तूतीकोरिन में जो हुआ वो निर्भया मामले से भी बदतर, दोषी पुलिसकर्मियों को तुरंत गिरफ्तार करें : जस्टिस मार्कंडेय काटजू

Justice Markandey Katju

तूतीकोरिन, तमिलनाडु में जो हुआ वो निर्भया मामले से भी बदतर है जिसके लिए हाल ही में 4 लोगों को फांसी दी गई थी।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के सथानकुलम शहर में मोबाइल एक्सेसरी की दुकान चलाने वाले एक पिता और पुत्र, पी.जयराज और फेलिक्स, को कुछ पुलिसकर्मियों ने बंद के दौरान दुकान खुली रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था। फिर उन्हें थाने ले जाया गया और बेरहमी से मारपीट की गई। जाहिर है कि एक रॉड या लाठी, उनके निजी अंगों में जबरन डाले गए (उनके मलाशय से इतना खून बह रहा था कि तीन बार कपड़े बदलने की जरूरत पड़ी)। बाद में उनकी मौत हो गई।

भक्षक में बदल चुके हैं कुछ रक्षक

निर्भया मामले में, एक रॉड (rod) को पीड़ित के निजी अंगों में जबरन डाला गया था, लेकिन यह गैर अधिकारियों द्वारा किया गया था। यहां यह पुलिसकर्मियों द्वारा किया गया है, जिनका कर्तव्य कानून को बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा करना है। और इस प्रकार आज कुछ रक्षक भक्षक में बदल चुके हैं।

प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता, 2011 (ऑनलाइन देखें) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि फर्जी मुठभेड़ के दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दी जानी चाहिए। इसे ‘दुर्लभतम’ मामला (rarest of rare case) माना जाना चाहिएI

न्यायालय ने कहा :

“पुलिसकर्मी ऐसे व्यक्ति हैं जिनका कर्त्तव्य कानून की सुरक्षा करना हैI हमारी राय में यदि अपराध सामान्य लोगों द्वारा किए जाते हैं, तो साधारण दंड दिया जाना चाहिए, लेकिन अगर पुलिसकर्मियों द्वारा अपराध किया जाता है तो बहुत कठोर दंड दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे वह काम कर रहे हैं जो पूरी तरह से अपने कर्तव्यों के विपरीत है”।

इसलिए अगर निर्भया अभियुक्तों को फांसी दी गई थी, तो तूतिकोरिन मामले में सभी पुलिसकर्मी कोर्ट द्वारा दोषी पाए जाने पर यही सजा के हकदार हैं।

हमारे देश में कस्टोडियल मौतों ( custodial deaths ) के आंकड़े बढ़ रहे थे, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बासू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1996 में अपने ऐतिहासिक फैसले में नोट किया था। इसलिए धारा 176, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code) में संशोधन किया गया और हिरासत में हुई मौतों की जांच के लिए एक विशेष प्रक्रिया बनाई गई।

सामान्य अपराधों के लिए, पुलिस द्वारा जांच की जाती है। लेकिन हिरासत में होने वाली मौतों के लिए धारा 176 में प्रावधान है कि जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट (judicial magistrate)द्वारा ही की जानी चाहिए। हिरासत में होने वाली मौतों के लिए इस विशेष प्रावधान को बनाने का उद्देश्य स्पष्ट था: पुलिस किसी सहकर्मी के खिलाफ निष्पक्ष जांच नहीं करेगी (क्योंकि अक्सर एक ही सेवा में संग काम करने वाले लोगों की प्रवृत्ति होती है कि वे एक-दूसरे का ही साथ देते हैं )।

धारा 176 में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें कहा गया हो कि मजिस्ट्रेट द्वारा जांच पूरी होने से पहले हिरासत में मौत के आरोपी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

वास्तव में हत्या के मामलों में पुलिस आमतौर पर आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लेती है, और जांच पूरी होने तक ऐसा करने का इंतजार नहीं करती।

आश्चर्य की बात है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को केवल निलंबित किया गया है। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, जैसा कि अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड के हत्यारों को किया गया। इसके बाद जांच और मुकदमा तेजी से पूरा किया जाना चाहिए, और अगर आरोपी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए, ताकि पूरे भारत में पुलिसकर्मियों को पता चले कि जैसे वे ब्रिटिश राज के दौरान बर्ताव करते थे अब वैसा नहीं चलेगा

जस्टिस मार्कंडेय काटजू,

पूर्व न्यायाधीश,

सुप्रीम कोर्ट

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