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भारत में खेल संस्कृति का अभाव : जिम्मेदार कौन?

‘‘मैंने वाटरलू के युद्ध में जो सफलता प्राप्त की, उसका प्रशिक्षण ईटन के मैदान में मिला।’’

– नेल्सन

          नेपोलियन को पराजित करने वाले सूरमा एडवर्ड नेल्सन (Edward Nelson, the man who defeated Napoleon) की यह पंक्ति खेल के महत्व (importance of sports,) को बयान करने के लिए पर्याप्त है।

वर्तमान परिवेश व जीवनशैली में आज मनुष्य अनेक रोगों से ग्रस्त हो रहा है। ऐसे समय में खेलों का महत्व स्वयमेव स्पष्ट हो जाता है। खेल न केवल हमें स्वस्थ रहने में योगदान देकर सक्षम बनाते हैं, वरन् वर्तमान युग की संकीर्णतावादी सोच से निकालकर हमें निष्पक्ष, सहिष्णु तथा विनम्र बनाकर एक बेहतर मानव संसाधन के रूप में बदलते हैं।

परम्परागत रूप से भारत के मध्यम वर्ग की धारणा रोजगारपरकता के लिहाज से खेलों के प्रति नकारात्मक रही है। इन्हें मनुष्य के बौद्धिक विकास व रोजगार प्राप्ति में बाधक मानते हुए कहा जाता था ‘‘पढ़ोगे-लिखोगे तो होगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।’’ ऐसी मानसिकता के कारण ही, ओलम्पिक जैसे आयोजनों में भारत के प्रदर्शन को लेकर अक्सर व्यंग्य से कहा जाता है कि सवा अरब के देश वाले तीन पदक लेकर लौट आते हैं।

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जनसंख्या की दृष्टि से हम विश्व में दूसरे पायदान पर हैं, किन्तु खेलों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारा प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। हर स्तर पर खेल संस्कृति के अभाव ने हमें क्षति पहुँचाई है।

ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या समाज और संचार तकनीक से लैस देश का युवा वर्ग इस संस्कृति को अंगीकार करने के लिए तैयार नहीं है?

Lack of sports culture in India

एक क्षण को यह मान भी लिया जाए कि निर्धनता के मकड़जाल में फँसे एक-तिहाई जनसंख्या वाले भारतीय समाज के पास संसाधन और जागरूकता का अभाव है तो शासकीय नीति-नियंताओं ने खेल-संस्कृति के विकास के लिए कितने ईमानदार प्रयास किए हैं?

वैश्विक महाशक्ति बनने का दम भरने वाले सार्वजनिक और कॉरपोरेट तंत्र को यह समझने में कितना समय लगेगा कि खेलों का विकास, अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी में सभ्यता के आधुनिक होने का प्रमुख मानक है। भारत यदि वैश्विक स्तर पर खेलों में कोई प्रभावी पहचान नहीं बना पाया है, तो इसके पीछे की मुख्य वजह यही है कि भारत में खेल संस्कृति (Sports Culture in India,) का अभाव है।

Reasons for non-development of sports culture in India

भारत में खेल संस्कृति के न पनप पाने के कई कारण हैं खेल समितियों व प्रतिष्ठानों में जहाँ जमकर भ्रष्टाचार है, वहीं भाई-भतीजावाद व क्षेत्रवाद से भी ये अछूते नहीं हैं। भेदभाव के पक्षपात के आरोप भी इन पर लगते रहे हैं। नतीजतन प्रतिभाएँ तो हाशिए पर चली जाती हैं और मौका उन्हें मिलता है जिनके पास ऊँचे रसूख होते हैं। इसका प्रभाव प्रदर्शन पर पड़ना स्वाभाविक है। जब तक खेल समितियों व संस्थानों में पारदर्शिता नहीं होगी, खेल संस्कृति दम तोड़ती रहेगी। भारत में खेल जगत से जुड़ा समूचा परिदृश्य निराशा के स्याह बादलों से आच्छादित है। खेल संघों पर राजनीति और प्रशासन से जुड़े लोगों का दबदबा, फण्ड में भ्रष्टाचार, खिलाडि़यों के चयन में अनियमितता, पुरस्कार वितरण में होने वाले विवादों के बवंडर में खिलाडि़यों की मेहनत और प्रतिभा को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है।

खेल संघों के गैर-व्यावसायिक रवैये से आधारभूत ढांचे का विकास नहीं हो रहा है। यह विकास हो तो भी कैसे। जिन खेल संघों, समितियों व संस्थानों की बागडोर तपे हुए खिलाडि़यों के हाथों में सौंपी जानी चाहिए, वहाँ नौकरशाह व राजनेता बैठाए जाते हैं जिन्हें न तो खेलों की ‘ए बी सी डी’ ही आती है और न ही वे यह जानते हैं कि खेलों की आत्मा क्या होती है। ये खेलों के संवर्धन पर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। यही कारण है कि उच्च गुणवत्तापूर्ण तकनीक पूर्णतः अनुपलब्ध है। अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न तो हमारे पास संसाधन हैं और न ही अधोसंरचना। यही कारण है कि ओलम्पिक जैसी अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में हम एक स्वर्ण पदक के लिए तरसकर रह जाते हैं। खेलों के प्रति न तो हमारी दृष्टि ही व्यावहारिक है और न ही प्रयास। खेलों से जुड़ी डोपिंग जैसी बुराई ने हमारी छवि को खराब किया है। ये सारी बातें खेल संस्कृति के अभाव का ही हिस्सा हैं।

अन्य देशों में खिलाडि़यों को दी जाने वाली खेल सम्बन्धी सुविधाओं से तुलना करें तो हम अपने देश को सबसे पिछड़े पायदान पर पाते हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों को तो छोड़ ही दीजिए हम आसियान, कोरियन और अफ्रीकी देशों से भी बहुत ज्यादा पिछड़े हैं।

अफ्रीका के नाइजीरिया, केन्या, जिम्बाव्वे, घाना आदि में फुटबाल और एथलेटिक्स से सम्बद्ध उच्चस्तरीय आधारभूत संरचना है। चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम आदि में खेलों के विकास के सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। इन देशों में आधारभूत संरचना के विकास के साथ ही खिलाडि़यों के प्रशिक्षण की उच्च स्तरीय व्यवस्था की गई है।

वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो निराशा के गहरे कुहासे से उम्मीद की कुछ किरणें नजर आती हैं। भारत में निःसंदेह क्रिकेट सबसे लोकप्रिय विधा है। क्रिकेट से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं का विकास काफी हद तक किया भी जा चुका है। बीसीसीआई विश्व का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध क्रिकेट बोर्ड है। विज्ञापन और प्रसारण अधिकारों की बिक्री से इसे अकूत राजस्व मिलता है। लेकिन वर्तमान दौर में क्रिकेट के आईपीएल जैसे संस्करणों में स्पॉट फिक्सिंग तथा बोर्ड से जुड़े पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों से विश्वसनीयता खण्डित हुई है। साथ ही राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की व्यक्तिगत लिप्सा बुरी तरह क्रिकेट के दीर्घकालिक हितों पर हावी है। भारत में खेल-संस्कृति के ह्रास की पराकाष्ठ ही है कि राष्ट्रीय खेल हॉकी की दुर्दशा का अन्त करने की दिशा में ठोस पहल नहीं हो रही है। अब हॉकी टीम ओलम्पिक में सबसे निचले पायदान पर नजर आती है।

          खेल संस्कृति को विकसित करने में जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर उदासीनता है, वहीं इस सम्बन्ध में निजी क्षेत्र भी अपने दायित्वों से विमुख हैं।

निजी क्षेत्र का यह दायित्व बनता है कि वह देश में खेल संस्कृति के विकास एवं खेलों के प्रोत्साहन के लिए बढ़-चढ़कर प्रयास करें, किन्तु प्रायः इस क्षेत्र की तरफ से भी ठण्डेपन का परिचय दिया जाता रहा है जबकि कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत निजी क्षेत्र की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह खेलों के विकास तथा खेल संस्कृति के लिए भरपूर योगदान दें।

Dr. Mohammad Sharique Assistant Professor Deptt. of Physical Education Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi- Farsi University, Lucknow.
Dr. Mohammad Sharique
Assistant Professor
Deptt. of Physical Education
Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi- Farsi University, Lucknow.

खेल संस्कृति के अभाव के लिए हम सिर्फ सरकारी व निजी क्षेत्र को दोषी ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। हमारे देश में पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर भी उन अवयवों का अभाव है जो खेल संस्कृति के उन्नयन में सहायक होते हैं। पारिवारिक स्तर पर केवल पढ़ाई पर ही विशेष जोर देने के कारण, बच्चे को जहाँ ‘किताबी कीड़ा’ बना दिया जाता है, वहीं सामाजिक स्तर पर खेल प्रतिभाओं को वह प्रोत्साहन नहीं मिलता, जो मिलना चाहिए। कम्प्यूटर और टेलिविजन जैसे संचार माध्यमों ने बच्चों की वाह्य गतिविधियों पर भी विराम लगा रखा है।

स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन के लिए संभावित विकल्पों पर विचार किया जाए तो सर्वप्रथम खेल संघों को राजनीति और नौकरशाहों के शिकंजे से मुक्त कराना होगा। सूक्ष्म निगरानी एवं सुधारों के लिए एक केन्द्रीय मॉनीटरिंग संस्थान की स्थापना होनी चाहिए। सबसे प्रमुख है कि खेल और उससे जुड़े लोगों के आर्थिक हितों को संरक्षित किया जाए। खिलाडि़यों के उत्साह, प्रदर्शन में निरन्तरता हेतु घरेलू आयोजनों में वृद्धि की आवश्यकता है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए आगामी प्रतिस्पर्द्धा में निराशाजनक प्रदर्शन से बचने के लिए ठोस, पारदर्शी और दीर्घावधिक रणनीति के तहत कार्य करना चाहिए।

अभी स्थितियाँ इतनी बिगड़ी नहीं हैं कि उनसे उबरा न जा सके। व्यक्तिगत खेल स्पर्द्धाओं मसलन कुश्ती, बैडमिण्टन, गोल्फ, एथलेटिक्स, शतरंज, मुक्केबाजी, तीरंदाजी, टेनिस, भारोत्तोलन व निशानेबाजी आदि में भारतीय प्रदर्शन ने आशा का संचार किया है। अभिनव बिन्द्र, गगन नारंग जैसे निशानेबाजों पर हमें गर्व है। शतरंज में विश्वनाथन आनन्द ने विश्व में नाम रोशन किया। धीरे-धीरे स्थितियों में परिवर्तन आ रहा है, किन्तु अभी मंजिल दूर है। देश में खेल संस्कृति को सुदृढ़ बनाकर हम विश्व मंच पर भारत की दमदार उपस्थिति दर्ज करवा सकते हैं।

डॉ. मो. शारिक,

असिस्टेंट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग,

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, लखनऊ।

 

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