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Environment and climate change

जानिए मनुष्य का शरीर कितना तापमान बर्दाश्त कर सकता है

Know how much temperature a human body can tolerate

What changes occur in our body with temperature fluctuations

एक मित्र ने बहुत आसान-सा सवाल पूछा था। भोपाल में उस दिन पारा 45 डिग्री सेल्सियस को छू रहा था। उन्होंने इस तापमान को फैरनहाइट में बदला तो यह हमारे शरीर के सामान्य तापमान (98.4 डिग्री फैरनहाइट) से काफी अधिक (113 डिग्री फैरनहाइट) निकला। चिंता की बात यह थी कि हमारा शरीर इतने अधिक तापमान को संभालता कैसे है। आइए देखते हैं कि तापमान में उतार-चढ़ाव के साथ हमारे शरीर में क्या परिवर्तन होते हैं।

All chemical reactions of organisms are carried out with the help of some catalyst.

इस मामले में चिंता का प्रमुख कारण यह है कि हमारे व अधिकांश अन्य जंतुओं के शरीर के अंदर जो रासायनिक क्रियाएं चल रही हैं, जो हमें जीवित रखती हैं, चलता-फिरता रखती हैं, वे कुछ इस तरह एडजस्ट हुई हैं कि 37-38 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही बढ़िया से चलती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जीवों की सारी रासायनिक क्रियाएं किसी न किसी उत्प्रेरक की मदद से चलती हैं। ये उत्प्रेरक 37 डिग्री सेल्सियस पर ही भलीभांति काम करते हैं। इनके कामकाज (और हमारे स्वस्थ बने रहने) के लिए जरूरी है कि शरीर का अंदरूनी तापमान 37-38 डिग्री सेल्सियस के इर्द-गिर्द बना रहे।

According to the maintenance of temperature, biologists have divided all animals into two groups.

जीव वैज्ञानिकों ने तापमान के रख-रखाव के हिसाब से सारे जंतुओं को दो समूहों में बांटा है। एक वे जंतु हैं जो बाहरी वातावरण के तापमान में कमी-बेशी होने पर भी अपने शरीर का तापमान स्थिर बनाए रखने की क्षमता से लैस होते हैं।

बाहरी वातावरण का तापमान घटने-बढ़ने पर इनके शरीर में कुछ ऐसी क्रियाएं शुरू होती हैं जो शरीर के तापमान को यथेष्ट स्तर पर बनाए रखती हैं। किसी समय इन्हें गर्म खून वाले जंतु कहा जाता था, आजकल इन्हें स्थिर तापमान वाले जंतु कहते हैं।

दूसरे किस्म के जंतु वे हैं जिनके शरीर में तापमान को स्थिर बनाए रखने की कोई व्यवस्था नहीं होती। लिहाजा, इनके शरीर का तापमान बाहरी वातावरण के साथ घटता-बढ़ता है। ये अपना काम चलाने के लिए व्यवहार में परिवर्तन (जैसे छाया में चले जाना, पानी में उतर जाना, जमीन के नीचे घुस जाना वगैरह) पर निर्भर रहते हैं। पहले इन्हें ठंडे खून वाले जंतु कहते थे।

मनुष्य पहले किस्म के जंतु हैं, जो अपने शरीर का तापमान स्थिर बनाए रखने के लिए आंतरिक क्रियाओं पर निर्भर हैं। मौसम को देखते हुए बात को सिर्फ बढ़ते तापमान के संदर्भ में देखेंगे। बाहरी वातावरण के बढ़ते तापमान से बचाव के लिए मनुष्य के शरीर में जो प्रमुख क्रियाविधि है वह पसीना आने की है। पसीना आना एक अनैच्छिक क्रिया है जो बाहरी तापमान को भांपकर स्वत: शुरू हो जाती है। हमारी चमड़ी में खून की नलिकाओं का जो जाल फैला है, वही इस क्रिया के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाता है।

अब इसमें न जाएं कि मस्तिष्क से किस ग्रन्थि को क्या संदेश मिलता है और वह पसीना छोडऩा शुरू कर देती है।

Evaporation produces coolness.

लब्बो लुआब यह है कि जब पसीना शरीर से बाहर निकलता है और हवा के संपर्क में आता है तो उसका वाष्पीकरण शुरू हो जाता है। जैसा कि सब जानते हैं वाष्पीकरण से ठंडक पैदा होती है। यदि नहीं जानते तो बता दें कि वाष्पीकरण से ठंडक होने का सबसे बढ़िया उपयोग हम मटके के रूप में करते हैं।

मटका रंध्रमय होता है, रंध्रों में से पानी बाहर निकलता है और मटके की सतह पर आकर वाष्पीकृत हो जाता है। परिणामस्वरूप मटके के अंदर का पानी ठंडा हो जाता है।

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In summer, the human body acts like a pot

देखा जाए तो गर्मियों में मनुष्य का शरीर एक मटके की तरह काम करता है। पसीना निकलता है, त्वचा की सतह पर आकर वाष्पीकृत होता है और शरीर के अंदरुनी हिस्से को ठंडा बनाए रखता है। चूंकि चलती हुई हवा वाष्पीकरण को बढ़ावा देती है, इसलिए पंखे के नीचे बैठना सुकून देता है। दूसरी ओर, यदि वातावरण में पहले से बहुत नमी (उमस) हो तो पसीने का वाष्पीकरण भलीभांति नहीं हो पाता। इसीलिए नमीयुक्त स्थानों पर या बारिश में तापमान बहुत अधिक न हो तब भी परेशानी होने लगती है।

जाहिर सी बात है कि यदि बाहर का तापमान बढ़ रहा है और आपका शरीर पसीना उड़ा रहा है, तो पानी की ज्यादा जरूरत होगी। इसलिए गर्मियों में ज्यादा प्यास लगती है। यदि पानी न मिले तो पसीना बनने और उड़ने की क्रिया बाधित होती है और शरीर का तापमान बढ़नेलगता है यानी बुखार आ जाता है। यदि तापमान बढ़ने की यह क्रिया बहुत तेजी से हो तो इसे लू लगना कहते हैं और यह स्थिति जानलेवा हो सकती है।

एक-दो छोटी-छोटी बातें कहकर बात समाप्त करते हैं।

पहली बात यह है कि पसीने के अलावा शरीर कई अन्य तरीके भी आजमाता है। इनमें से एक महत्वपूर्ण तरीके का सम्बंध इस बात से है कि शरीर में गर्मी पैदा होने की दर कम कर दी जाए। सामान्यत: हमारे शरीर में सबसे अधिक गर्मी मांसपेशियों के काम से पैदा होती है। तापमान बढ़ने पर मस्तिष्क मांसपेशियों को कम काम करने का संदेश देता है।

Why is summer tired

गर्मियों में थकान की यही वजह है। दूसरी बात है कि पसीना सिर्फ पानी नहीं होता। यदि आपने कभी चखा हो तो पसीना खारा होता है। यह खारापन पसीने में लवणों की उपस्थिति की वजह होता है। इसका मतलब है कि पसीने के साथ शरीर से लवण भी निकल जाते हैं। लवण शरीर की कई क्रियाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब लवण निकलते हैं तो शरीर के सुचारु कामकाज में दिक्कत आने लगती है। इसलिए पानी के साथ आपको लवणों की क्षतिपूॢत करनी होती है।

अब एक ही सवाल रह जाता है कि इस तरह बाह्य तापमान के किस हद तक बढ़ने पर हमारा शरीर मामले को संभाल पाएगा। इसमें पहली ध्यान देने की बात यह है कि ताप नियंत्रण के लिए हम सिर्फ पसीने पर निर्भर नहीं हैं। इसके लिए हम कई व्यवहारगत उपाय भी अपनाते हैं। जैसे छाया में रहना, धूप में निकलते वक्त सिर को ढंककर रखना, एक-दो बार नहा लेना या सिर पर पानी डाल लेना वगैरह। ये सब गर्मी के स्रोत को न्यूनतम करने के प्रयास हैं। कई इलाकों में दिन का तापमान छाया में 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। पर्याप्त पानी (लवण-शकर युक्त) पीकर, सीधी धूप से बचकर वहां भी लोग इससे निपट ही लेते हैं।

डॉ. सुशील जोशी

(मूलतः देशबन्धु पर प्रकाशित लेख का संपादित अंश)

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