मीथेन के उत्सर्जन में कमी लाने के संयुक्त घोषणापत्र का ऐलान

मीथेन के उत्सर्जन में कमी लाने के संयुक्त घोषणापत्र का ऐलान

मीथेन के उत्सर्जन में कमी लाने की घोषणा के बावजूद क्यों नाराज हैं गैर सरकारी संगठन?

अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे, यूरोपीय यूनियन, जापान और ब्रिटेन ने जीवाश्म ईंधन से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों खासतौर पर मीथेन के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए ऊर्जा निर्यातकों और आयातकों के साथ एक संयुक्त घोषणापत्र (Joint Declaration from Energy Importers and Exporters on Reducing Greenhouse Gas Emissions from Fossil Fuels,) का ऐलान किया है। संयुक्त घोषणापत्र का ऐलान करने वालों में तेल और प्राकृतिक गैस के प्रमुख आयातक और निर्यातक देश शामिल हैं।

हालांकि यह एक व्यापक सहमति है कि ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि (increase in global warming) को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिहाज से मीथेन से निपटना महत्वपूर्ण है, मगर उपरोक्त घोषणा पत्र के प्रति गैर सरकारी संगठनों की प्रतिक्रियाएं तल्ख रही हैं। उनकी दलील है कि मीथेन को कम करने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह खत्म किया जाए।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के कम्युनिकेशन डायरेक्टर जेम्स ब्राउनिंग (James Browning Communications Director at Global Energy Monitor) ने कहा

जीवाश्म ईंधन आधारित मौजूदा परियोजनाओं से होने वाले मीथेन उत्सर्जन से निपटना सही दिशा में उठाया गया कदम है। मगर गैस और तेल की नई परियोजनाएं विकसित करके हम 10 कदम पीछे नहीं हो सकते। नुकसानदेह मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करने का सबसे प्रभावशाली रास्ता यही है कि जीवाश्म ईंधन को ही चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह खत्म किया जाए।”

उन्होंने कहा “दुनिया की कुल एलएनजी क्षमता में अमेरिका की हिस्सेदारी 41% है और अभी यह विकास के दौर से गुजर रही है। वर्ष 2021 से 30 के बीच अमेरिका में गैस का उत्पादन 9% की दर से बढ़ोत्तरी की राह पर है। मगर यह अब भी आईईए नेट जीरो एमिशंस परिदृश्य के अनुरूप नहीं है और इस अवधि में इसमें 25% की गिरावट लाने की जरूरत है। सरकारों को चाहिए कि वे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से खत्म करने पर ध्यान दें ना कि जीवाश्म ईंधन के विस्तार को सही साबित करने के रास्ते तलाशें।”

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की एक ताजा रिपोर्ट में पाया गया है कि तरल प्राकृतिक गैस एलएनजी के निर्यात टर्मिनल्स में अमेरिका की अगुवाई में वैश्विक घुसपैठ हो रही है और वर्ष 2022 की पहली छमाही में अमेरिका एलएनजी का अग्रणी निर्यातक बन गया। यह आंशिक रूप से रूस के यूक्रेन पर हमले के कारण यूरोप को हुई गैस की अल्पकालिक आवश्यकता की वजह से था, लेकिन यह टर्मिनल वर्षों तक ऑनलाइन नहीं होंगे, तात्कालिक आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाएंगे और दीर्घकालिक जीवाश्म ईंधन संपत्तियों के तौर पर फंसे रहेंगे।

घोषणा पर अंतरराष्ट्रीय शोध समूह जीरो कार्बन एनालिटिक्स की ओर से एक विस्तृत प्रतिक्रियाशील पृष्ठभूमि में कुछ प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं :

• यूएस मीथेन रिडक्शन एक्शन प्लान में वर्ष 2030 तक तेल और गैस से मीथेन उत्सर्जन में प्रस्तावित की गई 87% की कमी ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस करने के लिहाज से आईईए और आईपीसीसी परिदृश्यों के औसत से ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं।

• हालांकि तेल और गैस से अमेरिकी मीथेन उत्सर्जन अमेरिका की सरकार के अपने आधिकारिक आंकड़ों के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है और इसमें अभी इजाफा हो रहा है।

• “जीवाश्म ईंधन से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर ऊर्जा आयातकों और निर्यातकों की संयुक्त घोषणा का उद्देश्य जीवाश्म ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में उभार, मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को पूरी तरह से व्यवहार्य सीमा तक कम करना है।”

• वार्मिंग को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए जीवाश्म ईंधन के उपयोग के साथ-साथ मीथेन और आपूर्ति श्रृखला उत्सर्जन में भी तेजी से कमी लाने की जरूरत है।

• हालांकि दुनिया की एलएनजी क्षमता का 41% हिस्सा अमेरिका के पास है और वर्तमान में यह और विकसित हो रही है (या तो प्रस्तावित है अथवा निर्माण के दौर में है)। वर्ष 2021 से 2030 के बीच अमेरिकी गैस उत्पादन में 9% की वृद्धि का अनुमान है लेकिन आईईए नेट जीरो उत्सर्जन परिदृश्य के अनुरूप बनने के लिए इस अवधि में गैस उत्पादन को 25% तक कम करने की जरूरत होगी।

यूरोपीय यूनियन खुद भी पहले से ही इस बात को लेकर मुखर रहा है कि यूरोप में प्राकृतिक गैस का कोई व्यवहार्य भविष्य नहीं है। यूरोपियन कमिशन का नजरिया यह दिखाता है कि ‘फिट फाॅर 55’ जलवायु लक्ष्य के नतीजे के तौर पर वर्ष 2030 और उसके बाद प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल में तेजी से गिरावट आएगी और यूरोपीय यूनियन द्वारा वर्ष 2030 तक गैस की मांग में 32 से 37% तक की गिरावट आने की संभावना है।

यहां तक कि रूसी जीवाश्म ईंधन से यूरोपीय संघ को हटाने के लिए आपातकालीन नीतियां भी दिशा की दीर्घकालिक समझ का स्पष्ट विचार देती हैं। 300 मिलीयन में से आरई पावर ईयू योजना के तहत उपलब्ध 290 मिलियन यूरो को अक्षय ऊर्जा पर खर्च यह जाने की योजना है। विशेषज्ञों ने बार-बार कहा है कि यूरोप में गैस (और कोयले) की वापसी नहीं हो रही है। इस बीच ऊर्जा संकट के कारण जीवाश्म ईंधन के पुनरुद्धार की आशंकाओं के विपरीत ईयू27 में ऊंची कीमतों और पवन तथा सौर ऊर्जा का बेहतर उत्पादन होने के कारण जीवाश्म ईंधन की मांग में गिरावट हो रही है।

ग्लोबल मीथेन प्लेज को अपनाने के एक साल बाद और गैस का संकट उत्पन्न होने के बावजूद कई सरकारों ने अपने-अपने यहां ऊर्जा क्षेत्रों से निकलने वाली इसी गैस के बढ़ते उत्सर्जन को रोकने के लिए पर्याप्त कदम अभी तक नहीं उठाए हैं। हमें यह याद रखना होगा कि मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करने का सबसे अच्छा रास्ता यही है कि हम सबसे पहले जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से बंद करें।

यह घोषणा पत्र यूरोपीय यूनियन द्वारा पहले से ही बनाई गई योजना में प्रस्तावित उपायों से किसी भी मायने में बेहतर नहीं है और बार-बार की जाने वाली सभी आशय घोषणाएं अच्छी है लेकिन जब तक प्रभावी कार्रवाई ना हो और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से खत्म नहीं किया जाए तब तक यह तमाम ऐलान बेकार है।

fossil fuels
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एक गैर सरकारी संगठन और थिंक टैंक पावरशिफ्ट अफ्रीका, जिसकी स्थापना अफ्रीका में जलवायु कार्रवाई को संगठित करने और जलवायु और ऊर्जा नीतियों को शून्य कार्बन में स्थानांतरित करने के लिए की गई थी, के संस्थापक निदेशक मोहम्मद एडु (Mohamed Adow, Founding Director of PowerShift Africa) ने कहा

“ऊर्जा संकट से आगे बढ़कर यूरोपीय यूनियन ने फिर से संकेत दिया है कि वह अपने दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करेगा। इसका मतलब यह है कि गैस को इस्तेमाल करने की ईयू के पास उपलब्ध अवधि और भी कम है। यूरोपीय यूनियन अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता पर दोगुना जोर दे रही है और आने वाले वर्षों में यूरोप में गैस की मांग में नाटकीय रूप से गिरावट आएगी। जलवायु के रूप से तटस्थ यूरोप में गैस के लिए किए गए दीर्घकालिक अनुबंध निरर्थक साबित होंगे क्योंकि यूरोपीय यूनियन ग्रीन डील को एक दिशा सूचक के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने जलवायु लक्ष्यों से विपरीत दिशा में पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।”

भारत और मीथेन उत्सर्जन

हालांकि भारत मीथेन गैस के शीर्ष 10 योगदानकर्ताओं में शामिल है, मगर उसने पिछले साल ग्लास्गो में हुई सीओपी26 शिखर वार्ता के दौरान अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा शुरू की गई ग्लोबल मीथेन प्लेज में शिरकत नहीं की।

वर्ष 2021 में 13 दिसंबर को लोकसभा में प्रश्न संख्या 2478 के जवाब में सरकार ने कहा था, “भारत मीथेन उत्सर्जन के मामले में चौथे स्थान पर है और उसका इस गैस का उत्सर्जन चीन के कुल उत्सर्जन के लगभग एक तिहाई के बराबर है। यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) की तीसरी द्विवार्षिक अपडेट रिपोर्ट के मुताबिक मीथेन का उत्सर्जन 409 बिलियन टन सीओ2ई यानी भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 14.43% था। वर्ष 2016 में कृषि क्षेत्र द्वारा वर्ष 2014 से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 2.25% की गिरावट दर्ज की गई।

भारत ने ग्लोबल मीथेन प्लेज पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?

लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने ग्लोबल मीथेन प्लेज पर हस्ताक्षर नहीं करने के कारणों का जिक्र करते हुए कहा था कि भारत में मीथेन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत (Two major sources of methane emissions in India) आंतों का किण्वन और धान की खेती हैं। यह उत्सर्जन पूरे भारत में छोटे, सीमांत और मध्यम किसानों की खेती संबंधी गतिविधियों से पैदा होते हैं और अगर भारत में ग्लोबल मीथेन प्लेज पर हस्ताक्षर किए तो इन किसानों की रोजी-रोटी पर खतरा पैदा हो जाएगा।

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