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Press Freedom

कोरोना महामारी के नाम पर मीडिया हाउस का शिकार बन रहे हैं पत्रकार, कांग्रेस शासित राज्यों में भी हो रहे पत्रकारों पर जुल्म

Journalists are becoming victims of media houses in the name of Corona epidemic, atrocities on journalists also happening in Congress ruled states

पिछले सप्ताह तंगदस्ती से तंग आकर हिंदी ख़बर न्यूज चैनल के कैमरामैन पत्रकार सत्येंद्र की आत्महत्या बड़े मीडिया हाउस के लिये सुर्खियां नहीं बन पायीं, क्योंकि इस से मीडिया की साख पर बट्टा लग रहा था और मीडियाकर्मियों की फाकाकशी की तस्वीर बयां कर रही थी।

पत्रकारों की हर जगह यही हालत है। सभी बड़े मीडिया हाउस में छंटनी हो रही है, तनख़्वाह काटी जा रही है, बिना वेतन के छुट्टी पर भेजा जा रहा है। जितना बड़ा मीडिया संस्थान है, उतनी ही बड़ी गाज उसके पत्रकारों-कर्मचारियों पर गिर रही है।

बड़े मीडिया संस्थान जिनका मुनाफा अपरंपार है, वे अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन के 40-50 दिन के भीतर ही ठिकाने लगाना शुरू कर चुके हैं। वेतन में कटौती तो मानो इस समय सर्वमान्य सिद्धांत ही हो गया है। पत्रकार बंधु भी इसे स्वीकार कर रहे हैं, यह संतोष करके कि चलो कम से कम नौकरी तो नहीं गई।

कोरोना महामारी के इस दौर में नौकरी को बचाने के लिए मीडियाकर्मी क्या-क्या करने को तैयार इस पर चर्चा करना बेकार है, क्योंकि इससे जो विक्टिम यानी पीड़ित है, उसे ही दोष देने का सिलसिला शुरू हो जायेगा।

How many journalists have been unemployed in the Corona era so far

कोरोनाकाल में कितने पत्रकारों की अभी तक नौकरी गई है, यह भी अभी नहीं पता चल पाएगा, क्योंकि चुपचाप पत्रकारों से इस्तीफे पर हस्ताक्षर लिये जा रहे हैं। तमाम नियमों का उल्लंघन करते हुए, एक ई-मेल या फोन-वीडियो कॉल के जरिए पत्रकारों को बताया जा रहा है कि उन्हें हटा दिया गया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने केरल के अपने तीन एडिशन बंद कर दिये हैं, टेलीग्राफ झारखण्ड बिहार एडिशन बंद कर रहा है, अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स अपना बिहार एडिशन बंद कर रहा है।

राजधानी दिल्ली में भी बड़े पैमाने पर पत्रकारों की नौकरी जाने की खबर मिल रही है। कोरोना लॉकडाउन की आड़ में मुनाफे में डूबे हुए मीडिया घराने अपने बैनर तले विश्वविद्यालय और रियल एस्टेट चलाने वाले समूह मीडियाकर्मियों की छंटनी कर रहे हैं।

पत्रकार सत्येंद्र के बाद एक हृदयविदारक खबर महाराष्ट्र के नागपुर से मिल रही है तरुण भारत के पत्रकार दिलीप दुपारे ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने की कोशिश की है।

दिल्ली के पत्रकार मित्र पवन भार्गव मुझे बता रहे थे कि पत्रकारों को पिछले चार महीनों से वेतन नहीं मिला है। ऐसे पत्रकारों के लिए घर चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है।

समस्या यह है कि मीडिया में मीडियाकर्मियों की दशा-दिशा पर कोई चर्चा नहीं होती। अधिकांश पत्रकार संगठन के पदाधिकारी स्वयं अखबार के स्वामी हैं, इसलिये वे खामोश हैं।

देश भर के विभिन्न राज्यों में तेज़ी के साथ श्रमजीवी पत्रकारों के बीच अपनी मज़बूत पकड़ बनाने वाला भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ कोरोना लॉकडाउन अवधि में नौकरी से निकाले गए पत्रकारों एवं जिन पत्रकारों से जबरन इस्तीफे लिये गये हैं उन सभी के लिये उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहा है। हालांकि उच्चतम न्यायालय से मी-लॉर्ड की नज़रे-इनायत होगी या नहीं इसका सभी पत्रकार बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे हैं। उसके बावजूद कोरोना और लॉकडाउन के दौरान देश भर में पत्रकार तमाम जोख़िम उठाकर सच को सामने ला रहे हैं। ऐसे पत्रकारों पर जब हमला होता है तब कोई प्राइम टाइम पर प्रेस की स्वतंत्रता की बात नहीं करता और न ही कोई सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है।

और ऐसे में जो पत्रकार सही रिपोर्ट करते हैं, पत्रकारिता का धर्म निभाते हैं, उनके ऊपर केस बनाए जाते हैं, फंसाया जाता है, उन्हें डराया-धमकाया जाता है।

झारखण्ड में भ्र्ष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकारों पर झूठे मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जा रहा है। मीडिया फ़्रेंडली कहे जाने वाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी अब तक पत्रकारों के लिये एक कदम नहीं बढ़ पाये हैं।
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं

झारखण्ड ही की तरह छतीसगढ़ और राजस्थान में भी  स्थिति कमोवेश ऐसी ही है। पत्रकारों के लिये घड़ियाली आंसू बहाने वाली कांग्रेस शासित राज्यों में पत्रकारों की हालत सबसे दयनीय है, अखबार बंद हो रहे हैं पत्रकारों को नौकरी से हाथ धोना पड़ रहा है फिर भी उन राज्यों के मुख्यमंत्री इस बाबत अपने लब खोलने को तैयार नहीं हैं।

तमिलनाडु से पत्रकारों के लिये राहत भरी खबर मिल रही है कि लॉकडाउन में पत्रकारों के खाते में तीन हज़ार रुपये भेजे गये हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को अनसुना करने वाले बड़े मीडिया हाउस के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय सख़्त रवैया अपनाते हुये पत्रकारों को कोई राहत देता है या नहीं देश भर के पत्रकारों की नज़र अब इब इस बात पर टिकी हुयी है, फिलहाल कोरोना महामारी के नाम पर मीडिया हाउस का शिकार बन रहे हैं पत्रकार।

(लेखक शाहनवाज हसन वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं)

 

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