जेएनयू हमला : खतरनाक इशारे, मौजूदा शासकों की बौखलाहट देश को बहुत खतरनाक स्थिति की ओर धकेल रही है

JNU Violance, जेएनयू में एबीवीपी, JNU Violance Live updates, demand for Amit Shah's resignation,

JNU attack: Dangerous gestures, the fury of the current rulers is pushing the country towards a very dangerous situation.

भारतीय संविधान में सीएए-एनपीआर-एनआरसी (CAA-NPR-NRC) का त्रिशूल घोंपने के अपने मंसूबों के लगातार बढ़ते और बहुत हद तक स्वत:स्फूर्त विरोध पर, मोदी सरकार और संघ परिवार के विभिन्न बाजुओं की बौखलाहट साफ दिखाई देने लगी है। यह बौखलाहट इससे और ज्यादा बढ़ गयी है कि भाजपा-शासित भारत में और उसमें भी खासतौर पर उत्तर प्रदेश, कर्नाटक तथा असम में और राजधानी दिल्ली में भी, जिसकी कानून व व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार के हाथों में है, विरोध-प्रदर्शन करने को ही अपराध बनाने से लेकर, प्रदर्शनकारियों पर बर्बर तथा अंधाधुंध पुलिसिया हिंसा करने और सामूहिक जुर्माने थोपने तक के ब्रिटिश राज के जमाने के तरीके आजमाने के बावजूद, विरोध का यह ज्वार का रुक नहीं रहा है। उल्टे हर गुजरने वाले दिन के साथ उसका वेग और बढ़ता जा रहा है।

इसके साथ ही इसे सिर्फ मुसलमानों का मामले में घटाकर, बहुसंख्यक समुदाय को अपने पीछे गोलबंद करने की भाजपा-संघ की कोशिशें न सिर्फ नाकाम हो रही हैं बल्कि प्रतिरोध की कतारों में युवाओं, महिलाओं तथा संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा से प्यार करने वाले सभी जनतांत्रिक विचार के लोगों की मौजूदगी ने उनके सामने ऐसी ताकत को ला खड़ा किया है, जो एक पौराणिक पात्र की तरह, सामना होते ही मुकाबले के लिए आने वाले की आधी नैतिक-वैचारिक शक्ति का हरण कर लेती है।

एक हाथ में तिरंगा और एक हाथ में संविधान लेकर, सत्याग्रही शैली में संविधान की प्रस्तावना के  सामूहिक पाठ करने से लेकर ‘हम कागज नहीं दिखाएंगे’ और ‘हम संविधान बचाएंगे’ के एलान करने तक के अपने अहिंसक हथियारों से इस जन-शक्ति ने, मौजूदा शासन के सारे हथियारों को विफल कर दिया है।

अचरज नहीं कि इसकी बौखलाहट में संघ परिवार शासन की हिंसा से आगे, अपने विभिन्न मुखों से सीधे खुद हिंसा की धमकियां देने पर उतर आया है।

इन धमकियों के दो उदाहरणों ने विशेष रूप से मीडिया का ध्यान खींचा है।

एक उदाहरण, उत्तर प्रदेश के कथित योगी राज से ही है, जहां राज्य सरकार के एक मंत्री, रघुराज सिंह ने सार्वजनिक रूप से धमकी दी है कि वह मोदी या योगी का विरोध करने वाले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों को, जिंदा जमीन गाढ़ देगा!

दूसरा, इतना ही चर्चित प्रकरण प. बंगाल के भाजपा अध्यक्ष, दिलीप घोष के अपनी पार्टी की उत्तर प्रदेश, कर्नाटक तथा असम की सरकारों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने वालों को, कुत्तों की तरह गोलियों से मारे जाने की शेखी बघारने का और प. बंगाल में अपनी सरकार आने पर वैसा ही कर के दिखाने का एलान करने का है।

अचरज नहीं कि भाजपा ने ऐसे हिंसक बयानों पर कोई नाराजगी जताना तो दूर, उन्हें निजी बयान बताकर पल्ला झाडऩे के सिवा, खुद को इस मंसूबों से अलग करना तक जरूरी नहीं समझा है। उल्टे, खुद मोदी-शाह की शीर्ष जोड़ी सीएए के विरोधियों को पाकिस्तान-समर्थक या सीधे-सीधे एंटीनेशनल करार देने के जरिए, अपनी कतारों की इस हिंसक उग्रता को और हवा ही दे रही है।

वास्तव में इस शत्रु-भाव को सांप्रदायिक धार देने की शुरूआत तो खुद प्रधानमंत्री ने झारखंड में चुनाव प्रचार के क्रम में यह एलान करने के साथ ही कर दी थी कि विरोध करने वालों को, ‘उनकी पोशाक से ही पहचाना जा सकता है।’

इसी संदर्भ में यह गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस वृद्घि के खिलाफ दो महीने से ज्यादा से आंदोलन कर रहे छात्रों तथा शिक्षकों के भी खिलाफ, बाहरी नकाबपोश संघी गुंडों की फौज के 5 जनवरी के अभूतपूर्व हिंसक  हमले के ठीक एक हफ्ते बाद, जिसमें छात्र संघ की अध्यक्षा, आइशी घोष तथा एक प्रोफेसर, की जान बाल-बाल बची थी, देश के गृहमंत्री अमित शाह को, जबलपुर में सीएए आदि पर अपने कथित जनजागरण अभियान की जनसभा में, अचानक फिर याद आ गया कि जेएनयू छात्र तो राष्ट्रविरोधी नारे लगाते हैं! ‘क्या उन्हें जेल नहीं भेजा जाना चाहिए? जो भी राष्ट्रविरोधी नारे लगाता है, उसकी जगह जेल में है।’

जाहिर है कि इस इशारे के बाद, गृहमंत्री को अलग से यह बताने की जरूरत नहीं थी कि जो कायर, ‘भारत माता की जय’ के नारे की आड़ में, मुंह पर नकाब डालकर और पुलिस व विश्वविद्यालय प्रशासन की मिलीभगत से, निहत्थे छात्रों तथा शिक्षकों पर हथियारों से घातक हमले कर रहे थे, उनकी जगह जाहिर है कि उनके राज में जेल में नहीं होगी। उन्हें तो शासन द्वारा पुरस्कृत ही किया जाएगा!

बेशक, जेएनयू के विशेष संदर्भ में अमित शाह को राष्ट्रविरोधी नारों की और ऐसे नारे लगाने वालों को जेल भेजने का अपना ‘पवित्र’ कर्तव्य याद आने की, एक और वजह भी है।

जेएनयू के वामपंथी गढ़ को फतेह करने के लिए मोदी राज के साढ़े पांच साल से ज्यादा में, सरकार समेत संघ परिवार ने सारे दांव आजमा कर देख लिए हैं। पर जीत नहीं मिली है।

दुनिया भर में प्रतिष्ठा-प्राप्त इस सार्वजनिक विश्वविद्यालय के खिलाफ, जिसका जनतांत्रिक, समतावादी मिजाज और सत्ताविरोधी रुझान तथा आम तौर पर प्रगतिशील सोच हमेशा से संघ परिवार की आंखों में खटकता रहा है, दकियानूसी ताकतों की शिकायतों को खुल्लमखुल्ला भुनाते हुए, लंबे अर्से तक ऐसा भयंकर दुष्प्रचार अभियान चलाया गया, जैसा अभियान और किसी उच्च शिक्षा संस्थान के खिलाफ दुनिया भर में शायद ही चलाया गया होगा। इससे भी काम नहीं बना तो, कथित ‘एंटी-नेशनल नारों’ के बहाने से, शासन तथा संघ परिवार द्वारा मिला-जुला, कानूनी-राजनीतिक हमले का अभियान शुरू किया गया। इसके हिस्से के तौर पर फर्जी वीडियो के सहारे, छात्र संघ के तत्कालीन पदाधिकारियों को राजद्रोह का दोषी बनाने की ही कोशिश नहीं की गयी, हालांकि इस झूठ को कानूनी तौर पर कभी सच नहीं साबित किया जा सका, उनके खिलाफ सडक़ों पर हमलावर भीड़ों को भी उतारा गया।

उसके भी कामयाब न होने पर, संघ-अनुमोदित वाइसचांसलर की नियुक्ति के साथ शुरू की गयी विश्वविद्यालय के प्रशासन को छात्रों व शिक्षकों के खिलाफ खड़ा करने, जेएनयू के छात्र समुदाय के सामाजिक गठन को बदलने तथा शैक्षणिक व अन्य पदों पर संघ-अनुमोदितों की ज्यादा से ज्यादा संख्या में भर्ती करने की मुहिम, ताकि जेएनयू के चरित्र को ही बदला जा सके।

जेएनयू की विख्यात समतावादी दाखिला नीति के निरस्त किए जाने तथा छात्र संघ व शिक्षक संघ को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा एक प्रकार से शत्रु ही घोषित किए जाने से लेकर, गैर-यूजीसी छात्रवृत्तियां बंद कराए जाने तथा पीएचडी दाखिलों की संख्या में भारी कटौती कराए जाने तक, इस सार्वजनिक संस्था को भीतर से खोखला करने की हर-संभव कोशिश की गयी। और इन कोशिशों में मौजूदा वाइस चांसलर, एम जगदेश कुमार की भूूमिका केंद्रीय औजार की रही है।

और जब ये सभी हमले जेएनयू को संघ परिवार के लिए फतेह करने में नाकाम हो गए और जेएनयू के छात्रों के शिक्षकों द्वारा समर्थित होस्टल फीस में भारी बढ़ोतरी विरोधी आंदोलन ने, दूसरी अनेक उच्च शिक्षा संस्थाओं में भी शिक्षा से जुड़े मौलिक प्रश्नों पर आंदोलनों की चिंगारियां डालना शुरू कर दिया और यह प्रक्रिया, सीएए-एनपीआर-एनआरसी के खिलाफ युवाओं के बढ़ते पैमाने पर आवाज उठाने के साथ जुडऩे लगी, संघ परिवार ने शारीरिक हिंसा का अपना जाना-पहचाना फासीवादी हथियार आजमाया।

जामिया में और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में सीएए-एनआरसीविरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ शासकीय हिंसा का हथियार आजमाया जा चुका था और वास्तव में कम से कम जामिया के मामले में यह हथियार बहुत हद तक उल्टा भी पड़ चुका था। फिर, जेएनयू की छवि सब कुछ के बावजूद चूंकि एक ‘मुस्लिम विश्वविद्यालय’ की नहीं थी, उसके मामले में इस हथियार का कारगर होना जाहिर है कि और भी मुश्किल था। इसलिए, जेएनयू को सीधे फासीवादी शैली के हमले के लिए चुना गया, ताकि इस हिंसा को ही बहाना बनाकर, विश्वविद्यालय को ही कम से कम कुछ अर्से के लिए बंद करने की संघ परिवार की मांग को पूरा किया जा सके।

बेशक, 5 जनवरी के इस हमले का रास्ता बनाने में अमित शाह नियंत्रित पुलिस ने और संघ नियंत्रित विश्वविद्यालय प्रशासन ने, जिसमें विश्वविद्यालय की अपनी सुरक्षा व्यवस्था भी शामिल है, शर्मनाक भूमिका अदा की। फिर भी, हमलावर नकाबपोशों की हथियारबंद हमलावर सेना और जेएनयू के गेट पर जमा उनके मददगारों-समर्थकों की उग्र सेना, मुख्यत: संघ परिवारी संगठनों से ही आयी थी, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के एबीवीपी कार्यकर्तानुमा गुंडों की संख्या शायद सबसे ज्यादा रही होगी। इनमें से कुछ की तो पुलिस की पर्दापोशी की सारी कोशिशों के बावजूद पहचान भी हो चुकी है।

अमित शाह और संघ परिवार के दुर्भाग्य से, मीडिया को जिस मुकम्मल तरीके से उन्होंने पिछले लगभग पांच साल से अपना हथियार बना रखा था उसमें, सीएए-एनआरसी के खिलाफ उठी विरोध की व्यापक लहर के बीच एक बड़ी दरार पड़ गयी है। और इस दरार में से छन-छनकर आयी जानकारियां, अमित शाह को जेएनयू के ‘एंटी-नेशनल’ नारे याद आने तक, कम से कम तीन बातें निर्णायक तरीके से साबित कर चुकी थीं।

पहली, यह हमला पुलिस की पूरी जानकारी में और वास्तव में उसकी शीर्ष स्तर से मिलीभगत से हुआ था। पुलिस, हमला शुरू होने से पहले से परिसर में मौजूद थी। हिंसा की नौबत आती देख, परिसर में मौजूद पुलिस वालों ने, अपने उच्चाधिकारियों को सूचित किया था और अतिरिक्त बल भी मांगा था। छात्र संघ की अध्यक्षा समेत छात्र नेताओं, शिक्षक संघ के पदाधिकारियों तथा हमले की जद में आए होस्टलों के वार्डनों ने, पुलिस से हस्तक्षेप की बार-बार मांग की थी। यहां तक कि बड़ी संख्या में पुलिस बल विश्वविद्यालय पर पहुंच भी चुका था। लेकिन, वह परिसर के मुख्य द्वार के बाहर ही रुका रहा और वहां भी संघ परिवारियों की भीड़ की पत्रकारों तथा दूसरे लोगों के खिलाफ हिंसा पर, तमाशबीन ही बना रहा था। बहाना यह था कि विश्वविद्यालय प्रशासन की इजाजत के बिना पुलिस परिसर में नहीं जाएगी!

याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि सीधे अमित शाह को प्रति जवाबदेह दिल्ली पुलिस को ही, जामिया परिसर में खुद धावा बोलने के लिए ऐसी किसी इजाजत की जरूरत महसूस नहीं हुई थी।

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

दूसरे, जेएनयू के अपने सुरक्षा बल और पुलिस की मिलीभगत से बाहरी नकाबपोश हमलावरों की हथियारबंद फौज को, परिसर में घुसाया ही नहीं गया था, खुद वाइस चांसलर ने आग्रह कर पुलिस को लगभग आठ बजे तक यानी हमला शुरू होने के करीब तीन घंटे बाद तक मुख्य द्वार पर ही रोके रखा था। एक प्रकार से हमलावरों का काम पूरा होने के बाद ही रजिस्ट्रार ने पुलिस से विश्वविद्यालय में प्रवेश का औपचारिक आग्रह किया, जिसके बाद पुलिस ने हमलावरों को निकलने का रास्ता देते हुए, ‘परिसर में शांति कायम’ की!

JNU attack was sponsored by ABVP and Sangh Parivar

तीसरे, टीवी टुडे/आज तक के स्टिंग ऑपरेशन से साफ हो चुका है कि हमला एबीवीपी तथा संघ परिवार द्वारा प्रायोजित किया गया था, जिसकी पुष्टि इस हमले को संगठित करने से जुड़े वाट्सएप ग्रुपों के संदेशों, हमले में शामिल बाहरी एबीवीपी कार्यकर्ताओं की तस्वीरों आदि से भी होती है। इस सब के बाद, पुलिस-प्रशासन की सारी मिलीभगत भी, जेएनयू पर इस फासीवादी हमले के सच तो विश्वसनीय तरीके से सामने आने से रोक नहीं सकती है। अपने बेनकाब होते फासीवादी चेहरे की ओर से ध्यान बंटाने के लिए और अपनी हिंसक केसरिया पलटनों को बढ़ते विरोध के सामने इसका भरोसा दिलाने के लिए वे वाकई कोई राष्ट्रवादी काम कर रही हैं, शाह को सीएए के पक्ष में अपने झूठ-प्रसार अभियान में, जेएनयू के छात्रों के राष्ट्रविरोधी नारे याद आ रहे हैं। और दूसरे छोटे-बड़े भाजपायी नेता गोधरा दोहराने समेत, हिंसा की तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं। मौजूदा शासकों की बौखलाहट देश को बहुत खतरनाक स्थिति की ओर धकेल रही है।

0 राजेंद्र शर्मा

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें
 

Leave a Reply