जानिए लवणीय और क्षारीय मिट्टी में उगने वाले लाभकारी पौधों के बारे में

जानिए लवणीय और क्षारीय मिट्टी में उगने वाले लाभकारी पौधों के बारे में

Know about the beneficial plants growing in saline and alkaline soil

वृक्षों की अनेक प्रजातियों में भूमि लवणता एवं क्षारीयता को बर्दाश्त करने की क्षमता होती है अत: इन लवणरोधी एवं क्षाररोधी वृक्षों की प्रजातियों (Salt resistant and alkali resistant tree species) से लवणीय एवं क्षारीय भूमियों को आच्छादित कर न सिर्फ उनका पुनरूत्थान किया जा सकता है वरन् इन वृक्षों की प्रजातियों से आर्थिक लाभ भी कमाया जा सकता है।

करंज (Karanj in Hindi)

यह दलहनी कुल फैबेसी की छोटी अथवा मध्य आकार की वृक्ष की प्रजाति है जो लवणीय एवं क्षारीय भूमि पर सफलतापूर्वक उगती है। करंज का वैज्ञानिक नाम पोंगामिया पिन्नाटा (Scientific name of karanj is Pongamia pinnata,) है। करंज की वृद्धि दर काफी तेज होती है। यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है। करंज के बीज से प्राप्त तेल गठिया, त्वचा एवं बिमारियों के इलाज में प्रभावी होता है। करंज के बीज के तेल का औद्योगिक उपयोग (Industrial Uses of Karanj Seed Oil) साबुन, मोमबत्ती इत्यादि के निर्माण में होता है। इसके अतिरिक्त तेल का उपयोग जलाने हेतु भी किया जाता है। बीज के तेल को परिसंस्करण के पश्चात् बायोडीजल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अत: बीज अथवा बीज के तेल से आर्थिक लाभ की प्राप्ति की जा सकती है।

करंज की पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण इसका उपयोग पालतु पशुओं के चारे हेतु किया जाता है। करंज की पत्तियों का उपयोग हरी खाद के रूप में (Use of karanj leaves as green manure) भी किया जाता है। करंज के बीज की खली का उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। लकड़ी का इस्तेमाल हल तथा बैलगाड़ी की पहिया बनाने एवं ईधन के रूप में किया जा सकता है।

अर्जुन वृक्ष (Arjun tree in Hindi)

अर्जुन एक बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के काम्बरिटेसी कुल का सदस्य है। अर्जुन का वैज्ञानिक नाम टर्मिनेलिया अर्जुना (Scientific name of Arjuna Terminalia arjuna) है। अर्जुन की छाल में औषधीय गुण (Medicinal properties of Arjuna bark) पाये जाते हैं जिसका उपयोग हृदय सम्बन्धी बीमारियों के उपचार हेतु किया जाता है। अत: अर्जुन की छाल को औषधीय कम्पनियों को बेचकर आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है। इसकी पत्तियों को हरे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अर्जुन की पत्तियों का उपयोग (uses of arjuna leaves) रेशम कीटों के पालन हेतु भी किया जा सकता है।

बहेड़ा (Scientific name of Bahera Hindi name)

यह एक विशाल वृक्ष की प्रजाति है बहेड़ा का वैज्ञानिक नाम टर्मिनेलिया बेलेरिका (Scientific name of Bahera Terminalia bellirica) है। यह पुष्पीय पौधों के काम्बरिटेसी कुल का सदस्य है। बहेड़ा वनस्पति अपने औषधीय गुणों के लिए विख्यात है।

बहेड़ा वृक्ष के छाल एवं फल में औषधीय गुण पाये जाते हैं। वृक्ष के तने के छाल का उपयोग एनिमिया तथा ल्युकोडरमा के उपचार में किया जाता है।

बहेड़ा फल का उपयोग बदहजमी, कब्ज, जलोदर, बवासीर, डाइरिया, कुष्ठ रोग के उपचार में किया जाता है। फल का उपयोग ‘त्रिफला चूर्ण’ जैसी आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण में होता है। अत: फल से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बहेड़ा की पत्तियों को हरे चारे के रूप में पालतू पशुओं हेतु इस्तेमाल किया जा सकता है।

आंवला (Indian gooseberry in Hindi)

आंवला तेज वृद्धि दर वाली छोटे वृक्ष की प्रजाति है जिसमें लवणीय एवं क्षारीय मृदा में उगने की क्षमता होती है। आंवला का वैज्ञानिक नाम फाइलेन्थस एम्बलिका (scientific name of amla Phyllanthus emblica) है। यह पुष्पीय पौधों के फाइलेन्थेसी कुल का सदस्य है। आंवला के फल का उपयोग मुरब्बा, च्यवनप्राश, चटनी, कैंडी, अचार, आदि बनाने में होता है। आंवले का फल विटामिन सी का उत्तम स्रोत होता है। फल की बाजार में मांग होने से इससे आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आंवला के सूखे फल के चूर्ण का उपयोग देशी दवा के रूप में कब्ज के उपचार में किया जा सकता है। आंवला की पत्तियों का उपयोग (use of amla leaves) आँख की बिमारियों जैसे आप्थाल्मिया (ophthalmia) तथा अंधेपन के उपचार (treatment of blindness) में किया जाता है। लकड़ी का उपयोग कृषि औजार बनाने में किया जाता है।

इमली (Tamarind in Hindi)

इमली फैबेसी कुल से संबद्ध विशाल वृक्ष की प्रजाति है। इमली का वैज्ञानिक नाम टैमेरिन्डस इंडिका (Scientific name of tamarind is Tamarindus indica) है। इमली के फल में 12 प्रतिशत टारटेरिक अम्ल पाया जाता है। इमली के फल का उपयोग चटनी आदि बनाने में होता है। इमली के बीज जेलोज का स्रोत होती है जिसका उपयोग कपास एवं पटसन उद्योग में होता है। इमली की लकड़ी के टिकाऊ होने के कारण इसका व्यापक उपयोग निर्माण कार्यों में होता है। लकड़ी का इस्तेमाल ईधन रूप में भी किया जा सकता है।

शिरीष (Shirisha in Hindi)

Shirisha Tree Benfits in Hindi,

शिरीष दलहनी कुल फैबेसी से संबद्ध एक विशाल बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है। शिरीष का वैज्ञानिक नाम अल्बिजिया लेब्बेक (Scientific name of Shirisha is Albizia lebbeck) है। शिरीष की हरी पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण इसका इस्तेमाल हरे चारे के रूप में किया जाता है। शिरीष की लकड़ी काफी मजबूत एवं टिकाऊ होती है अत: इसका उपयोग निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। शिरीष की लकड़ी को सागौन एवं शाखू के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सूखी पत्तियों के काढ़े का इस्तेमाल श्वास सम्बन्धी बिमारियों जैसे दमा, ब्रान्काइटिस इत्यादि के उपचार में होता है।

सफेद शिरीष

सफेद शिरीष तेज वृद्धि दर वाली विशाल वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के फैबेसी कुल का सदस्य है। सफेद शिरीष का वैज्ञानिक नाम अल्बिजिया प्रोसेरा (Scientific name of white Shirisha Albizia procera) है। सफेद शिरीष के वृक्ष का तना सफेद रंग का होता है अत: इसे सफेद शिरीष के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसमें लवणता को बर्दाश्त करने की प्रचुर क्षमता होती है। लकड़ी निर्माण कार्यों हेतु अति उत्तम होती है। पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण उन्हें हरे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

बेर

यह एक छोटे आकार की कंटीली वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय वनस्पतियों के रैमनेसी कुल का सदस्य है। बेर का वैज्ञानिक नाम ज़िज़ीफस मॉरिटियाना (Scientific name of plum is Ziziphus mauritiana) है। बेर की वृद्धि दर काफी तेज होती है। इसका फल खाने योग्य तथा फास्फोरस का प्रमुख स्रोत होता है। फल से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बेर की पत्तियों का उपयोग (use of plum leaves) हरे चारे के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त पत्तियों का उपयोग रेशम कीट पालन में भी किया जा सकता है।

शहतूत

यह छोटे आकार की वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के मोरेसी कुल की सदस्य है। शहतूत का वैज्ञानिक नाम मोरस अल्बा (Scientific name of mulberry is Morus alba) है। शहतूत का फल खाने योग्य होता है। शहतूत के फल में विटामिन सी तथा खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होते हैं। अत: फल की बाजार में मांग से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शहतूत की पत्तियों का उपयोग बड़े पैमाने पर रेशम कीट पालन में किया जाता है। लकड़ी का उपयोग खेल सम्बन्धी उपकरणों जैसे हाकी स्टिक, टेनिस रैकेट, बैडमिन्टन रैकेट, क्रिकेट स्टम्प इत्यादि के निर्माण में होता है।

उपर्युक्त वृक्षों की प्रजातियां लवणीय एवं क्षारीय भूमि में सफलतापूर्वक उगने की क्षमता रखती हैं। यह प्रजातियाँ अपने मृत अवशेषों जैसे पत्तियां, टहनियां, पुष्पों आदि को लवणीय मृदा सतह पर गिराती हैं जिनके विघटन से धीरे-धीरे मृदा के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में परिवर्तन होता है परिणामस्वरूप मृदा अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है जिसका उपयोग पुन: फसल उगाने हेतु किया जा सकता है।

– डॉ. अरविन्द सिंह

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

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