जस्टिस काटजू का लेख : मीडिया की भूमिका

जस्टिस काटजू का लेख : मीडिया की भूमिका

मीडिया की भूमिका

मीडिया की मुख्य भूमिका होती है जनता को वारदातों की सही जानकारी देना। पर इसके अलावा उसकी यह भी ज़िम्मेदारी होती है कि जनता को उज्ज्वल जीवन पाने की दिशा दिखाना और वैचारिक क्षेत्र में जनता को सही नेतृत्व प्रदान करना।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मीडिया का उदय पश्चिमी यूरोप में १८वीं सदी में हुआ। उस समय सारे सत्ता के उपकरण सामंती शासकों ( राजा, जमींदार और उनके नुमाइंदों ) के हाथों में थी।

इसलिए जनता को ऐसे उपकरणों का निर्माण करना पड़ा जो उनकी नुमाइंदगी कर सकें और उनकी हितों की रक्षा कर सके। इन उपकरणों में मीडिया एक शक्तिशाली उपकरण था जिसका बहुत प्रयोग यूरोप में हुआ।

महान लेखक जैसे वोल्तेयर ( Voltaire ), रूसो ( Rousseau ), थॉमस पैन ( Thomas Paine ), आदि ने मीडिया द्वारा ( जो उस समय पर्चों, लघुपत्रों आदि के रूप में थी न कि दैनिक समाचार पत्रिकाओं के रूप में ) सामंती व्यवस्था पर करारा प्रहार किया, और आधुनिक समाज के निर्माण में बड़ा योगदान दिया।

आज भारत बड़े संकट में है- भीषण ग़ुरबत, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्वास्थ लाभ और अच्छी शिक्षा का अभाव के शिकंजे में। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए मीडिया भी बड़ा योगदान कर सकता है और खुशहाल भारत के निर्माण में बड़ी मदद कर सकता है, जैसा कि १८वीं सदी के यूरोपीय मीडिया ने किया। पर क्या वह ऐसा कर रहा है ?

अधिकाँश मीडिया तो बिकाऊ, बेशर्म, चाटुकार,  गोदी मीडिया हो गयी है, उसकी तो बात करना ही फ़िज़ूल है। मगर उस मीडिया के बारे में क्या कहा जाए जो अपने को स्वतंत्र कहती है ? क्या वह भारत की जनता को वैचारिक नेतृत्व दे रही है, जो उसकी ज़िम्मेदारी है, ताकि एक उज्ज्वल भारत का निर्माण हो सके ? क़तई नहीं।

अधिक से अधिक वह सत्तारूढ़ बीजेपी की आलोचना करती है, पर जनता को यह नहीं बताती कि मौलिक परिवर्तन के लिए राजनैतिक दल बदलने से कुछ न होगा बल्कि सारी व्यवस्था ही बदलनी होगी।

ऐसा करने के लिए एक महान एकजुट ऐतिहासिक क्रांतिकारी जनसंघर्ष करना होगा, जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर,  जिसमें बड़ी क़ुर्बानियां देनी होंगी, और ऐसी राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिसके अंतर्गत तेज़ी से औद्योगीकरण हो और जनता को अच्छा जीवन मिले।

परन्तु हमारी तथाकथित ‘स्वतंत्र’ मीडिया ऐसा कभी नहीं करती, बल्कि जो लोग इन विचारों को व्यक्त करना चाहते हैं उनके भी लेखों को कभी प्रकाशित नहीं करती। तो यह मीडिया क्या वास्तव में स्वतंत्र है ? और क्या यह जनता के प्रति अपना दायित्व निभा रही है ?

हकीकत यह है कि हमारे पत्रकारों की समझ सतही अल्पज्ञ और छिछोरी है और उनकी मोटी बुद्धि है। शायद ही उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र आदि का गहरा अध्ययन किया है। तो ऐसे पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन व सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।

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