जानिए यह कृषि कानून किसके हित में है ?

जब यह इतना महत्वपूर्ण कृषि कानून है कि, कॉरपोरेट और किसान दोनों ही इसे नहीं चाहते हैं तो, फिर सरकार इसे रद्द कर के नए कानून ड्राफ्ट कर उस पर क्लॉज दर क्लॉज सदन में चर्चा क्यों नहीं करा लेती ? हर कानून में क्लॉज दर क्लॉज चर्चा होती है, और बिना उसे ठोंक बजाए सदन में प्रस्तुत ही नहीं किया जाता।

Know who is in the interest of this agricultural law? : Vijay Shankar Singh

यह कृषि कानून किसके हित में है, सरकार के,  कॉरपोरेट के, कंपनियों के या किसानों के या फिर यह दोनों कॉरपोरेट, अपने विरुद्ध प्रतिकूल वातावरण बनते देख कर अब यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनसे इन सब कृषि कानूनों से कोई लेना देना नहीं है ?

4 दिसंबर को सरकार और किसानों के बीच बात (Talk between government and farmers) तो हुई पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया। किसान सारे कृषि कानून की वापसी पर अड़े हैं और सरकार इस मांग को न माने जाने की जिद पर। अब अगली तारीख 8 जनवरी तय हुई है। लेकिन किसानों ने भी अपना एजेंडा तय कर दिया है (The farmers have also set their agenda)। अब यह देखना है कि 8 जनवरी को क्या होता है। मामला निपटता है या फिर कोई अगली तारीख पड़ती है।

कृषि कानून : आज यह प्रस्ताव मूलतः असंवैधानिक है।

सरकार कह रही है कि, कृषि कानूनों पर सरकार और किसानों के बीच,  क्लॉज दर क्लॉज वार्ता हो। वार्ता का यह तरीका अच्छा है और क्लॉज दर क्लॉज वार्ता होनी भी चाहिए थी। पर कानून बनने के पहले। आज यह प्रस्ताव मूलतः असंवैधानिक है। किसी भी कानून पर, क्लॉज दर क्लॉज वार्ता तो संसद में होती है जब बिल पेश होता है। वहां, उस बिल पर सांसद अपनी बात करते हैं और वे अपने संशोधन रखते हैं। यदि कोई आपत्तियां होती हैं तो उसे प्रस्तुत करते हैं और यह सब कार्य व्यापार, पूरा देश लाइव देखता है। बीच-बीच में हंगामा भी हो जाता है, और अधिक हंगामा होने पर सदन को स्थगित भी करना पड़ता है। लेकिन सदन पुनः बैठता है तो, फिर बहस उसी बिन्दु से शुरू होती है, जहां से सदन स्थगित हुआ रहता है।

सदन में हंगामे का यह दृश्य (This scene of uproar in the house), कुछ को अराजक लग सकता है, पर यह अराजकता नहीं है। लोकतंत्र में बातचीत, बहस, संवैधानिक डिबेट की एक प्रक्रिया और प्रथा है जो दुनिया भर की संसदों में अपनाई जाती है।

क्लॉज दर क्लॉज सदन में चर्चा सरकार क्यों नहीं करा लेती ?

पर जब यह इतना महत्वपूर्ण कृषि कानून है कि, कॉरपोरेट और किसान दोनों ही इसे नहीं चाहते हैं तो, फिर सरकार इसे रद्द कर के नए कानून ड्राफ्ट कर उस पर क्लॉज दर क्लॉज सदन में चर्चा क्यों नहीं करा लेती ? हर कानून में क्लॉज दर क्लॉज चर्चा होती है, और बिना उसे ठोंक बजाए सदन में प्रस्तुत ही नहीं किया जाता। पर यह कानून जैसा कि वार्ता से लग रहा है, इसे तो ढंग से वार्ताकारों ने ही नहीं पढ़ा है। यदि उन्होंने पढ़ा होता तो, जो संदेह इस कानून को लेकर एक आम व्यक्ति भी पत्रकारों को धरनास्थल से बता रहा है, वह संदेह, आखिर इन्हें क्यों नहीं हो रहा है ?

यह कानून पारित किए जाने के पहले ही, सदन से सीधे संसदीय समिति को भेजा जाना चाहिए था, जहां क्लॉज दर क्लॉज इस पर चर्चा होती और फिर सदन में बहस होती और वोटिंग के बाद पास होता। लेकिन यह कानून संवैधनिक अनुशासन, और प्रक्रिया के अंतर्गत न तो सदन में लाया गया, न इस पर चर्चा हुई, और न ही निर्धारित संसदीय प्रक्रिया के अनुसार पारित किया गया। अब जब हलक में यह कानून अटक गया तो सरकार कह रही है कि, क्लॉज दर क्लॉज चर्चा हो !

This law is imposed by the government on the legislature

यह कानून सरकार द्वारा विधायिका पर थोपा गया है और न्यायपालिका बजाय इस कानून की संवैधानिकता पर विचार करने के फिलहाल खामोश है।

सरकार का कहना है कि कुछ किसान बिल के समर्थन में भी हैं और सरकार पहले उनसे भी बात करना चाहती है। अब जो किसान संगठन बिल के समर्थन में हैं ज़ाहिर है, किसान कानूनों को उन्होंने भी पढ़ा होगा। और उन कानूनों में उन्हें भी अपने हित में कुछ न कुछ मिला होगा।

अब सरकार को चाहिए कि कानून समर्थक किसानों को ही यह जिम्मेदारी दे दी जाय कि वह कृषि कानून विरोधी किसानों को उक्त बिल की खूबियां बताएं और कृषिकानून के विरोधियों से खामियां सुनें और समझें। सरकार तो कोई खूबी बता नहीं पा रही है, सिवाय इस गोलमोल बात के कि यह कानून किसान हित में है।

फिर भी सरकार क्लॉज दर क्लॉज चर्चा करना चाहती है तो, सरकार को चाहिए कि वह क्लॉज दर क्लॉज इन तीनों कृषि कानून की खूबियां बताये और किसानों को संतुष्ट करें। यह चर्चा और बातचीत यदि लाइव हो तो देश की जनता को भी इन कानूनों के बारे में वास्तविकता जानने का सौभाग्य मिल सकता है।

वैसे, कानून बनाना विधायिका का कार्य और दायित्व है। न कि विज्ञान भवन में वार्ताकारों का।

सरकार यह तो कह रही है कि वह संशोधन के लिये राजी है पर किसान बिल को ही वापस लेने और एक नए बिल जिसमें एमएसपी की कानूनन बाध्यता हो पारित कराना चाहते हैं।

सरकार को जनहित का सम्मान करना चाहिए और बिना इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये वापस लेकर कृषि सुधार के लिये एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन करना चाहिए।

एनडीए में भाजपा के सहयोगी दल जेडीयू के प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता कैसी त्यागी का यह उद्धरण भी पढ़ा जाना चाहिए। वे कहते हैं 

“जेडीयू को सरकार से शिकायत इस बात की है कि सरकार ने कृषि कानून सहयोगी पार्टी को विश्वास में लेकर नहीं लाए। संसद में हमने कृषि कानूनों का समर्थन किया है। हम एक मात्र विश्वसनीय और इकलौती सहयोगी पार्टी हैं, लेकिन हमारी भी शिकायतें हैं। सरकार को सहयोगी दलों को भी विश्वास में लेना चाहिए था। किसान संगठनों से वार्ता करनी चाहिए थी। आज तक जब भी विपक्षी दलों ने कहा कि बिल को स्टैंडिंग कमेटी में भेजा जाए तो अब तक भेजा जाता रहा है। फिर जो समिति फैसला देती है वो सबको मान्य होता है। सरकार ने ये भी नहीं किया। सरकार द्वारा बातचीत किए जाने का मैं समर्थन करता हूं। किसानों की मांगों के साथ हमारी सहानुभूति है। किसानों की मौतों को देखते हुए सरकार को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है।”

पहले अडानी ग्रुप ने बड़े-बड़े विज्ञापन जारी कर के बताया कि

● वे कृषि सेक्टर में दखल देने को बिल्कुल इच्छुक नहीं है। न वे फसल खरीदेंगे, न कीमत तय करेंगे और न ही कृषि व्यापार को प्रभावित करेंगे।

● उनके साइलो जो वे बना रहे हैं, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया एफसीआई के साथ एक अनुबंध के अंतर्गत बना रहे हैं।

अब रिलायंस के मुकेश अम्बानी ने भी कहा है कि,

● वे तो कृषि के विपणन, ज़मीन खरीदने, फसल उगाने, खेती करने, अनाज खरीदने की किसी भी योजना में न तो इच्छुक हैं और न ही उनकी कोई ऐसी योजना है।

● वे रिटेल सेक्टर में हैं। और इस सेक्टर के लिये वे कोई भी कृषि उत्पाद किसानों से सीधे नहीं खरीदते हैं और न वे आगे खरीदने की उनकी कोई योजना है।

● रिटेल सेक्टर के लिये वे बाजार से ही कृषि उत्पाद खरीदते हैं।

● रिलायंस किसी भी प्रकार की कांट्रेक्ट फार्मिंग में इंटरेस्टेड नहीं है।

अब जब दो प्रमुख और सरकार के नजदीक समझे जाने वाले कॉरपोरेट घराने कृषि सेक्टर में कोई रुचि नहीं रख रहे हैं और आगे भी वे कह रहे हैं कि, उनकी कोई योजना नहीं है तब सरकार किन कॉरपोरेट और बड़ी कम्पनियों के लिये ज़िद ठाने हुई है ?

अब तो मुकेश अंबानी का रिलायंस पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट पहुँच गया है कि उसकी संपत्तियों की रक्षा की जाय। हो सकता है वह अब सुप्रीम कोर्ट भी चला जाय। सुप्रीम कोर्ट में उसका केस हरीश साल्वे देख सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट सब छोड़-छाड़ कर तुरन्त सुनवाई भी कर दे। सॉलिसिटर जनरल तो तैयार होंगे ही। पर कोर्ट के किसी आदेश से कोई प्रभाव आंदोलन पर पड़ने वाला नहीं है। सब जानते हैं कि ये कॉरपोरेट एक दिन में बहुत सी नई कंपनियॉ बना लेंगे और फिर यह सब बयानबाजी हवा हो जाएगी।

इस नये कृषि कानूनों से होने वाले बदलाव से जिन दो कॉरपोरेट पर सबको शक हो रहा था, वे इस व्यापार में ही आने को इच्छुक नहीं हैं और किसान पहले ही दिन से इस नायाब कृषि सुधार का विरोध कर रहे हैं, तो फिर सरकार क्यों और किसके हित में,

● सरकारी मंडियों के सामने समानांतर मंडियां खड़ी कर रही है ?

● निजी मंडियों पर टैक्स नहीं लगा रही है ?

● कांट्रेक्ट फार्मिंग में किसान विरोधी प्राविधान शामिल कर रही है ?

● कांट्रेक्ट में कोई विवाद होने पर अदालती विकल्प से किसानों को वंचित कर रही है ?

● जमाखोरी को वैध बना रही है ?

● एमएसपी पर कोई बाध्यकारी कानून नहीं बना रही है ?

सरकार को अब ज़िद छोड़ कर तीनों कानून वापस ले लेने चाहिए और कृषि सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी और अन्य किसानों की समस्याओं के लिये जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया है एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन करके समस्या के समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।

जो रिलायंस आज प्रेसनोट जारी कर के कह रहा है कि वे कृषि सेक्टर में नहीं आएंगे और न ही उनकी कोई योजना है,

उसी रिलायंस ने जब जिओ की लांचिंग की थी तब भी यही कहा था कि यह फ्री रहेगा। लांचिंग में मुकेश अम्बानी ने प्रधानमंत्री जी के फोटो का दुरुपयोग भी किया था। प्रधानमंत्री की तस्वीर बिना सरकार की अनुमति के विज्ञापन में छापना राजचिन्ह अधिनियम 1950 के अंतर्गत दंडनीय अपराध (Offenses punishable under the Emblem Act 1950) है। कानूनन 30 से ज्यादा ऐसे फोटो और निशान हैं, जिनका भारत सरकार की अनुमति के बिना उनका  इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, महात्मा गांधी, यूनाइटेड नेशन ऑर्गेनाइजेशन, अशोक चक्र और धर्म चक्र भी शामिल हैं।

अब जिओ फ्री वाली बात, कुछ महीनों बाद खत्म हो गयी और फिर जैसे ही बाजार में जिओ की मोनोपॉली जमी और बीएसएनएल, एयरटेल, वोडाफोन आइडिया आदि कमज़ोर पड़े, उसकी भी दरें बढ़ने लगीं। यह सब बाजार और पूंजीपतियों के दांव है और लाभ कमाना हर कॉरपोरेट या व्यापारी का प्रथम और परम उद्देश्य होता है।

लाभ कमाइए। व्यापार का एक मूल उद्देश्य लाभ कमाना भी है। लाभ कमाने में कोई दिक्कत नहीं पर सरकार को खरीद कर नहीं, न ही किसी दल को अपनी दुकान कह के, न ही मोटी तनख्वाह पर रिटायर्ड नौकरशाहों और बैंक के चेयरमैनों को अपनी नौकरी में रख कर लाभ कमाइए। बल्कि सरकारी नियम औऱ कानूनों का पालन कर के लाभ कमाइए।

सरकार के प्रति जनता की भी अपेक्षाएं होती हैं, उसी जनता की, जो लम्बे समय तक लाइनों में लग कर सरकार चुनती है, और उसे आप सब अन्नदाता और जनार्दन कहते हैं। आज सरकार से जनता की नाराजगी कॉरपोरेट की तरफ इसलिए भी मुड़ गयी है कि जनता के मन में यह धारणा मजबूती से बैठ गयी है कि, सरकार कॉरपोरेट या खुल कर कहें तो रिलायंस और अडानी ग्रुप के शिकंजे में है।

हम आंदोलन के समर्थन में हैं और सरकार के खिलाफ भी। पर जो मित्र आंदोलन के खिलाफ और सरकार के पक्ष में हैं, वे यदि इस बात से सहमत हैं कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना चाहिए, तो वे ही कम से कम यह बता दें कि, सरकार इसके लिये क्या कर रही है और 8 दौर की वार्ता में सरकार ने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, इसलिए क्या प्रस्ताव दिया है ?

दरअसल सरकार रत्ती भर भी नहीं चाहती कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले।

सरकार चाहती है कि वह, फसल, ज़मीन, सहित कॉरपोरेट के सामने नतमस्तक रहे और किसान, ‘सवा सेर गेहूं‘ के वक़्त में पहुंच जाएं। जब सरकार, मुनाफाखोरों और जमाखोरों के लिये आवश्यक वस्तु अधिनियम को रद्द कर असीमित भंडारण की सुविधा इन जमाखोरों को दे सकती है तो क्या सरकार कभी यह चाहेगी कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले ? सरकार बस यह कह रही है कि वह एमएसपी जारी रखेगी। पर यह नहीं कह रही है कि सबको एमएसपी देगी कैसे। सरकार बस यह चाहती है कि यह बला टले और किसान वापस चले जाएं।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

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