Home » Latest » बंगला गद्य के जनक काली प्रसन्न सिंह
Literature news

बंगला गद्य के जनक काली प्रसन्न सिंह

Kaliprasanna Singha, the father of Bengali prose

काली प्रसन्न सिंह बंगला गद्य के जनक माने जाते हैं अंग्रेजी में एडिसन और स्टील की तरह। बंगला में अनुवाद की पहल भी उन्होंने की। तकालीन अंग्रेजीपरस्त कुलीन भद्र समाज पर उन्होंने हुतुम पेंचार नक्शा (Hutom Pyanchar Naksha) में तीखे रेखाचित्र विधा का सृजन करते हुए घटनाओं का सजीव व्यंग्यात्मक ब्योरा पेश करते हुए तीखे प्रहार किए। बांग्ला साहित्य के अध्ययन के लिए अठारहवीं सदी में लिखी गयी यह पुस्तक अनिवार्य है।

उनके सामाजिक सरोकार के तीखे गद्य का नमूना

“আজব সহর কল্কেতা।

রাঁড়ি বাড়ি জুড়ি গাড়ি মিছে কথার কি কেতা।

হেতা ঘুঁটে পোড়ে গোবর হাসে বলিহারি ঐক্যতা;

যত বক বিড়ালে ব্রহ্মজ্ঞানী,বদ্মাইসির ফাঁদ পাতা।”

अनुवाद मेरा

अजब शहर कोलकत्ता।

राण्ड, इमारत, घोड़ा गाड़ी झूठ की जीवनशैली।

यहां कंडे जले तो गोबर हंसे बलिहारी एकता।

सारे वक बिल्ली ब्रह्मज्ञानी, बदमाशी का तिलिस्म।

यह मुक्तबाजारी महानगरों का आज भी सामाजिक यथार्थ है। तुलना में बंकिम की कोई भी रचना उठाकर देख लें। बंगला गद्य को फिर हुतुम के सामाजिक यथार्थ तक पहुंचने के लिए सौ साल तक नबारून भट्टाचार्या का इंतज़ार करना पड़ा। हर्बर्ट, फैताडू समेत नबारून के सारे उपन्यासों में अंडरक्लास के यथार्थ के मध्य हुतुम उल्लू बोलते नज़र आते हैं।

जब बंकिम चटर्जी इतिहास की आड़ में सामाजिक यथार्थ से भाग रहे थे और तत्सम शब्दों से भरे कठिन रोमांटिक गद्य लिख रहे थे, तब हुतोम पेंचार नक्शा में वस्तुवादी दृष्टि से सामाजिक यथार्थ की निर्मम चीर फाड़ की गई।

सुबीर और पियासा ने मेरी स्मृति को झकझोरा, इसके लिए  धन्यवाद।

सुबीर वन्दना दास ने पियासा की यह टिप्पणी मुझे व्हाटसप से भेजी है, जो हिंदी समाज के लिए भी जरूरी पाठ है।

Kaliprasanna Singha (कालीप्रसन्न सिंह) (23 फरवरी 1840 – 24 जुलाई 1870) एक भारतीय बंगाली लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। बंगाली साहित्य में उनके दो अमर योगदानों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाता है। वे

सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत और उनकी पुस्तक हुतोम पंचार नक्ष का बंगाली अनुवाद हैं। वह उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाली साहित्यिक आंदोलन के संरक्षक में से एक थे। अपने जीवन के केवल सत्ताईस वर्षों में उन्होंने साहित्य और समाज के विकास के लिए अनगिनत काम किए हैं।

कालीप्रसन्ना को तत्कालीन हिंदू कॉलेज में भर्ती कराया गया था, जिसे अब प्रेसीडेंसी कॉलेज के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1857 में कॉलेज छोड़ दिया। उन्होंने घर पर अंग्रेजी, बंगाली और संस्कृत की शिक्षा जारी रखी। मि. क्रिकैपटेरिका ( अंग्रेजी : MrKirkpatrick ) की देखरेख में, अंग्रेजी ज्ञान का एक यूरोपीय शिक्षक विकसित किया गया था। बाद के जीवन में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में एक लेखक, संपादक, प्रकाशक, परोपकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और कला, साहित्य और संस्कृति के महान संरक्षक के रूप में अपना योगदान दिया है।

अपने छोटे जीवन में, कालीप्रसन्ना अविश्वसनीय बहुमुखी गुणों वाले व्यक्ति थे। बहुत कम उम्र से उनके पास एक अजीब स्मृति थी, जिसे वे केवल एक बार देख या सुन सकते थे। 1853 में केवल चौदह वर्ष की आयु में बंगला भाषा के प्रचलन के लिए विद्यासाहिनी सभा की स्थापना इस शक्ति की विचित्र शक्ति की गवाह है।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर अपने कई पुराने साथियों के साथ इस युवक की एकजुटता देखकर और इस तरह के मनोरंजक थिएटर के एक संगठन के रूप में इस काम को करने में सक्षम करने के लिए आश्चर्यचकित थे। हुतम उल्लू डिजाइन उनकी अमर रचना है जहां उन्नीसवीं शताब्दी के कलकत्ता के बाबू समुदाय की एक स्पष्ट तस्वीर चित्रित है। सुनील गांगुली , उनका उपन्यास द टाइम ( उन दिनों में)) लेखन के समय, कालीप्रसन्ना ने चरित्र को एक प्रतीक के रूप में फिर से संगठित किया और इसमें नविनकुमार नामक एक समकालीन चरित्र को शामिल किया।

पियासा चौधरी

प्रचार प्रमुख

अखिल भारतीय साहित्य परिषद

पश्चिम बंगाल

प्रस्तुति- पलाश विश्वास

Kaliprasanna Singhaनोट- Kaliprasanna Sinha was a Bengali author, playwright, and philanthropist. His most famous work was the translation of the ancient Hindu epic Mahabharata into Bengali. Wikipedia

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

हमारे बारे में पलाश विश्वास

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

Check Also

paulo freire

पाओलो फ्रेयरे ने उत्पीड़ियों की मुक्ति के लिए शिक्षा में बदलाव वकालत की थी

Paulo Freire advocated a change in education for the emancipation of the oppressed. “Paulo Freire: …