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Jawaharlal Nehru

पं. नेहरू ! एक नायक

पं. नेहरू ! एक नायक

देश के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पं. जवाहरलाल नेहरू (India’s first Prime Minister and Congress leader Pt. Jawaharlal Nehru) को आज की युवा पीढ़ी जानती ही नहीं है असल में पं. नेहरू थे कौन? (Who was Pt. Nehru?) वह तो बस वाट्सएप यूनिवर्सिटी और ट्विटर वारियर्स (WhatsApp University and Twitter Warriors ) द्वारा दुष्प्रचारित किये गये उसी नेहरू को जानती है जो अय्याश और औरतों का बहुत शौकीन व्यक्ति था और जिसने एडविना माउंटबेटन के प्यार के लिए भारत को गिरवी रख दिया था।

The propaganda against Nehru has been going on for decades

नेहरू के खिलाफ दुष्प्रचार तो दशकों से चला आ रहा है पर पिछले कुछ सालों में इसमें तेजी आई है और नेहरू के खिलाफ बार-बार यह भी मिथक फैलाया जाता है कि वह गांधी की कृपा से प्रधानमंत्री बने।

अब आप वाट्सएप यूनिवर्सिटी के वारियर्स द्वारा फैलाये गए इन मिथकों छोड़कर यह सच्चाई भी जान लें।

सरदार पटेल भी पंडित नेहरू को अपना नेता घोषित कर चुके थे और उन्होंने कहा था कि बापू के सारे सैनिकों का फर्ज है कि वे जवाहरलाल जी के पूरे आदेशों का पालन करें।

पंडित नेहरू और सरदार पटेल में मतभेद जरूर थे पर मनभेद कभी नहीं

पंडित नेहरू बैरिस्टर थे, उन्होंने कैम्ब्रिज से उच्च श्रेणी में वकालत की डिग्री अपनी काबिलियत के दम पर प्राप्त की थी। वह खानदानी रईस यानी खूब अमीर परिवार से थे। उनका पहला घर “आनंद भवन” विदेशी साज-सामानों से सजाया गया था, जो विलासिता का उदाहरण है। एक दिन उनकी मुलाकात गांधी जी से हो जाती है और वे अपनी शानो शौकत वाली जिदंगी छोड़कर अपनी सारी जिंदगी देश की सेवा में समर्पित कर देने का संकल्प लेते हैं और भारत की आजादी की लड़ाई की खातिर वह अपनी जवानी के कीमती 10 वर्ष जेल में बिता देते हैं।

आजादी के बाद दुनिया के कई देशों ने तो मान लिया था कि भारत एक देश के रूप में फ़ेल हो जाएगा, वो पंडित नेहरू की विलक्षण प्रतिभा का ही कमाल था, जिसके कारण आज भारत का ध्वज विश्व के पटल पर लहरा रहा है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पंडित नेहरू ने 21 वर्षों किया उतना काम तो 200 वर्षों के बराबर है।

पंडित नेहरू का यह सच आपके पसंद करने या नापसंद करने से बदलने वाला नहीं है।

Pandit Nehru favored a strong opposition in democracy

पंडित नेहरू लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष के हिमायती थे और उन्हें इस बात की भी चिंता रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद पहुंचें। नेहरू की इन्हीं खूबियों की बदौलत लोहिया, अटल बिहारी और आडवाणी भी उनकी तारीफ किया करते थे।

वो नेहरू का ही व्यक्तित्व था, जो हर तरफ से अपनी जय जय कार से ऊब कर 1957 में मॉडर्न टाईम्स में खुद के खिलाफ ही जबर्दस्त लेख लिख डाला था।

पंडित नेहरू से शुरू हुआ यह दुष्प्रचार का सिलसिला अब महात्मा गांधी और इंदिरा गाँधी तक आ पहुंचा है। गांधी जयंती और नेहरू जयंती पर ट्विटर में चलने वाले ट्रेंड को देखकर आपको लोगों की ठरकी सोच नजर आने लगेगी।

एयर इंडिया से लेकर भारत पेट्रोलियम जैसी कम्पनियां भी नेहरू, इंदिरा की ही देन हैं जिसे आज बेचा जा रहा है।

नेहरू के खिलाफ मिथकों में एक मिथक यह भी है कि वे भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ थे, जबकि सच्चाई इसके उलट है। नेहरू भगत सिंह से मिले भी थे और ये भी कहा था, “हम भगत सिंह न बचा सके, हमारी इस असर्मथता पर देश दुखी होगा और जब अंग्रेजी हुकूमत हमसे समझौते की बात करेगी तो हमारे और उसके बीच भगत सिंह की लाश भी पड़ी होगी।”

भगत सिंह का त्याग और बलिदान इतने उंचे दर्जे का है कि अहिंसा के दूत बापू भी भगत सिंह के नि:स्वार्थ त्याग और वीरता की प्रशंसा कर रहे हैं और पंडित नेहरू अपने पिता मोतीलाल नेहरू और गांधी जी के खिलाफ भी सुभाष चन्द्र बोस के पक्ष में खड़े हो गए थे जब कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ‘डोमिनियम स्टेट्स’ के प्रस्ताव में सुभाष चन्द्र बोस ने संशोधन पेश किया और कहा कि भारत को सम्पूर्ण आजादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

अमेरिका के ह्यूस्टन में हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने एक अमेरिकी सांसद द्वारा कहा जा रहा था कि

“अमेरिका की तरह भारत भी अपनी परंपराओं पर गर्व करता है, जिससे वह अपने भविष्य को गांधी की शिक्षा और नेहरू की उस सोच जिसमें भारत को धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्र बनाने की बात है, उसका बचाव कर सके, जहां प्रत्येक व्यक्ति और उसके मानवाधिकारो का सम्मान किया जाएगा” तो अमेरिकी सांसद की इसी बात से नेहरू के व्यक्तित्व और उनकी लोकप्रियता का पता लगा लीजिए।

नेहरू जब जीवित थे तो उनकी देश में जबरदस्त लोकप्रियता तो थी ही और साथ ही विदेशों में भी धाक थी, जबकि आज की तुलना में न तो इतने भारतीय विदेशों हुआ करते थे और न कोई इवेंट मैनेजमेंट होता था पर नेहरू को भी क्या पता था कि जिस देश के लिए वो अपनी जिंदगी क़ुर्बान कर रहे हैं, एकदिन ऐसा भी आएगा कि उसी देश में उनको नायक से खलनायक बनाया जाएगा और हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

बेशक राजनीति में किसी की नीतियों की आलोचना की जा सकती है परन्तु आलोचना का स्तर इतना भी नहीं गिरना चाहिए कि उसके खिलाफ भ्रामक और झूठी कहानियाँ गढ़ी जाएं।

आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वो वाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा फैलाये गए भ्रामक प्रचार को छोड़कर नेहरू और पटेल दो गांधीवादी नेताओं की जीवनी पढ़े जिससे उसको राष्ट्र निर्माण में उनके त्याग और बलिदान का पता चल सके।

खुर्शीद पठान

(लेखक युवा पत्रकार व एमजेएमसी के छात्र हैं।)

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पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

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