जानिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कोंकणी लेखक दामोदर मौजो के बारे में जो दक्षिणपंथी अतिवादियों की हिट लिस्ट में हैं शामिल

जानिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कोंकणी लेखक दामोदर मौजो के बारे में जो दक्षिणपंथी अतिवादियों की हिट लिस्ट में हैं शामिल

Know about Jnanpith Award winning Konkani writer Damodar Mauzo in Hindi,

दक्षिणपंथी अतिवाद पर बहस की जरूरत (Debate on right wing extremism needed)

नोबेल पुरस्कार विजेता महान पोर्तुगीज लेखक जोसे सारामागो– (Nobel Prize winning great Portuguese writer José Saramago 1922-2010) का एक बेहद चर्चित उपन्यास है ‘ब्लाइंडनेस’ ( दृष्टिहीनता)। उपन्यास किसी अजनबी शहर में एक संक्रमण की तरह फैली अंधत्व की बीमारी (blindness) और उसके बाद हुए सामाजिक विघटन आदि पर बात करता है। अपने वामपंथी विचारों (leftist ideas) के लिए जाने-जाते जोसे सारामागो का उपन्यास ब्लाइंडनेस (‘Blindness’ by José Saramago) महामारी के दिनों में हमारे अनुभवों की याद दिला सकते हैं। एक बड़ा रचनाकार दरअसल एक भविष्यवेत्ता भी कहा जा सकता है, जो अपने कलाम में,, अपनी रचनाओं में हमारे भविष्य को पढ़ रहा होता है, भले ही हम गौर करना चाहें या ना करना चाहें।

Announcement of Jnanpith Award for the year 2021 and 2022 : Konkani litterateur “Damodar Moujo” will be given this honor

इस साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कोंकणी लेखक दामोदर मौजो (Konkani writer Damodar Mauzo honored with Jnanpith Award) के उपन्यासों में, कहानियों में अक्सर हम उस आसन्न भविष्य से रूबरू होते है और अपने आप से पूछ बैठते हैं कि दक्षिणी गोवा के अपने गांव माजोरडा के अपने दुकान में बैठे हुए अपनी साहित्य रचना शुरू किए इस लेखक ने आखिर कहां उस भविष्य का स्पंदन महसूस किया होगा।

प्रश्न उठता है कि आज जब साहित्य के क्षेत्र में ‘अभूतपूर्व योगदान’ के लिए वह सम्मानित हो रहे हैं, तो क्या इस बहाने उठी चर्चा महज साहित्य की सीमाएं तक ही महदूद रहेगी या शेष समाज को अपने आगोश में ले लेगी। क्या हमारे जिस भविष्य को वह अपनी कहानियों, उपन्यासों में चित्रित कर रहे हैं, या सार्वजनिक तौर पर ऐसे मसलों पर भी बोलते रहे हैं, हम उस पर भी इसी बहाने बात करेंगे?

कोंकणी के जानकार उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘कारमेलिन’ /1980/ की बात करते हैं – जो अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में भी अनूदित हुआ है – जिसमें उन्होंने मध्य पूर्व के देशों में आया बन कर या घरेलू कामगार बन कर जाने वाली महिलाओं द्वारा झेली जाती यौनिक तथा अन्य प्रताड़नाओं के बारे में लिखा था, जबकि उस परिघटना की कोई चर्चा नहीं थी या उनकी बहुचर्चित कहानी ‘बर्गर’ को देखें, जिसमें दो स्कूली बच्चियां इरेन और शर्मिला, जो गहरी दोस्त भी हैं, उनके बहाने बीफ को लेकर हमारे समाज में बाद में उठाए गए विवाद की झलक दिख जाती है।

दरअसल स्कूल में अपना खाना एक दूसरे से शेयर करने के बाद खुशी-खुशी घर लौटी इरेन को उसकी मां बताती है कि तुमने शर्मिला को बीफ रखा बर्गर दिया और उसका ‘धर्म भ्रष्ट किया’। पापबोध से ग्रस्त छोटी इरेन बाद में चर्च पहुंचती है और ईसा की मूर्ति के सामने माफी मांगती है/कन्फेशन देती है। या आप उनकी एक अन्य कहानी में अपने दुधारू पशुओं को बेचने के लिए गोवा पहुंचे किसी दलित युवक की आपबीती बताता है, जब उसका गौ आतंकियों से सामना होता है, जो उस पर तरह-तरह के आरोप लगाते हैं और उसको प्रताड़ित करते हैं।

शायद उनकी ‘तीसरी आंख’ की यही वह क्षमता है जो उन्हें तात्कालिक और स्वत: स्पष्ट से आगे देखने का मौका देती है, जिसने उन्हें इस बात के लिए भी प्रेरित किया है कि वह ताउम्र महज कलम और कागज का समीकरण बनाए रखने तक अपने आप को सीमित न रखें बल्कि ऐसे मुद्दों पर- जो सामाजिक-राजनीतिक तौर पर अहम हैं – उन पर भी अपनी जुबां खोले।

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के बाद ( 2015) में उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत में जोरदार बात कही थी और ”एकल संस्कृतिवाद के हिमायतियों द्वारा की जाने वाली नैतिक पहरेदारी” को जम कर लताड़ा था।

मौउजो ने अपने इस भाषण में बताया था कि जहां उन्हें फक्र है कि वह आपसी सद्भाव में रहने वाले लोगों से बने गोवा के रहने वाले हैं, वहीं वह इस बात से शर्मिन्दा भी है, यहीं पर ‘सनातन संस्था; जैसे संगठन सक्रिय रहे हैं।

दक्षिणपंथी अतिवादियों की हिट लिस्ट में दामोदर मौउजो

बमुश्किल तीन साल पहले यह बात भी उजागर हुई कि दक्षिणपंथी अतिवाद (right wing extremism) के अपने समझौताहीन विरोध के चलते दामोदर मौउजो का नाम भी उस ‘हिट लिस्ट’ में मिला है, जो आतंकी घटनाओं में गिरफ्तार कुछ कार्यकर्ताओं – जो कथित तौर पर इन संगठनों से जुड़े थे – से बरामद हुए हैं।

दामोदर मौउजो के स्वर धीमे न हुए

जान से मारे जाने की इन विधिवत योजना के उजागर होने के बाद भी न दामोदर मौउजो के स्वर धीमे हुए, न बाकी किसी ने अपनी आवाज़ मद्धिम की।

ध्यान रहे कि सनातन संस्था का नाम देश के पैमाने पर मालेगांव बम विस्फोट (सितम्बर 2008) के चन्द माह पहले पहली बार तब सुर्खियां बना था, जब वाशी, ठाणे आदि स्थानों पर हुए बम विस्फोटों को लेकर महाराष्ट्र एंटी टेररिस्ट स्क्वाड के प्रमुख हेमंत करकरे (Maharashtra Anti Terrorist Squad chief Hemant Karkare) ने इस संगठन के कथित तौर पर सम्बद्ध कार्यकर्ताओं को पकड़ा था, जिनमें से दो को बाद में बम्बई सत्र न्यायालय ने (रमेश हनुमन्त गडकरी उम्र 53 और विक्रम विनय भावे उम्र 29) को विस्फोटक पदार्थ रखने एवं उसके इस्तेमाल का दोषी पाया तथा दस साल की सज़ा भी सुनाई थी।

अक्तूबर 2009 में इस संगठन से कथित तौर पर सम्बद्ध दो आतंकी – मालगोण्डा पाटिल और योगेश नायक- मडगांव बम विस्फोट में तब मारे गए थे जब वे दोनों नरकासुर दहन नाम से समूचे गोवा में लोकप्रिय कार्यक्रम के पास विस्फोटकों से लदे स्कूटर पर जा रहे थे और रास्ते में ही विस्फोट हो जाने से न केवल उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा बल्कि उनकी समूची साजिश का भी खुलासा हुआ। वे पुलिस को भी गुमराह करना चाह रहे थे ताकि सारा दोष मुसलमानों के माथे जाए। इस हमले के लिए उनके स्कूटर से बरामद हुई दिल्ली के खान मार्किट से खरीदी बैग, अल्पसंख्यकों में प्रयोग में आनेवाला पारम्पारिक किस्म का इत्र और बासमती चावल का एक खाली झोला जिसमें सब उर्दू में लिखा था, इन सामानों से वे अपना यह लक्ष्य हासिल करना चाह रहे थे।

बाद में यह बात भी पता चली कि सनातन संस्था एवं उसके सहयोगी संगठन हिन्दू जनजाग्रति समिति के कार्यकर्ता दिवाली के वक्त नरकासुर बनाने और उसके दहन की लम्बी परम्परा के खिलाफ लम्बे समय से अभियान चलाते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि इस तरह एक राक्षस की झांकी तैयार करना शैतान का महिमामण्डन करना है और यह हिन्दू संस्कृति का अपमान है।

बाद में जब मारे गए इन साधकों – मालगोण्डा पाटिल और योगेश नायक – जैसों के साथ अपने सम्बन्ध से ‘सनातन संस्था’ ने इन्कार किया, उस वक़्त डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर ने पणजी में आयोजित एक जनसभा में यह प्रश्न उठाया था।

आखिर ऐसा क्यों होता है कि सनातन संस्था के कार्यकर्ता अक्सर उसी किस्म का ”गलत रास्ता” अपनाते हैं और अधिक विचारणीय यह है कि आखिर इस तर्क को किस तरह स्वीकार किया जाता है और एक संस्था के तौर पर कोई कार्रवाई हुए बिना ही संस्था बेदाग छूटती है?

यह बात भी अविश्वसनीय लगती है कि सनातन संस्था से सम्बद्ध कुछ स्वच्छन्द/स्वेच्छाचारी कार्यकर्ता, एक बेहद अनुशासित एवं गोपनीय संगठन से स्वतंत्र होकर विस्फोटों को अंजाम दें तथा इस पूरे प्रसंग की संगठन के किसी वरिष्ठ नेता को कोई जानकारी तक न हो।”

वैसे अब तक का सरकारी रिकॉर्ड- फिर भले केन्द्र में सत्तासीन हुकूमत का हो या राज्य में सत्तासीन सरकारों का हो – कम से कम सनातन संस्था एवं उसके सहोदर संगठनों के बारे में रूख तय करने के मामले में, उत्साहित करने वाला नहीं है।

अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो ढेर सारे मासूमों का खून बहने से बचा जा सकता था, अगर महाराष्ट्र सरकार ने और केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार थी, तत्कालीन एटीएस के प्रमुख हेमन्त करकरे के प्रस्ताव पर गौर किया होता, जिन्होंने खुद पनवेल, थाने बम विस्फोटों की जांच (Panvel, Thane bomb blasts investigation) की थी और इसमें कथित तौर पर मुब्तिला सनातन संस्था पर पाबंदी लगाने की मांग (Demand to ban Sanatan Sanstha) की थी।

आज यह सब हमारे सामने ही है कि आक्रामक बहुसंख्यकवाद (aggressive majoritarianism) के आगमन के बाद लगातार यह कोशिश जोरों पर है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को आज़ाद भारत में अपनी ”हैसियत” बताई जाए,. यह देखना बाकी है कि अब आगे क्या होगा?

क्या समाज में विघटन, विभाजन, नफ़रत फैलाने वाले संगठनों के बारे में हम अपना मुंह नहीं खोलेंगे?

हम मौउजो के एक और भाषण को याद कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने ऐसे मसलों पर मौन को सुविधाजनक मौन कहा था और आह्वान किया था कि हमारा मौन ऐसे ताकतों को नई वैधता देता है, नई ताकत प्रदान करता है।

सुभाष गाताडे

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