Home » Latest » लोकतंत्र के जननायक ज्योति बसु सही अर्थ में गांधी के दरिद्र नारायण के प्रतीक पुरुष थे
Jyoti Basu

लोकतंत्र के जननायक ज्योति बसु सही अर्थ में गांधी के दरिद्र नारायण के प्रतीक पुरुष थे

आज ज्योति बाबू का जन्मदिन है– Today is Jyoti Babu’s birthday

आम आदमी की जिंदगी जीना सबसे मुश्किल काम है। अभिजन परिवार में पैदा होने और सुखों से भरी जिंदगी छोड़ने की किसी की इच्छा नहीं होती। खासकर इन दिनों सभी रंगत के राजनीतिक दलों में सुख और वैभव के साथ राजनीति करने की होड़ मची है। ऐसी अवस्था में ज्योति बाबू को याद करना प्रासंगिक होगा।

Jyoti Basu, the Jananayak of democracy, was in true sense the epitome of Gandhi’s impoverished Narayan.

ज्योति बाबू सही अर्थ में गांधी के दरिद्र नारायण के प्रतीक पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में भारत के मजदूरों का बिंब झलकता था। भारत में महात्मा गांधी ने राजनीति को जहां छोड़ा था ज्योति बाबू ने देश की राजनीति को उस बिंदु से आगे बढ़ाया।

गांधी ने भारत की आजादी की जंग में प्रेरक प्रतीक की भूमिका अदा की थी, साम्प्रदायिकता को रोकने की प्राणपण से चेष्टा की, राष्ट्र के सम्मान और जनता के हितों की रक्षा करने के लिए अपने जीवन के समस्त सुखों को त्याग दिया था, ठीक यही प्रस्थान बिंदु है जहां से ज्योति बाबू अपनी कम्युनिस्ट जिंदगी आरंभ करते हैं।

Jyoti basu biography in hindi | ज्योति बसु जीवनी

लंदन से बैरिस्टरी पास करके भारत आने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के पूरावक्ती कार्यकर्त्ता का जीवनपथ स्वीकार करते हैं।

उल्लेखनीय है ज्योति बाबू के यहां दौलत की कमी नहीं थी, गरीब मजदूरों -किसानों की सेवा के लिए उन्होंने सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनायी। सादगी और कष्टपूर्ण जीवन का मंत्र उन्हें मजदूरों से मिला था। अभिजनवर्ग के स्वभाव, वैभव,मूल्य और राजनीति का विकल्प गरीबों के जीवन में खोजा, जिस समय राजनेता गांधी की विचारधारा के पीछे भाग रहे थे उस समय ज्योति बाबू गरीबों के हितों और सम्मान की रक्षा के लिए खेतों -खलिहानों से लेकर कारखाने के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे।

गांधी की राजनीति खेतों और कारखानों के पहले खत्म हो जाती थी जबकि ज्योति बाबू की राजनीति वहां से आरंभ होकर संसद-विधानसभा के गलियारों तक जाती थी।

ज्योति बाबू ने सही अर्थों में गरीब और संसद के बीच में सेतु का काम किया था।

गरीबों के बोध में जीकर ज्योति बाबू ने अपने मार्क्सवादी सोच को परिष्कृत किया था। बांग्ला चैनल स्टार आनंद पर साक्षात्कार में एक बार पश्चिम बंगाल के भू.पू. मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय ने कहा वे ज्योति बाबू के घर नियमित आते -जाते थे। साथ ही रसोईघर में भी जाते थे।  उन्होंने कहा मैंने कभी उनके यहां मांस-मछली का खाना बनते हुए नहीं देखा। उस समय ज्योति बाबू विधायक थे, और आधा विधायक भत्ता पार्टी ले लेती थी। भत्ता भी कम मिलता था। आधे भत्ते में ज्योति बाबू किसी तरह गुजारा करते थे।

एक दिन सिद्धार्थशंकर राय ने प. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री विधानचन्द्र राय से कहा कि ज्योति बाबू बेहद कष्ट में जीवनयापन कर रहे हैं, उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दीजिए और भत्ता भी बढ़ा दीजिए, उन्होंने तुरंत ज्योति बाबू को विपक्ष का नेता बना दिया और भत्ता बढ़ाकर 750 रुपये कर दिया। ज्योति बाबू ने यह भत्ता कभी नहीं लिया। और कष्टमय जीवन जीना पसंद किया।

सिद्धार्थशंकर राय ने कहा कि ज्योति बाबू ने सारा जीवन कष्ट और कुर्बानी देकर गुजारा। उनके जैसा बेहतरीन इंसान होना असंभव है।

Jyoti Basu – Latest News on Jyoti Basu.

ज्योति बाबू के इमेज के निर्माण में उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली की केन्द्रीय भूमिका थी, जबकि आजकल विज्ञापन कंपनियों की इमेज निर्माण के लिए मदद ली जाती है। अमीर खानदान में पैदा होने और शानदार अभिजन सुलभ उच्च शिक्षा पाने के बावजूद उन्होंने अमीरों के भवनों में रहने और अमीरों की राजनीतिक सेवा करने की बजाय कम्युनिस्ट पार्टी का होल टाइमर होना पसंद किया। संपत्ति और पूंजी के सभी प्रपंचों से दूर रखा। दूसरों के दुख और खासकर गरीबों के दुखों को अपने जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बना लिया।

इस प्रक्रिया में ज्योति बाबू का व्यक्तित्वान्तरण हुआ साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी का भी चरित्र बदला, खासकर पश्चिम बंगाल में पार्टी का चरित्र बदलने में सफलता मिली। उन्होंने किसान की मुक्ति को प्रधान राजनीतिक एजेण्डा बनाया।

ज्योति बाबू के व्यक्तित्व में बंगाली अभिजन और मार्क्सवादी संस्कारों का विलक्षण मिश्रण था। उनका व्यक्तित्व जन और अभिजन के साझा रसायन से बना था। इसके कारण उनकी जन-अभिजन दोनों के प्रति लोचदार और सामंजस्यवादी समझ थी। अपने इसी लचीले स्वभाव को उन्होंने राजनीति के नए संसदीय मार्क्सवाद में रुपान्तरित कर लिया था। उन्हें संसदीय मार्क्सवाद का दादागुरु माना जाता था।

संभवत: सारी दुनिया में ज्योति बाबू अकेले कम्युनिस्ट थे जिनसे संकट की घड़ी में सभी रंगत के पूंजीवादी नेता सलाह लेते थे।

 पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

ज्योति बाबू ने भारत के कम्युनिस्टों को लोकतंत्र के दो प्रमुख मंत्र सिखाए किसान और उद्योग की सेवा करो। देशहित और जनहित को पार्टी हितों के ऊपर रखो। पार्टी अनुशासन को मानो और मार्क्सवाद और लोकतंत्र के विकास के लिए विकल्पों पर नजर रखो, कभी विकल्पहीनता में मत रहो, विकल्प जहां से भी मिलें उन्हें सामूहिक फैसले के जरिए लागू करो। व्यवहारवाद और लोकतंत्र में सामंजस्य बिठाओ।

सन् 2012 में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का जन्मदिन था, परंपरा के अनुसार इसे विधानसभा सौध में ही मनाया जाना था और पूर्व विधायकों और वर्तमान विधायकों को नियमानुसार हक है कि वे विधानसभा सौध में जाकर कार्यक्रम कर सकते हैं। लेकिन ममता सरकार ने वामदलों के पूर्व और वर्तमान विधायकों और पूर्व मंत्रियों को विधानसभा के गेट के अंदर प्रवेश तक नहीं करने दिया, बाद में वाम विधायकों ने विधानसभा के गेट पर ज्योति बाबू की तस्वीर को टेबिल-चेयर पर रखकर माल्यार्पण किया। भारत में संसदीय अशालीनता की यह नजीरहीन मिसाल है।

ज्योति बाबू ने अपने राजनीतिक कैरियर में त्याग, संघर्ष और कुर्बानी का जो जज्बा पैदा किया उसने हजारों युवाओं को शहरों से लेकर गांवों तक कम्युनिस्ट आंदोलन की कतारों में शामिल होने की प्रेरणा दी। इस तरह का प्रेरक संघर्षशील व्यक्तित्व विरल है। साम्प्रदायिक सदभाव और समानता की संवैधानिक समझ को उन्होंने राज्य प्रशासन के आम नजरिए में उतारकर नई मिसाल कायम की। वे साधारण मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि क्षमता, विवेक और लोकतांत्रिक नजरिए के आदर्श प्रतीक थे वे लोकतंत्र के महान सपूत थे।

लोकतंत्र में कोई कम्युनिस्ट जननायक हो सकता है यह चीज ईएमएस नम्बूदिरीपाद के बाद उन्होंने ही साबित की, इससे सारी दुनिया के मार्क्सवादियों को लोकतंत्र की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा मिली।

जो लोग इनदिनों पश्चिम बंगाल में माकपा और वामदलों पर हो रहे जुल्मों को देखकर यह सोच रहे हैं कि माकपा तो खत्म हो गयी या खत्म हो जायगी। उन लोगों को इतिहास कभी भूलना नहीं चाहिए। सन् 1972-77 के बीच में पश्चिम बंगाल अर्द्ध-फासी आतंक का राज था। जिसने जून 1975 में आपात्काल के रूप में फासिज्म के रूप में सारे देश को ग्रस लिया।

ज्योतिबाबू पहले राजनेता ने जिन्होंने कांग्रेस के अंदर पनप रहे फासीवाद को 1971-72 में पहचाना था और अंत में 1977 में कांग्रेस को परास्त करके पश्चिम बंगाल से कांग्रेस को हमेशा के लिए खत्म करके हाशिए पर डाल दिया। फासिज्म के खिलाफ संघर्ष में ज्योति बाबू सारे देश के सिरमौर थे।

ज्योति बाबू ने लोकतंत्र के बुनियादी स्वर को अपने शासन में बदला और एक जनोन्मुख प्रशासननीति को जन्म दिया। इसके कारण पश्चिम बंगाल में आंदोलन करना लोकतांत्रिक हक रहा है। कोई भी दल हो, कितना भी बड़ा हो, यहां तक कि यदि 10 लोग भी मुख्यमार्ग पर रास्ताजाम करके बैठ जाते हैं तो पुलिस ने कभी लाठाचार्ज नहीं किया।

मैं निजी तौर पर उनसे कई बार मिला हूँ, वे बार-बार कहते थे लोकतंत्र में तंत्र का काम है जनता की सेवा करना न कि जनता पर शासन करना। वे स्वयं इस धारणा को पश्चिम बंगाल के प्रशासन में निचले स्तर तक उतारने में सफल रहे। सारी जिंदगी निष्कलंक रहे, कभी घूस नहीं ली, कोई संपत्ति नहीं जोड़ी और लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में जनता की सेवा की।

Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

पश्चिम बंगाल में ज्योति बाबू के मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों को लाखों एकड़ जमीन बांटी गयी। देश में भूमिसुधार कार्यक्रम का आदर्श मानक पेश किया। इसके अलावा विभिन्न शहर,कारखाने आदि के लिए हजारों एकड़ जमीन ली गयी लेकिन कहीं पर भी कोई विवाद नहीं हुआ। यहां तक कि सॉल्टलेक जैसा सुंदर शहर बसाने के लिए सैंकड़ों एकड़ जमीन ली गयी जिसमें न कोई घोटाला और न जोर-जबर्दस्ती।

व्यावहारिक मार्क्सवाद के ज्योति बाबू आदर्श मिसाल थे। Jyoti Basu was a model example of practical Marxism.

ज्योति बाबू का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने साम्यवादियों को लोकतंत्र में रमने, घुलने-मिलने का मंत्र सिखाया। मार्क्सवाद को किताबी और कठमुल्ले मार्क्सवादियों के चंगुल से मुक्त करके आम आदमी का विश्वदृष्टिकोण बनाया। आज भी पश्चिम बंगाल में एक करोड लोग विभिन्न संगठनों में माकपा से जुड़े हैं और यह स्थिति पैदा करने में ज्योति बाबू के व्यवहारिक मार्क्सवाद की बड़ी भूमिका थी।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

हस्तक्षेप के संचालन में मदद करें!! सत्ता को दर्पण दिखाने वाली पत्रकारिता, जो कॉरपोरेट और राजनीति के नियंत्रण से मुक्त भी हो, के संचालन में हमारी मदद कीजिये. डोनेट करिये.
 

हमारे बारे में hastakshep

Check Also

उनके राम और अपने राम : राम के सच्चे भक्त, संघ के राम, राम की सनातन मूरत, श्रीराम का भव्य मंदिर, श्रीराम का भव्य मंदिर, अयोध्या, राम-मंदिर के लिए भूमि-पूजन, राममंदिर आंदोलन, राम की अनंत महिमा,

मर्यादा पुरुषोत्तम राम को तीसरा वनवास

Third exile to Maryada Purushottam Ram राम मंदिर का भूमि पूजन या हिंदू राष्ट्र का …