रायल से सख्त नाराज़ जमीयत उलेमा हिन्द पहुंची सुप्रीम कोर्ट

Jamiat Ulema Hind is bitterly angry with media institutions blaming Muslims and the Tabligi group for the Corona virus spread in the country

नई दिल्ली, 07 अप्रैल 2020. देश में फैले कोरोना वायरस को लेकर मुसलमानों और तबलीगी जमात को ज़िम्मेदार ठहराने वाले मीडिया संस्थानों से जमीयत उलेमा हिंद सख्त नाराज़ है। सोमवार को जमीयत उलेमा हिन्द ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में निजामुद्दीन मरकज मुद्दे को सांप्रदायिक बनाने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक जमीयत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी की तरफ से एडवोकेट एजाज मकबूल ने तब्लीगी जमात के मुद्दे पर मीडिया ट्रायल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका दायर की है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि मीडिया ने निजामुद्दीन मरकज़ मामले को सांप्रदायिक रूप दिया है।

अधिवक्ता एजाज मकबूल द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा तब्लीगी जमात के कुछ हिस्सों पर रिपोर्ट ने “पूरे मुस्लिम समुदाय को अपमानित किया है।

दलील में आगे कहा गया है कि मीडिया के इस रोल ने गंभीर रूप से “मुसलमानों के जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरा” पैदा कर दिया है, और इस तरह उनके “राइट टू लाइफ अंडर 21” का उल्लंघन हुआ।

याचिका में कहा गया है कि अधिकांश रिपोर्टों को “कोरोना जिहाद”, “कोरोना आतंकवाद” या “इस्लामिक कट्टरपंथ” जैसे वाकियों का उपयोग करते हुए ग़लत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

याचिका में “कई सोशल मीडिया पोस्ट्स” को भी सूचीबद्ध किया गया है जो “गलत तरीके से मुसलमानों को COVID ​​-19 फैलाने के ज़िम्मेदार बता रही है। साथ ही झूठे और फर्जी वीडियो का भी जिक्र किया गया है। निजामुद्दीन मरकज घटना को कवर करते समय एक समुदाय को निशाना बनाया गया है जिसने मुस्लिम समुदाय के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन किया है। इस तरह की रिपोर्टिंग धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत है ? क्या सोशल मीडिया वेबसाइटों पर फैलाई जा रही फर्जी खबरों और सांप्रदायिक बयानों को रोकने में सरकार विफल है ?

मीडिया की ओर से इसे “घोर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार” करार देते हुए दलील में कहा गया है कि इस तरह की खबरें समाज में बंटवारे को लेकर बनाई गई हैं। इस तरह के सांप्रदायिक पत्रकारिता में विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का प्रभाव होता है और देश में सामाजिक अशांति पैदा करने का प्रभाव भी हो सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के 31 मार्च के आदेश का उल्लंघन किया गया है, “मीडिया को जिम्मेदारी की एक मजबूत भावना बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया गया था कि असत्यापित समाचारों को प्रकाशित ना करें।

याचिका में “निज़ामुद्दीन मरकज़ मुद्दे के संबंध में कट्टरता और सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले मीडिया के वर्गों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।

निजामुद्दीन के मरकज में हुए कार्यक्रम के बाद कोरोना संक्रमण पर हुई खबरों को संगठन ने दुर्भावना से भरा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. इस मामले में इस संगठन का कहना है कि मीडिया गैरजिम्मेदारी से काम कर रहा है। इस मुद्दे को ऐसा दिखा रहा है जैसे मुसलमान कोरोना फैलाने की मुहिम चला रहे हैं।

संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से इस तरह की मीडिया कवरेज पर रोक लगाने की मांग की है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट से मीडिया और सोशल मीडिया में झूठी खबर फैलाने वालों पर कार्रवाई का आदेश देने का अनुरोध किया गया है।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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