शासक तय करें वे गांधी के साथ हैं या गोडसे के – राम पुनियानी

Dr. Ram Puniyani - राम पुनियानी

जानिए संयुक्त राष्ट्र संघ गांधी के जन्मदिवस को अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है

Know the United Nations celebrates Gandhi’s birthday as Ahimsa Day | Report on world non-violence day

The International Day of Non-Violence is marked on 2 October, the birthday of Mahatma Gandhi, leader of the Indian independence movement and pioneer of the philosophy and strategy of non-violence.

इंदौर। यह विडम्बना है कि एक ओर जहाँ प्रधानमंत्री राजघाट पर गांधी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, वही उनके समर्थक ट्विटर पर गोडसे अमर रहे का हैशटैग (Godse Amar Rahe hashtag on Twitter) ट्रेंड कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ गांधी के जन्मदिवस को अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है, वहीं देश में गांधीवाद को इरादतन समाप्त करने के प्रयास हो रहे हैं। गांधी भक्तिकाल के संतों तथा सूफी परंपरा से विकसित हुए थे, जो इंसान को इंसान से जोड़ती है।

ये विचार व्यक्त किए विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षाविद राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर राम पुनियानी ने।  

प्रोफेसर राम पुनियानी (Professor Ram Puniyani) अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) की मध्यप्रदेश इकाई द्वारा आयोजित आभासी जूम मीटिंग में बोल रहे थे।

“गांधी के सपनों का भारत और आज का भारत” विषय पर आयोजित इस बैठक में बड़ी तादाद में शांति के समर्थकों ने सहभागिता की।

प्रो. राम पुनियानी ने अपने संबोधन में कहा कि गांधी जी ने आजाद भारत के लिए जो सपना देखा था आज उनके विचारों के विपरीत देश का संचालन हो रहा है। गांधीजी धर्म को राजनीति से अलग रखने के समर्थक थे। आजादी मिलने के पश्चात जब सोमनाथ मंदिर निर्माण की बात सामने आई तो गांधी जी ने कहा था कि मंदिर बनाना सरकार का काम नहीं है। हिंदू समाज स्वयं मंदिर बनाने में सक्षम है। गांधी व नेहरू नहीं चाहते थे कि तत्कालीन राष्ट्रपति सोमनाथ मंदिर समारोह में शामिल हों नेहरू जी ने आधुनिक उद्योग, संरचनाओं, बांधों, शिक्षण संस्थानों को ही आधुनिक भारत के मंदिर बताया था। वर्तमान में प्रधानमंत्री राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास करते हैं। आज एक तरफ शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और विकास का चिन्तन है, दूसरी ओर मंदिर बनाने वाली पिछड़ी विचारधारा हैं।

उन्होंने कहा कि गांधी की विचारधारा ने दुनिया के कई नेताओं को प्रभावित किया था अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग द्वितीय ने गांधी से सत्याग्रह सीखा, जिसमें दुश्मन के लिए भी नफरत नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला भी गांधी जी से प्रेरित थे। गांधी को अफ्रीका में जिस स्टेशन पर धक्का देकर उतारा गया था आज वहां गांधी जी की प्रतिमा स्थापित है। इसी घटना से मोहनदास के महात्मा बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी।

श्री पुनियानी ने कहा कि अफ्रीका से देश लौटने पर उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव पर देश और देशवासियों को समझने के लिए उन्होंने रेलगाड़ी की तीसरी श्रेणी की बोगी में यात्रा की। इसी माध्यम से उन्होंने गुलाम भारत के लोगों की पीड़ा को समझा। सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सत्ता का विरोध किया। आजादी के आंदोलन में आमजन को जोड़ना उनका बड़ा योगदान था

Indian nationalism cannot be complete without the participation of Dalits, women.

प्रो. राम पुनियानी ने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद दलितों, महिलाओं की भागीदारी के बिना पूरा नहीं हो सकता। हिंदू व मुस्लिम राष्ट्रवाद अतीत से खुद को जोड़ता हैं। गांधी द्वारा संचालित राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन में सभी धर्मावलंबी शामिल रहते थे। इसी आधार पर गांधी जी ने देश को एकता के सूत्र में बांधा। गांधी के अनुसार धर्म सार्वभौम होता है। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने सदैव गांधी का विरोध किया। ये संगठन स्वतंत्रता संग्राम से दूर रहे। वर्ष 1935 से 1948 तक गांधी जी पर कई जानलेवा हमले हुए थे।

राम पुनियानी ने गांधी जी पर प्रचारित कई आरोपों का तर्क पूर्ण तरीके से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि गांधी पर पाकिस्तान बनाने का आरोप लगाया जाता है। जबकि विभाजन के सबसे बड़े विरोधी स्वयं गांधी और मौलाना आजाद थे। विभाजन के लिए अंग्रेजों की बांटने की नीति काम कर रही थी। पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपए देने के गांधी के आग्रह पर पुनियानी ने कहा कि विभाजन के समय अन्य संसाधनों के साथ कोष का भी विभाजन हुआ था। पाकिस्तान के हिस्से में 120 करोड़ रुपए आए थे। 65 करोड़ रुपए उसे दिए जा चुके थे 55 करोड़ रुपए देना बाकी थे। इसी बीच कश्मीर पर हमला हुआ (उल्लेखनीय है कि उस समय तक कश्मीर भारत का अंग नहीं था ) तब आक्रोशित लोग पाकिस्तान को शेष रकम न देने की बात करने लगे। गांधी जी का कहना था कि अनैतिक धन से हम अपने देश का विकास प्रारंभ नहीं कर सकते। 1935 में न तो देश विभाजन की चर्चा थी नाही पाकिस्तान के निर्माण की, फिर भी गांधी पर हमला हुआ था। क्योंकि हिंदू राष्ट्रवादी ब्राह्मण परंपरा के आधार पर देश संचालित करना चाहते थे। गांधी स्वयं को हिंदू कहते थे लेकिन वह संघ के हिंदुत्व से सहमत नहीं थे। इसी के चलते उन पर विभाजन के पूर्व से ही हमले होने लगे थे। आखिरकार वर्ष 1948 में ये लोग गांधी को मारने में सफल रहे।

उन्होंने बताया कि गांधी धर्म को निजी अवधारणा मानते थे। उनके अनुसार शासन का काम जनता के जीवन को आसान बनाना है ना कि धर्म स्थलों का निर्माण करना। यह प्रवृत्ति भारत में ही नहीं अन्य कई देशों में भी देखी जा रही है, पाकिस्तान में इस्लाम श्रीलंका में बौद्ध तथा कई यूरोपीय देशों में ईसाइयत के प्रतीक चिन्हों का उपयोग सत्ता प्राप्ति के लिए किया जा रहा है। हिंदुत्व की राजनीति करने वाले इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वालों को विदेशी बताकर उन पर हमला करते हैं। राम मंदिर के लिए रथ यात्रा से अब तक देश दो भागों में बट चुका है। एक तरफ गांधी का हिंदू धर्म है दूसरी तरफ गोडसे की विचारधारा का हिंदुत्व। गांधी जी ने कहा था कि शासक जब नीतियां बनाते हैं तो उनके ध्यान में वह व्यक्ति होना चाहिए जो विकास की पंक्ती में सबसे अंत में खड़ा हो, वंचित और पीड़ित हो। वर्तमान में अंतिम आदमी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से बाहर धकेल दिया गया है। आज गांधी की सोच के विपरीत कार्य हो रहे हैं। जीडीपी गिर रही है पूंजीपतियों की संपत्ति बढ़ रही है। देश के संवैधानिक मूल्यों को नष्ट किया जा रहा है। मस्जिद तोड़ने वालों को ही जमीन दे दी गई। तोड़ने के सभी आरोपी रिहा कर दिए गए। देश में हिंदू राष्ट्रवाद स्थापित किया जा रहा है।

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति अंतर्गत सांप्रदायिक राजनीति में राजा का धर्म ही राष्ट्र का धर्म बताया गया। गांधी ने हिंद स्वराज में लिखा कि देश में मुस्लिम राजाओं के शासन में हिंदू और हिंदू राजाओं के शासन में मुस्लिम प्रजा शांति से रहती थी। उनके दरबारों में भी दोनों धर्मावलंबी उच्च पदों पर भी रहते थे। नेहरू ने भी डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारत के इतिहास की गंगा जमुनी संस्कृति का उल्लेख किया है।

गांधीजी सामाजिक धरातल पर भी काम कर रहे थे छुआछूत के विरोध में ही उन्होंने वर्धा आश्रम में एक दलित परिवार को रहने के लिए स्थान दिया तो उन्हें अनुदान मिलना बंद हो गया। दिल्ली में गांधी जी हरिजन बस्ती में ही रहते थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे उसी वैवाहिक आयोजन में शामिल होंगे जो अंतर जाति होगा। इस तरह वे जाति प्रथा को भी तोड़ना चाहते थे। गांधी निरंतर विकसित हो रहे थे। आज दलितों, महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। मुसलमानों ईसाइयों के विरुद्ध नफरत फैलाई जा रही है। करोना जिहाद, यूपीएससी जिहाद ,सुदर्शन टीवी सांप्रदायिकता फैलाने के नए औजार हैं।ऐसे में गांधी को सामने लाना जरूरी है।

राम पुनियानी के अनुसार नफरत फैलाने वालों के संगठन निरंतर सक्रिय हैं। महाराणा प्रताप और शिवाजी को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़कर प्रचारित किया जा रहा है। लोगों तक सही तथ्य पहुंचाने की जरूरत है। आमजन को शिक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है। नफरत की दीवार कैसे तोड़ी जाए इसके तरीके तय करना होंगे। बहुलवादी लोकतांत्रिक राष्ट्र बचाए रखने तथा सांप्रदायिक ताकतें पुनः सत्ता में ना आ सके इस हेतु काम करना होगा। देश में नफरत फैलाने वाले कम तथा सद्भाव के समर्थक अधिक हैं, लेकिन वे संगठित नहीं है। इसे हेतु भी प्रयास करने होंगे।

एनआरसी के विरोध में चला शाहीन बाग आंदोलन (Shaheen Bagh movement against NRC) इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है, उसकी ऊर्जा का उपयोग किया जाना चाहिए। जनता के मुद्दों दलितों, आदिवासियों , महिलाओं के साथ महंगाई, रोजगार के सवालों पर मध्यवर्गीय समाज और संगठनों में तालमेल बिठाए जाने की जरूरत है।

      वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने कहा कि आज भी ग्राम स्वराज्य की गांधी की अवधारणा प्रासंगिक है। इससे ग्रामीण बेरोजगारी दूर की जा सकती है। गांधी की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की नीति को छोड़ दिया है। गांधीजी धर्मनिरपेक्षता के मैदानी संरक्षक थे। आज देश में दलित, मुसलमान ,आदिवासी सभी असुरक्षित हैं। दलितों पर अत्याचार के विरोध में समाज मौन रहता है। जबकि अमेरिका में जब नीग्रो पर हमला हुआ तो सारा देश उठ खड़ा हुआ।

      कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ समाजसेवी प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता आनंद मोहन माथुर ने कहा कि कल्याणकारी राज्य के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आजादी जरूरी है। आज देश में 1947 के पूर्व की स्थिति है। लोकतंत्र में सामूहिक निर्णय होता है, देश में एक ही व्यक्ति सब फैसले ले रहा है। एक वर्ष से अधिक समय हो गया है कश्मीर के 80 लाख निवासी कैद में हैं। नारकीय जीवन जीने पर विवश हैं। उन्हें बोलने की आजादी नहीं है। सरकार के आलोचकों को देशद्रोही बताया जा रहा है। देश के कई विद्वान लंबे अरसे से जेलों में बंद हैं। महिलाएं, आदिवासी, दलित सभी पीड़ित हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक परेशान किए जा रहे हैं। आजादी से पहले रेलवे निजी हाथों में था आज पुनः उसका निजी करण किया जा रहा है। पुरा संपदा लाल किला, ताजमहल , आर्थिक उपक्रम बैंक, बीमा, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग सभी चंद पूंजीपतियों को सौंपे जा रहे हैं। मजदूरों, किसानों का विरोधी कानून एक ही दिन में लागू कर दिए गया। इन सब मुद्दों पर विचार की जरूरत है। इस दमनकारी सत्ता को बदलने के लिए सबको साथ आना होगा।

विषय पर प्रारंभिक वक्तव्य देते हुए एप्सो के राष्ट्रीय महासचिव पुडुचेरी के विधायक के. लक्ष्मीनारायण ने कहा कि देश की स्वतंत्रता के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया गया था। यह संघर्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए था। गांधी बीसवीं सदी के वैश्विक नेता थे। वर्तमान में अल्पसंख्यकों पर हिंसा हो रही है, विरोध को दबाया जा रहा है। वर्तमान भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता को नहीं मानती, नहीं उसका संविधान में भरोसा है। भारत सरकार गांधीवाद से खुद को मुक्त कर चुकी है। बिना किसी शर्म अथवा झिझक के वह कल्याणकारी राज्य की संकल्पना से इंकार कर रही है। सारी दुनिया गांधी को मानती है अपने ही देश में गांधी की अवहेलना हो रही है।

कौन हैं प्रोफेसर राम पुनियानी | Biography of Professor Ram Puniyani in Hindi

अतिथि राम पुनियानी का परिचय देते हुए एप्सो के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने बताया कि छात्र जीवन से ही राम वाम विचारों से प्रभावित रहे। वे धर्मनिरपेक्षता के लिए आंदोलन चलाना चाहते थे। कामरेड एबी वर्धन ने उन्हें पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा। बाद में उन्होंने आईआईटी मुंबई में शिक्षण का कार्य किया। डॉक्टर असगर अली इंजीनियर के साथ उन्होंने देश में कई कार्य शालाओं में सम्मिलित रहकर अनेक लोगों को इतिहास की सही जानकारी दी। लोगों के विवेक को जागृत करने, मिथकों की सच्चाई को बताने का कार्य किया है। वे आज भी धर्मनिरपेक्षता के लिए सक्रिय हैं।हालांकि उन्हें आए दोनों कट्टरपंथियों द्वारा धमकियां मिलती रहती है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए एप्सो राज्य इकाई के महासचिव अरविंद पोरवाल ने कहा कि महात्मा गांधी के माध्यम से वर्तमान परिस्थितियों के आकलन हेतु यह आयोजन रखा गया है।

आभार व्यक्त करते हुए एप्सो राज्य अध्यक्ष मंडल के सदस्य आलोक खरे ने संपूर्ण चर्चा को सारगर्भित बताते हुए कहा कि वर्तमान भारत में शासकों द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां इजारेदार घरानों के पक्ष में हैं। अब भारत गांधी का देश नहीं रहा है।

2 घंटे से अधिक समय तक चले इस कार्यक्रम में अनेक श्रोताओं सुप्रिया, शाहिद कमाल, रामाश्रय पांडे, प्रवीण, सी एस भदोरिया जी, अरुण कांत शुक्ला, सुनीता चतुर्वेदी आदि ने कई सवाल खड़े किए जिनका जवाब वक्ताओं ने दिया। तकनीकी सहयोग विवेक मेहता ने किया।

(रिपोर्ट – हरनामसिंह चंदवानी )

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